अभी मुझे वैज्ञानिक सोच के पढ़े-लिखे मित्र का यह पोस्ट पढने को मिला:

मकर संक्रांति का औचित्य ??? लकीर के फकीरों के लिए

मकर एक राशि है और संक्रांति का अर्थ है-गति।प्राचीन खगोल विज्ञानियों ने सूर्य के मार्ग को 12 भागों में बांटा था।इस मार्ग को उन्होंने ‘क्रांति वृत’ कहा है।यह 12 कल्पित भाग हैं:

मेष,वृष,मिथुन,कर्क,सिंह,कन्या,तुला,वृश्चिक,धनु,मकर,कुंभ और मीन।प्रत्येक भाग को राशि कहा गया है ।सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को ‘संक्रांति ‘ कहते हैं ।जब सूर्य मकर राशि में प्रविष्टि होता है तब इस संक्रांति को मकर संक्रांति कहते हैं ।

यदि आज स्कूल जाने वाला बच्चा भी यह जानता है कि पृथ्वी गतिशील है न कि सूर्य;फिर भी परम्परा के नाम पर तथा पूर्वजों के प्रति आदर के नाम पर हर गल्त बात का अंधाधुंध अनुसरण करते हुए मकर संक्रांति मनाई जाती है ।त्रासदी देखिए कि आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी में अच्छे खासे डिग्रीधारी लोग भी गर्वपूर्वक यह कहते सुने जाते हैं कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य घूम कर मकर राशि में प्रवेश करता है ।

स्वाभाविक रूप से पाखंड और शोषण के महारथी ब्राह्मणों ने अपने वंशजों के आर्थिक लाभ के लिए इस दिवस का खूब महिमामंडन किया है ।21वीं शताब्दी के उन्नत वैज्ञानिक युग में प्राचीन भारतीयों के खगोल विषयक अल्प ज्ञान के महिमामंडन का न कोई आधार और न कोई औचित्य ।”
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अब चूँकि ये पढ़े-लिखे हैं, तो स्वाभाविक है कि किताबों से ऊपर उठ नहीं पाएंगे आजीवन | ब्राह्मणों को कोसने में ऐसे डूब गये कि भारतीयों के खगोलीय ज्ञान को भी कोसने से नहीं चूके | ऐसे अहसान फरामोश तो अंग्रेज भी नहीं हैं जिनके ज्ञान के दम पर ये मित्र उछल रहे हैं | भारतीयों ने जो भी योगदान दिया, उसे हम भारतीयों ने ही विदेशियों की चाटुकारिता के कारण मिटटी में मिला दिया | जैसे आज मोदी भक्त गाँधी, नेहरु ही नहीं हर स्वतंत्रता सेनानी के स्वप्न और और उनके बलिदानों की धज्जियाँ उड़ाने में लगे हुए हैं |

chaliye
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