साम्प्रदायिकता एक ऐसा घातक नशा है, जो इंसान को हैवान बना देता है

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बीबीसी न्यूज़ की एक हेडिंग; चीन की ऐसी ‘जेल’ जहां बंद हैं दस लाख मुसलमान? पर नजर पड़ी तो सहसा ही स्क्रोल करते-करते ठहर गया. पूरा लेख पढकर और कुछ खोजबीन की तो और भी कई लेख मिले इसी विषय से सम्बंधित | उन्हें भी पढ़ा और पढ़ने के बाद आश्चर्य चकित रह गया कि साम्प्रदायिकता ऐसी चीज है, जो इंसान को कभी भी इंसान नहीं बनने देती | सम्प्रादयिकता कोई भी हो, फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम, काँग्रेसी हो या भाजपाई, संघी हो या मुसंघी, वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, कम्युनिस्ट हो या सोशलिस्ट…जिसके भी हाथ में ताकत आती है, वही अमानवीय हो जाता है, वही दूसरों से उसकी मौलिकता छीनकर अपनी मानसिकता थोपने लगता है |

अगस्त 2018 में संयुक्त राष्ट्र की एक मानवाधिकार कमेटी को बताया गया था कि ‘पूरा वीगर स्वायत्त क्षेत्र नज़रबंदी में है.’ इस कमेटी को बताया गया था कि क़रीब 10 लाख लोग हिरासती ज़िंदगी बिता रहे हैं. ऐसी रिपोर्टों की पुष्टि ह्यूमन राइट्स वॉच भी करता है. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि एक तरह के हिरासती कैंपों में रखे गए लोगों को चीनी भाषा सिखाई जाती हैं और उन्हें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रति वफ़ादारी की कसम खानी होती है. साथ ही लोगों से उनके धर्म और संस्कृति की आलोचना करने को कहा जाता है. ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक वीगर समुदाय को बेहद सख़्त निगरानी का सामना करना पड़ता है. लोगों के घरों के दरवाज़े पर QR कोड्स लगे हुए हैं और चेहरे को पहचानने के लिए कैमरे फ़िट हैं. अधिकारी जब चाहें तब ये पता लगा सकते हैं कि घर अंदर कौन है.

लोग कहते हैं कि कम्युनिस्ट सरकार बेहतर होगी, लेकिन चीन में जिस प्रकार मुसलिमों के साथ व्यव्हार हो रहा है, वह ठीक नहीं है | लेकिन शायद इसी को कम्युनलिज्म कहते हैं | मैं इसे साम्प्रदायिकता कहता हूँ और भारत जैसे विभिन्न मत-मान्यताओं व संस्कृतियों वाले देश के लिए ऐसी कोई भी सरकार बेहतर नहीं हो सकती | यहाँ तो सरकार वही होनी चाहिए जो सनातनी मानसिकता की हो |

साम्प्रदायिकता शायद मानव प्रजाति की मूल प्रवृति ही है कि ताकत हाथ में आते ही वह कमजोरों व दूसरे मतावलंबियों के मौलिक अधिकार छीनने का प्रयास करता है | इतिहास में ही झांककर देखें तो ईसाईयों ने भी अपने अधीनस्थ राज्यों के साथ यही किया | तब उनके पास ताकत थी, इसीलिए वे ताकत का प्रयोग करते हैं, अब बहुत ही शांति से सेवा के नाम पर लोगों को इसाई बनाते हैं | ईसाइयों ने बहुत ही रक्तपात किये और उन रक्त्पातों से उन्होंने जाना कि ऐसा करने पर वे कुछ समय तक तो राज कर सकते हैं, लेकिन जल्दी ही उन्हें खदेड़ भी दिया जाएगा | इसीलिए उन्होंने शांति व सेवा का मार्ग चुना | आज उत्तरी पूर्वी और दक्षिणी भारत में ईसाईयों का वर्चस्व स्थापित हो गया | वह भी बिना किसी से लड़े, बिना खून खराबा किये |

लेकिन जो नासमझ हैं वे आज भी वही प्राचीन पद्धति अपना रहे हैं जैसे कि चीन के कम्युनिस्ट और भारत के दक्षिणपंथी |

क्यों होता है ऐसा कि मानव सहजता से नहीं जी पाता, न ही दूसरों को जीने देता है ?

सभी प्राणियों का सामान्य स्वभाव है कि वह अपनी ही मानसिकता व स्वभाव के व्यक्ति के साथ अधिक सहज रहता है | वैचारिक मतभेद भले ही हों, लेकिन यदि मानसिकता व स्वाभाव में मेल हो जाए तो वे सम्बन्ध अधिक दूरी तक चल सकते हैं | इसी प्रकार कुछ विशेष् विचारों या मान्यताओं या परम्पराओं के प्रति एक बड़ा समूह आकर्षित हो जाता है और फिर उससे ही बंधकर रह जाता है | पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही मान्यता, परम्पराओं को ढोते ढोते लोग उसके ही आदि हो जाते हैं | उन्हें अपने सम्प्रदायों के दोष ही दिखने बंद हो जाते हैं, उन्हें यह दिखना ही बंद हो जाता है कि उनके अपने ही सम्प्रदाय के कमजोर सदस्यों के प्रति उनका अपना ही समाज उदासीन हो गया है | धीरे धीरे उस सम्प्रदाय में शोषित वर्ग की संख्या बढती चली जाती है और वे अपने ही सम्प्रदाय के लोगों के प्रति घृणा व द्वेष से भरने लगते हैं | कुछ अपने सम्प्रदाय या समाज को त्याग कर, दूसरे समाज को अपना लेते हैं या फिर मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाते हैं और हिंसक अपराध जगत में प्रवेश कर लेते हैं |

इस प्रकार के असंतुष्ट समुदाय को शत्रु बहुत ही आसानी से अपने इशारों पर नचाने लगता है | ऐसे लोगों के भीतर पहले से ही भरी घृणा व नफरत को शत्रु विध्वंसकारी बना देता है और जन्म होता है आतंकवादियों का, दंगाइयों का, विश्वासघातियों का, देशद्रोहियों का | और जब इनकी संख्या अधिक प्रभावी हो जाती है, तब इनकी वजह से एक पूरा का पूरा समाज ही कलंकित हो जाता है, संदेह के घेरे में आ जाता है | लेकिन समाज या सम्प्रदाय यह मानने के लिए तैयार ही नहीं होता और आरोप-प्रत्यारोप से लेकर भीषण रक्तपात तक का सामना करना पड़ता है | समाज या सम्प्रदाय अपने ही समुदाय के गलत लोगों को बचाने में केवल इसलिए जुट जाता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि इनका साथ नहीं दिया तो ये हमें चैन से नहीं जीने देंगे | या फिर इसलिए कि ये ये दोषी साबित हुए तो हमारा सम्प्रदाय कलंकित होगा | कारण जो भी हो, एक पूरा समाज ही कलंकित हो जाता है कुछ मुट्ठी भर असामाजिक तत्वों और अपनी लापरवाही के कारण |

और परिणाम यह होता है कि कोई विशेष मान्यता या परम्परा को मानने वालों का पूरा समाज ही एक अराजक स्थिति में आ जाता है | उनकी वजह से सारा देश ही अराजक स्थिति में आ जाता है | जैसे इस्लाम के नाम पर ईराक्, सीरिया, और हिंदुत्व के नाम पर आज भारत |

क्या सारा समाज ही गलत होता है

मेरा मानना है कि सारा समाज गलत या बुरा नहीं होते हुए भी अपनी मौन स्वीकृति के कारण गलत तो हो ही जाता है | कुछ मुट्ठीभर लोग जब कुछ गलत करते हैं, तब पूरा समाज उसे अनदेखी कर जाता है  | इससे उन बुरे लोगों का मनोबल बढ़ता है कि अपने ही समाज के लोग तो अपने साथ हैं ही तो फिर चिंता किस बात की ? और उनका उत्पात इतना बढ़ जाता है कि वे पुरे देश को ही हिंसा की आग में झोंक देते हैं |

आज हिंदुत्व के नाम पर उत्पात मचा रहे लोगों को हिन्दू अनदेखा कर रहे हैं | बहुत से लोग तो उनका समर्थन भी कर रहे हैं, कल इन्हीं की वजह से पूरा हिन्दू समाज कलंकित हो जाएगा, संदेह के घेरे में आ जायेगा इस विषय में चिंतन-मनन करना नहीं चाहता कोई | हिन्दू ही नहीं, किसी भी सम्प्रदाय या समाज के लोगों ने इतिहास से कोई शिक्षा नहीं ली | हाँ ईसाईयों ने अवश्य शिक्षा ली, और यही कारण है कि भारत को लूटने वाले फिरंगी आज भी भारतीयों और हिंदुत्व के ठेकेदारों के आदर्श हैं, आज भी यहाँ माता-पिता  फिरंगी देशों के लिए बच्चे पैदा करते हैं, हमारी सरकार, हमारे शिक्ष्ण संस्थाने उन बच्चों को तैयार करती हैं इस प्रकार कि वे विदेशों में सहजता से रह सकें | भारत को फिरंगियों ने लूटा, भारत आजाद भी हुआ तो फिरंगियों से, लेकिन भारतीयों के मन फिरंगियों के प्रति कोई घृणा नहीं है | जबकि मुगलों के नाम पर मुसलमानों से घृणा व द्वेष पाले बैठे हैं और इस द्वेष व घृणा को आग देते रहते हैं कट्टरपंथी संघी-मुसंघी और हिन्दू, मुस्लिम के ठेकेदार |

नेता व धर्मों के ठेकेदार घृणा को बढाने व बनाये रखने का हर संभव प्रयास करते रहते हैं और साथ देते हैं समाज के बुद्धिहीन लोग | फिर साथ ही जाति के नाम पर घृणा व द्वेष फैलाए जाते हैं ताकि राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों को लाभ मिले | केवल समाज के अपने ही कुछ मुट्ठीभर बुरे लोगों की अनदेखी कर देने भर के कारण, इतनी बड़ी हानि हो जाती है और समाज है कि चेतने को तैयार ही नहीं आदिकाल से लेकर आज तक |

साम्प्रदायिकता से हानि

साम्प्रदायिकता एक ऐसा घातक नशा है, जो इंसान को इंसान नही रहने देता | सम्प्रदायों का बनना स्वाभाविक गुण है या मानवीय ही नहीं, सभी प्राणियों का प्राकृतिक गुण है | लेकिन जब ये सम्प्रदायों में बंटे लोग, जब दिमाग से पैदल हो जाते हैं, सोचने समझने की शक्ति ही खो बैठते हैं, तब स्थिति बिगड़ने लगती है और साम्प्रदायिकता घातक व विनाशकारी रूप लेने लगती है | फिर चाहे वह हिन्दू सम्प्रदाय हो या इस्लामिक सम्प्रदाय हो, या फिर कांग्रेसी, भाजपाई, संघी, मुसंघी, वामपंथी, दक्षिणपंथी या और कोई भी सम्प्रदाय | ये सम्प्रदाय जब राजनैतिक दौड़ में पड़ जाती है, तब इंसानियत से दूर होती चली जाती है | जिसके भी हाथ में सत्ता आती है, वही स्वयं को ईश्वर समझ बैठता है दूसरे को मिटाने के हर संभव प्रयास करता है | और यह संग्राम निरंतर तब तक चलता रहेगा, जब तक समाज अपने ही समाज के शोषितों व पीड़ितों के लिए सहयोगी नहीं हो जाता | जब तक समाज ईश्वर या सरकार भरोसे बैठा है, तब तक कोई न कोई सत्ता हथियाता रहेगा और अपने से कमजोर को मिटाने का प्रयास करता रहेगा |

इसलिए ये साम्प्रदायिकता न केवल मानव प्रजाति के लिए हानिकारक है, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के लिय ही हानिकारक है | साम्प्रदायिकता यदि समाज के हितों का ध्यान रखे, अपने ही समाज के कमजोरों व शोषितों के हितों को ध्यान में रखे तो सम्भव है कि समाज समृद्ध व उन्नत हो | किन्तु ऐसा होता नहीं | साम्प्रदायिकता केवल दूसरे सम्प्रदायों के प्रति घृणा, व द्वेष पर आधारित होकर ठहर जाता है | कोई भी सम्प्रदाय अपने ही लोगों के हितों के लिए सहयोगी कदम नहीं उठाता, बल्कि जो कमजोर है, उसे और दबाया जाता है | और परिणाम होता है विध्वंस !

सभी राजनैतिक पार्टियाँ देश व समाज से अधिक अपने स्वार्थों, मान्यताओं को महत्व देती हैं

कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि आपके लेख तो कम्युनिस्टों जैसे होते हैं, क्या आप कम्युनिस्ट हैं ? मेरा उत्तर होता है नहीं, मैं सनातनी हूँ | क्योंकि कम्युनिस्ट हो या और कोई भी दडबा, सभी की मनोर्वृति एक जैसी ही है | सभी के आदर्श ग्रंथों में बड़ी अच्छी अच्छी मनलुभावन बातें लिखी हुईं होती हैं, लेकिन वे सब व्यावहारिक नहीं होतीं और किताबों में ही सिमट कर रह जाती है | सत्ता या ताकत मिल जाने के बाद वे सारी नैतिकता और धार्मिकता धरी की धरी रह जाती हैं और वही सब होता है, जिसका वे विरोध करते हुए सत्ता तक पहुँचे |

यानि जब कोई दूसरा करे तो गलत, लेकिन वही काम हमारा नेता, हमारी पार्टी करे तो सही | और उस गलत को सही ठहराने के लिए भी इनके पास सैंकड़ों दलीले मिल जायेंगी, जिनका विरोध वे कल तक करते रहे थे | जैसे कि महँगाई को डायन कहने वाले आज उसे विकास की मौसी बता रहे हैं | सीबीआई को ही एक्सटोर्शन का अड्डा बना कर दिया और भ्रष्ट अधिकारयों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं |

तो साम्प्रदायिकता का नैतिकता या धार्मिकता से कोई लेना देना नहीं होता, बस जब तक ताकत या सत्ता हाथ में नहीं होती, तभी तक नैतिकता की दुहाई दी जाती है | रही धर्म की बात, तो इनका एक ही धर्म होता है वह है राजनीति और राजनीति में सबकुछ जायज है |

क्या समाज कभी स्वयं को सुधारने की पहल करेगा ?

दुनिया का कोई भी समाज स्वयं को नहीं सुधार पाया | इसीलिए हर समाज या सम्प्रदाय में विखंडन हुआ | फिर चाहे वह बौद्ध जैसा शांति प्रिय सम्प्रदाय ही क्यों न हो या फिर एक अल्लाह और एक कुरआन को मानने वाला इस्लाम ही क्यों न हो | अलग होने का कारण वैचारिक मतभेद रहे और यह मानकर अलग हुए कि शायद अलग होकर कुछ बेहतर हो जायेंगे | परिणाम वही ढाक के तीन पात !

दुनिया भर के पंथ खड़े हो गये, फिरके खड़े हो गये, लेकिन हर फिरकों और पंथों की हालत एक जैसी | सभी में आपको शोषित पीड़ित वर्ग मिलेगा और जो ताकतवर होगा, धनि होगा वह अपने में मगन होगा, कमजोरों पर अत्याचार करेगा |

इसीलिए ही मैं सनातनी हो गया उस दिन, जिस दिन सनातन धर्म को समझा | जिस दिन जाना कि यह मानव निर्मित कोई किताबी धर्म नहीं है, बल्कि यही वह धर्म है जिससे दुनिया भर के दड़बे तैयार हुए | तो मैं अपने मूल में लौट आया अर्थात सनातनी हो गया | मैं उस धर्म में लौट आया, जिस धर्म से आज सभी सम्प्रदाय अनभिज्ञ हो गये और किताबी धर्मो और मान्यताओं को ही शाश्वत सत्य धर्म मानकर जी रहे हैं | जबकि वे सभी आंशिक हैं, अपूर्ण हैं, पूर्ण तो सनातन धर्म ही है |

समाज तो नहीं सुधरेगा, न ही दडबों के कैद लोग ही सुधरने को राजी होंगे क्योंकि नियति भी कोई चीज होती है | समय से पहले और समय से अधिक समझ किसी को नहीं आती | तो जब तक लोग आपस में मर कट न जाएँ,नहीं सुधरने वाले |

सनातन धर्म पर निरंतर रिसर्च करते हुए जाना कि; “यदि आपके पड़ोस में कोई भूखा सो रहा है, तो आपके किसी शत्रु या विरोधी द्वारा रोटी दिए जाने से पहले उसे रोटी दे दो | अन्यथा आपका वह भूखा पड़ोसी किसी दिन आपके लिए मुसीबत बन जायेगा | यदि आपका पड़ोसी गुंडों, बदमाशों से परेशान है और आप या आपका समाज उसकी सहायता कर पाने में असमर्थ है, तो निश्चित मानिये एक दिन वह आपके लिए मुसीबत बन जाएगा | क्योंकि जिनपर उसे विश्वास था कि वे सहायता करेंगे, उन्होंने सहायता नहीं की |”

और यही छोटी सी सीख लगभग सभी पंथों, सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथों में मिलेगी, अलग अलग रूपों में फिर भी कोई समझने को तैयार नहीं, कोई भी समाज अपने आचरण में लाने को तैयार नहीं और बैठे हैं भगवान् व सरकार भरोसे |

~विशुद्ध चैतन्य

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More then 20 years, I have worked with various organizations, production houses, Broadcast Media and commercial sound studios, both as a full time employee as well as free-lancer. This has enabled me to gain valuable audio restoration and optimization expertise including designing and installation of new studios. Besides, I have done lot of dubbing jobs for National Geography, History Channel, Hungama, Pogo, Doordarshan.But now I have left that field and writing articles and short posts in blog and social media to awake the society and people for the Humanity, Social and the National cause.If you appreciate my efforts for social awakening by my own ways, and willing to support me unconditionally, it will be great Support for me.Thanks for your Support.~विशुद्ध चैतन्य

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