समाज की परिभाषा क्या है ?

Definition of Society

एक प्रश्न पूछा था मैंने सोशल मिडिया पर कि बन्दर, बत्तख, भेड़, भेड़िये, सियार, गीदड़…आदि सामाजिक प्राणी होते हैं या असामाजिक प्राणी ? समाज की परिभाषा क्या है ?

आश्चर्य हुआ मुझे यह जानकर कि अधिकांश को तो समाज की परिभाषा और सामाजिकता का अर्थ ही नहीं पता | अधिकांश का यह मानना था कि पशु-पक्षी सामाजिक प्राणी नहीं होते | क्योंकि वे पूजा-पाठ नहीं करते, शादी ब्याह नहीं करते, रिश्तों की कोई मर्यादा नहीं होता उनमें यानि कोई भी किसी से भी शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है | कुछ का कहना था कि वे धार्मिक नहीं होते इसीलिए सामाजिक नहीं हैं | और ऐसी धारणा रखने वाले कोई अनपढ़, गँवार नहीं बल्कि पढ़े लिखे लोग हैं |

इससे यह समझ में आया कि स्कूलों में नहीं सिखाया जाता कि समाज किसे कहते हैं सामाजिकता किसे कहते हैं | एक सामाजिक होने का अर्थ क्या है, समाज का दायित्व क्या है | और समाज की परिभाषा न समझाना ही सबसे बड़ा कारण बना समाज के विखंडन का, समाज और सामाजिकता के पतन का | आज समाज का अर्थ हो गया है धार्मिक कर्मकांड, शादी-ब्याह, पार्टीवाद, सम्प्रदाय व जातिवाद और मूल अर्थ समाज व सामाजिकता का पूरी तरह से बिसरा दिया गया | यह बहुत ही चिंता व दुःख का विषय है |

आइये पहले समझते हैं कि समाज किसे कहते हैं ?

समाज शब्द संस्कृत के दो शब्दों सम् एवं अज से बना है | सम् का अर्थ है इक्ट्ठा व एक साथ अज का अर्थ है साथ रहना | इसका अभिप्राय है कि समाज शब्द का अर्थ हुआ एक साथ रहने वाला समूह |

मनुष्य चिन्तनशील प्राणी है | मनुष्य ने अपने लम्बे इतिहास में एक संगठन का निर्माण किया है | वह ज्यों-ज्यों मस्तिष्क जैसी अमूल्य शक्ति का प्रयोग करता गया, उसकी जीवन पद्धति बदलती गयी और जीवन पद्धतियों के बदलने से आवश्यकताओं में परिवर्तन हुआ और इन आवश्यकताओं ने मनुष्य को एक सूत्र में बाधना प्रारभ्म किया और इस बंधन से संगठन बने और यही संगठन समाज कहलाये और मनुष्य इन्हीं संगठनों का अंग बनता चला गया |

विलियम र्इगर महोदय का कथन है- मानव स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है, इसीलिये उसने बहुत वर्णों के अनुभव से यह सीख लिया है कि उसके व्यक्तित्व तथा सामूहिक कार्यों का सम्यक् विकास सामाजिक जीवन द्वारा ही सम्भव है | रेमण्ट महोदय का कथन है कि- एकांकी जीवन कोरी कल्पना है | शिक्षा और समाज के सम्बंध को समझने के लिये इसके अर्थ को समझना आवश्यक है |

समाज की परिभाषा

गिन्सबर्ग ने समाज की व्याख्या करते हुए लिखा है कि केवल कुछ व्यक्तियों का किसी बाहरी आपत्ति से भयभीत होकर साथ होना मात्र ही समाज नहीं है। बाढ़ से पीड़ित होकर जब गांव का गांव भाग खड़ा होता है तो यह भी समाज नहीं है। समाज के लिये जहाँ व्यक्ति एकत्रित होते हैं, वहाँ उनमें पारस्परिक सम्बन्ध अनिवार्य रूप से होने चाहिए। समाज की व्याख्या करते हुए गिन्सबर्ग लिखते हैं : ऐसे व्यक्तियों के समुदाय को समाज कहा जाता है, जो कतिपय सम्बन्धों या बर्ताव की विधियों द्वारा परस्पर एकीभूत हों। जो व्यक्ति इन सम्बन्धों द्वारा सम्बद्ध नहीं होते या जिनके बर्ताव भिन्न होते हैं, वे समाज से पृथक होते हैं।

ओटवे के अनुसार- समाज एक प्रकार का समुदाय या समुदाय का भाग है, जिसके सदस्यों को अपने जीवन की विधि की समाजिक चेतना होती है और जिसमें सामान्य उद्देश्यों और मूल्यों के कारण एकता होती है। ये किसी-किसी संगठित ढंग से एक साथ रहने का प्रयास करते हैं किसी भी समाज के सदस्यों की अपने बच्चों का पालन-पोषण करने और शिक्षा देने की निश्चित विधियां हेाती है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है, समाज एक उद्देश्यपूर्ण समूह हेाता है, जो किसी एक क्षेत्र में बनता है, उसके सदस्य एकत्व एवं अपनत्व में बंधे हेाते हैं।

क्या समाज के सदस्य एकत्व एवं अपनत्व में बंधे होते हैं ?

यदि हम ध्यान से देखें और समझने का प्रयास करें तो किसी भी समाज के सदस्य अपनत्व में नहीं, स्वार्थ में बंधे होते हैं | वे परस्पर सहयोगी नहीं, व्यवसायी होती हैं, व्यापार कर रहे होते हैं | यदि सामने वाले से किसी का स्वार्थ पूरा न हो रहा हो, तो वह कोई सहायता नहीं करेगा | इन समाजों, सम्प्रदायों में सभी केवल व्यक्तिगत सुखों व हितों को महत्व देता है | और लोभ इतना अधिक बढ़ गया है स्वयं को सामाजिक कहने वाले मानवों में कि बैंक बेलेंस बढ़ता जा रहा है, लेकिन और कर्ज चाहिए…करोड़ों, अरबों का कर्ज लेने में भी परहेज नहीं | पिछले कर्ज न चुका पाए तो कोई शर्म नहीं, और कर्ज चाहिए….क्योंकि भूख है कि मिटती ही नहीं | उदाहरण के लिए वर्तमान भारत सरकार और बड़े कर्जदार व्यापारियों की मानसिकता को देखें:

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“छः हफ़्तों में दिवालिया हो सकती हैं कई कम्पनियाँ” -भारत सरकार

इसलिए साढ़े तीन लाख करोड़ चाहिए रिज़र्व बैंक के रिज़र्व स्टॉक से | ताकि माल्या, नीरव, लालित जैसे दीन-हीन दरिद्र मालिकों को विदेश निर्यात किया जा सके | ये दिवालिया कंपनियों के मालिक विदेशों में जाकर करोड़ों का चंदा वहां की सरकार को भेंट कर सकें और ऐशो आराम की ज़िन्दगी बसर कर सकें |

भारत की सरकार कम्पनियों के मालिकों को किसानों और आदिवासियों की मौत नहीं मरने दे सकती | क्योंकि किसान मर जाएँ तो सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता, आदिवासी मर जाएँ तो सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता | आम जनता भी मर जाए तो सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता | फर्क पड़ता है कम्पनियों के मालिकों के दिवालिया होने से, क्योंकि वे ही सरकार के अन्नदाता हैं, माई-बाप है, ईश्वर हैं, खुदा हैं |

और यही सरकार समाज को हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद के खेल में उलझा कर रखती है | यही सरकार कभी भी समाजिक हितों से सम्बंधित कोई बात नहीं करती, यही सरकार किसानों के हितों से सम्बंधित कोई बात नहीं करती | उलटे किसानों आदिवासियों की भूमि से लेकर जंगलों तक को नीलाम करवा रही है | क्योंकि इन्हें खेतों से बैर है, इन्हें जंगलों से बैर है, इन्हें किसानों से बैर है, इन्हें आदिवासियों से बैर है | इन्हें केवल नोट चाहिए, दौलत चाहिए और उसके लिए ये सबकुछ बेचने के लिए तैयार हैं | अपना ईमान धर्म सब बेच चुके हैं, इनकी जबान की कोई कीमत रह नहीं गयी क्योंकि जो भी वादे करते हैं सब नशे की हालत में करते हैं और वादा करने के थोड़ी ही देर बाद भूल भी जाते हैं |

चूँकि समाज में ही अपनत्व नहीं है, परस्पर सहयोग की भावना नहीं है, कमजोर की सहायता करने की शिक्षा व प्रेरणा देने वाले अभिभावक व शिक्षक नहीं बचे…..तो फिर ऐसे स्वार्थी समाज द्वारा चुने हुए नेता और नेता भला इनसे अलग मानसिकता के कैसे हो सकते हैं ?

मुस्लिमों के लिए लड़ रहा है, कोई हिन्दुओं के लिए लड़ रहा है, कोई आदिवासियों के लिए लड़ रहा है, कोई किसानों के लिए लड़ रहा है…..देखा जाए तो हर सम्प्रदाय व समाज के लिए कोई न कोई लड़ ही रहा है | और समाज इन लड़ने वालों को महान समझकर इनकी जय जय करता है |

क्या ये लोग वास्तव कोई महान कार्य कर रहे हैं ?

नहीं ये लोग कोई महान कार्य नहीं कर रहे | ये लोग आपको भ्रमित कर रहे हैं, आपकी अपनी ही योग्यताओं व क्षमताओं पर से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रहे हैं | ये आपको यह समझा रहे हैं कि हमारे पीछे आओ, सरकार को कोसो, भगवान् को कोसो, धार्मिक ग्रंथों को आग लगाओ, पंडित पुरोहितों को गालियाँ दो, साधू-संन्यासियों को हरामखोर कहो, सत्ता हथियाओ, नौकरियाँ हथियाओ, आरक्षण माँगों, नौकरी माँगों….लेकिन अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को खोजने, जानने का प्रयास मत करो | खुद के भीतर झाँकने का प्रयास मत करो |

ये लड़ने वाले महान लोग, सत्ता प्राप्ति के लिए आपको भेड़-बकरियों की तरह बलि देना चाहते हैं, ये आपको अपाहिज बनाना चाहते हैं जैसे हिटलर ने बना दिया था जर्मनी को अपाहिज | भूखों मरने की नौबत आ गयी थी जर्मनी की क्योंकि हिटलर का सारा सिद्धांत घृणा व द्वेष पर आधारित था | उसके समर्थन में वे लोग थे, जो घृणा व द्वेष से भरे पड़े थे यहूदियों के विरुद्ध | साठ लाख यहूदियों को मारने के बाद जर्मनी खुद बर्बाद हो गया | बिकने की स्थिति में पहुँच गया और कई देश, यहाँ तक छोटा सा देश जापान भी उसे खरीदने पहुँच गया था | यदि हिरोशिमा, नागासाकी का महाविनाश न किया होता अमेरिका, तो जापान का भी अधिकार होता है आज जर्मन में |

तो जिन्हें आप शुभचिंतक समझ रहे हैं, वे ही वास्तविक शत्रु हैं आपके | क्योंकि वे आपको आत्मनिर्भरता नहीं सिखा रहे, वे आपको अपने ही पैरों में खड़े होना नहीं सिखा रहे  | वे आपको आत्मनिर्भर होने के लिए सहयोग नहीं कर रहे, बल्कि आपको दूसरों पर निर्भर होने के लिए बाध्य कर रहे हैं | और दूसरों पर निर्भर रहने की मानसिकता यदि पूरे देश की हो जाये, तो देश का पतन निश्चित है |

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दूसरों पर निर्भर रहना, परस्पर निर्भरता और आत्मनिर्भरता को ठीक से समझ लीजिये

दूसरों पर निर्भरता: हम बहुत से कार्यो के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं क्योंकि कोई भी व्यक्ति सभी कार्य नहीं कर सकता | लेकिन जब व्यक्ति स्वयं को अपाहिज मानकर जीने लगे, तब स्थिति घातक हो जाती  है | उदाहरण के लिए आरक्षण और रोजगार की लाइन में लगे युवा | ये अपनी योग्यताओं और क्षमता से पूरी तरह अनभिज्ञ हो चुके हैं और इन्हें लगता है कि सरकार ही इनका भला कर सकती है, इनके अपने बस में कुछ नहीं | ये बिना बैसाखी के अपने पैरों पर खड़े भी नहीं हो सकते | और यह धारणा इनके मन में बैठाने वाले और कोई नहीं, वही लोग हैं जो इनके शुभचिंतक बने बैठे हैं |

परस्पर निर्भरता: परस्पर निर्भरता सहज प्राकृतिक व सनातन व्यवहार है | हम सभी पूर्ण नहीं है क्योंकि ईश्वर ने हमें एक दूसरे का सहयोगी होने के लिए ही बनाया है | स्त्री और पुरुष परस्पर सहयोगी हैं और दोनों मिलकर ही पूर्णता को प्राप्त होते हैं | किसान खेती करता है, व्यापारी व्यापार करता है | व्यापारी खेती नहीं कर सकता और किसान व्यापार नहीं कर सकता | दोनों को एक दूसरे की आवश्यकता है यह परसपर सहयोगिता या सहभागिता है | भोजन की आवश्यकता हर प्राणी को, लेकिन हर प्राणी इस योग्य नहीं होता कि वह अन्न उपजा सके | तो किसान उनकी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं | किसान वाहन का निर्माण नहीं कर सकते, वस्त्र नहीं बना सकते…तो उनकी आवश्यकता दूसरे लोग पूरा करते हैं | ये परस्पर सहयोगिता है |

आत्मनिर्भरता: स्वयं को अपने पैरो पर खड़ा कर लेना, कम से कम दूसरों पर निर्भर रहना और इस योग्य हो जाना कि दूसरों के सहयोगी हो सकें बिना किसी स्वार्थ के, आत्मनिर्भरता है | यदि आप करोडपति भी बन जाएँ, अरबपति भी बन जाएँ और आप बिना कहे, किसी की सहायता कर पाने में असमर्थ हैं, आप यह देख पाने में असमर्थ है कि आप इस योग्य हो चुके हैं कि किसी की सहायता कर सकें तो आप आत्मनिर्भर नहीं माने जायेंगे | आत्मनिर्भरता का महत्व ही तभी है, जब आप सहायता या सहयोग कर पाने में समर्थ हो जाएँ |

परस्पर सहयोगिता के ही सिद्धांत पर इस सृष्टि की रचना की गयी

यदि हम अपने आसपास दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि वृक्ष हम पर निर्भर हैं और हम वृक्षों पर | वृक्षों के मिटने के साथ ही, हमारा आस्तित्व भी मिट जाएगा क्योंकि वर्षा से लेकर ऑक्सिजन तक हमें उन्हीं की वजह से प्राप्त होते हैं | आपने वर्षावनों के विषय में अपने स्कूली किताबों में पढ़ा ही होगा ?

जहाँ वृक्ष अधिक होंगे, वहाँ वर्षा होने की सम्भावना भी अधिक होगी, वातावरण भी सामान्य रहेगा अर्थात अधिक गर्मी से बचाव होगा | आप अपने भौतिक दुनिया से बाहर निकलें, अपनी अप्राकृतिक दुनिया से बाहर निकलें और कुछ समय प्राकृतिक वातावरण में जीने वाले प्राणियों को ध्यान से देखें | तो आप पाएंगे कि सभी परस्पर सहयोगी हैं, सम्पूर्ण सृष्टि में व्य्पाप्त सभी पदार्थ, तत्व, अणु-परमाणु परस्पर सहयोगी हैं | लेकिन केवल मानव समाज परस्पर सहयोगिता के भाव से रिक्त होता चला जा रहा है | और जो समाज परस्पर सहयोगिता के भाव से रिक्त हो जाए, वह समाज नहीं रह जाता, उस समाज का आस्तित ही लुप्त हो जाता है | क्योंकि जो सहयोगिता के भाव को नहीं मानता, वह सनातन धर्म के विरुद्ध हो जाता है, और जो सनातन धर्म के विरुद्ध हो जाए, प्रकृति उसका नाश कर देती है |

तो समाज का अर्थ है परस्पर निर्भर, एक दूसरे के सहयोगी प्राणियों का समूह,  न कि कायरों, धर्मभीरुओं की भीड़ या झुण्ड | समाज का अर्थ है एक ऐसा परिवार जिसमें सभी एक दूसरे के प्रति प्रेम व करुणा का भाव रखते हैं, जहाँ सभी अपने से कमजोरों, असहायों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं | हिन्दुओं से डरकर मुसलमान संगठित हो जाएँ या मुसलमानों से डरकर हिन्दू संगठित हो जाएँ तो वह समाज नहीं कहलायेगा केवल झुण्ड कहलायेगा | और झुण्ड किसी का भी हो, कितना ही बड़ा क्यों न हो, शिकारी शिकार कर ही लेगा | क्योंकि शिकारी जानता है कायरों के झुण्ड में हजारों भी खड़े हों, तो वे सभी भय के कारण ही एक साथ दिखाई दे रहे हैं | किसी एक दो का शिकार यदि कर भी लिया तो बाकी खड़े तमाशा देखेंगे और ईश्वर को धन्यवाद देंगे कि मैं बच गया | क्योंकि झुण्ड में सभी अजनबी होते हैं और भीड़ इसीलिए ही बना रखी होती है कि मैं बच जाऊँ, सामने वाला मर जाए | यानि सभी एक दूसरे को बलि का बकरा ही समझ रहे होते हैं और ऐसी भीड़ को समाज कहना या समझना सिवाय मुर्खता के और कुछ नहीं |

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समाज या सामाजिक प्राणियों का दायित्व क्या है, यह समझना है तो नीचे दिए दो उदाहरणों से आप अच्छी तरह समझ सकते हैं:

~विशुद्ध चैतन्य

इस विडियो में एक मासूम बच्ची है जो अपनी पॉकेट मनी बचाकर खिलौने खरीदने की बजाये, बेघरों को भोजन और पानी दान करती है | यह इसका सबसे प्रिय शौक है और ऐसा करके इसे असीम संतुष्टि प्राप्त होती है |
बेहद मासूम। सुबह से बैठे हैं। उम्मीद है दीए बिकेंगे। जिन बच्चों को त्योहार पर उछल कूद करनी चाहिए वो बाज़ार में बैठे हैं। मजबूरी है, गरीबी की। बेबसी की। चार पैसे आ जाएं तो खुश हो जाएं, मगर बच्चों की लाचारी देखिए दीये नहीं बिक रहे। लोग बाज़ार आ रहे हैं तो लाइट खरीद रहे हैं। झालर खरीद रहे हैं। महंगे आइटम खरीद रहे हैं। अगर कोई दीया खरीद भी रहा तो बच्चों से नहीं, बड़े दुकानदारों से।

बच्चे बेबसी से लोगों को आते और जाते देख रहे हैं…। सोच रहा हूं जब ये बच्चे अपने पैरेंट्स के साथ खरीदारी करने आए बच्चों को देख रहे होंगे, तो इन दो मासूमों के दिल की कैफियत क्या होगी? क्या दिल में हलचल होगी…?

जहां ये बच्चे बैठे हैं वो जगह है यूपी का ज़िला अमरोहा, गांव सैद नगली। ये मेरा अपना गांव है, जहां मैं पला बढ़ा हूं। दिवाली का बाज़ार सजा है। तभी पुलिस का एक दस्ता बाज़ार का मुआयना करने पहुंचता है।

चश्मदीद का कहना है कि दस्ते में सैद नगली थाना के थानाध्यक्ष नीरज कुमार थे। दुकानदारों को दुकानें लाइन में लगाने का निर्देश दे रहे थे, उनकी नजर इन दो बच्चों पर गई। जो ज़मीन पर बैठे कस्टमर का इंतज़ार कर रहे हैं। चश्मदीद का कहना है कि मुझे लगा अब इन बच्चों को यहां से हटा दिया जाएगा। बेचारों के दीये बिके नहीं और अब हटा दिए जाएंगे। रास्ते में जो बैठे हैं…।

थानाध्यक्ष बच्चों के पास पहुंचे। उनका नाम पूछा। पिता के बारे में पूछा। बच्चों ने बेहद मासूमियत से कहा, ‘हम दीये बेच रहे हैं। मगर कोई नहीं खरीद रहा। जब बिक जाएंगे तो हट जाएंगे। अंकल बहुत देर से बैठे हैं, मगर बिक नहीं रहे। हम गरीब हैं। दिवाली कैसे मनाएंगे?”

चश्मदीद का कहना है बच्चों की उस वक़्त जो हालत थी बयां करने के लिए लफ़्ज़ नहीं हैं। मासूम हैं, उन्हें बस चंद पैसों की चाह थी, ताकि शाम को दिवाली मना सकें।

नीरज कुमार ने बच्चों से कहा, दीये कितने के हैं, मुझे खरीदने हैं…। थानाध्यक्ष ने दीये खरीदे। इसके बाद पुलिस वाले भी दीये खरीदने लगे। इतना ही नहीं, फिर थाना अध्यक्ष बच्चों की साइड में खड़े हो गए। बाज़ार आने वाले लोगों से दीये खरीदने की अपील करने लगे। बच्चों के दीये और पुरवे कुछ ही देर में सारे बिक गए। जैसे जैसे दीये बिकते जा रहे थे। बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं था।

जब सब सामान बिक गया तो थाना अध्यक्ष और पुलिस वालों ने बच्चों को दिवाली का तोहफा करके कुछ और पैसे दिए। पुलिस वालों की एक छोटी सी कोशिश से बच्चों की दिवाली हैप्पी हो गई। घर जाकर कितने खुश होंगे वो बच्चे। आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते।

साभार: …और दिए बिक गयेMohd Asgar

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