समाज का कल्याण कैसे हो ?

एक घने जंगल में दो साधू बैठे चर्चा कर रहे थे कि समाज का कल्याण कैसे हो | एक ने कहा कि शिक्षा का स्तर सुधरना चाहिए, दूसरे ने कहा कि शिक्षा के साथ साथ नैतिकता का स्तर भी सुधरना चाहिए | इसी प्रकार हर रोज कई कई घंटों तक वे चर्चा करते रहते थे |

लेकिन न शिक्षा का स्तर सुधरा और न ही नैतिकता का स्तर | न समाज में कोई परिवर्तन आया, न नेताओं और उनके दुमछल्लों के आचरणों में कोई अंतर आया | स्थिति दिन प्रति दिन पहले से भी बुरी होती चली जा रही थी |

कुछ समय बाद दोनों की चर्चा सुनने आस पड़ोस के लोग आने लगे | वे दिन भर दोनों साधुओं की चर्चा सुनते और शाम को अपने घर लौट जाते | कुछ महीनों बाद सारे देश में चर्चा होने लगी, सभी एक दूसरे को समझाने लगे कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए | बच्चा बच्चा इतना समझदार हो गया था कि वह समझाने लगा था कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए | पूरे देश का हर नागरिक उपदेशक बन चुका था, हर कोई समझा रहा था कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए |

लेकिन देश, समाज, न्यायपालिका, प्रशासनिक कार्यालय सभी में भ्रष्टाचार बढ़ता चला जा रहा था | देश की सर्वोच्च जाँच विभाग के उच्च अधिकारी तक रिश्वतखोर हो चुके थे | देश के मंत्री और राजा तक बिक चुके थे | लेकिन मंत्री भी उपदेश कर रहा था और राजा भी उपदेश कर रहा था | देश का हर नागरिक उपदेश दे रहा था |

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फिर भी देश का पतन होता चला गया और एक दिन पराधीन हो गया विदेशी व्यापारियों के हाथों | अब विदेशी राजा की अनुमति के बिना न वह देश किसी पड़ोसी देश से तेल खरीद सकता है, न ही अपने देश के नागरिकों को आत्मनिर्भरता की प्रेरणा दे सकता है | राजा के पास कोई काम बचा नहीं था सिवाय विदेश भ्रमण करने के, तो वह विदेश भ्रमण में रत रहता |

देश की जनता दिन भर सोशल मिडिया पर उपदेश देती रहती, एक दूसरे की पीठ थपथपाती और देश लुटता चला जा रहा था, गरीब मरते चले जा रहे थे…..क्योंकि जिस देश में सारे उपदेशक हो जाते हैं, उस देश नियति सर्वनाश ही होती है |

साधू-संन्यासियों का काम है उपदेश देना, वे अपना काम ही कर रहे हैं, लेकिन यदि बाकी भी उपदेश करने लग जाएँ, तो पतन निश्चित है |

~विशुद्ध चैतन्य

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