आध्यत्मिक उत्थान और शाकाहार-माँसाहार

Print Friendly, PDF & Email

बचपन से द्वन्द रहता था मन में कि माँसाहार यदि पाप है तो फिर अंग्रेजों को पाप क्यों नहीं लगता, अरबियों को पाप क्यों नहीं लगता, आदिवासियों को पाप क्यों नहीं लगता ?

कई विद्वानों और पंडितों से प्रश्न किया, कई से तर्क किये… लेकिन कोई ऐसा उत्तर नहीं मिल पाया जो मुझे संतुष्टि दे पाता | सारे वैज्ञानिक-अवैज्ञानिक तथ्यों को खंगाले लेकिन यह सिद्ध नहीं हो पाया कि माँसाहार करने से पाप लगता है | मुझे आलू और अंडें में भेद ही नजर नहीं आया, दोनों ही जीवनदाई है, दोनों ही वंशवृद्धि करते हैं, दोनों ही जीवित हैं, लेकिन एक को खाने से पाप नहीं लगता और दूसरे को खाने से पाप लगता है |

फिर यही नहीं समझ में आया कि झूठ बोलने से भी पाप लगता है, लेकिन मैंने किसी भी जुमलेबाज नेता को पाप लगते नहीं देखा, उलटे अदालतों से उसे बरी होते ही देखा है | दुनिया भर के घोटाले करने वाले, रिश्वतखोरों, अत्याचारियों, शोषकों को दुनिया भर के गंभीर अपराधों में आरोपी होते हुए भी सत्ता सुख भोगते देखा है | वहीँ अपने बच्चों को भूख से मरने से बचाने के लिए की गयी चोरी पर भी प्रताड़ित होते हुए, जेल भोगते हुए देखा है और वह भी बिना अदालत का फैसला आये | तो समझ में नहीं आया कि यह पाप किस बला का नाम है, होता कैसा है, दिखता कैसा है |

कई विद्वान कहते हैं कि माँसाहार अध्यात्मिक मार्ग में बाधक है, लेकिन मनुस्मृति कहती है;

असंस्कृतान्पशुन्मन्त्रैर्नाघ्याद्विप्र: कदाचन |
मन्त्रैस्तु संस्कृतान्घ्याच्छाश्वतं विधिमास्थितः || मनु० ५/३६ ||

अर्थात: मन्त्रों द्वारा संस्कारित (शुद्ध) किये बिना, ब्राह्मणों को माँसाहार नहीं करना चाहिए | केवल वेद की सदा से चली आ रही विधि अनुसार ही पशुओं के मांस को पवित्र करके उसे खाना चाहिए |

अब विद्वान कहते हैं कि मनुस्मृति में जो लिखा है वह गलत लिखा है, अंग्रेजों ने यह सब लिखवाया है | इसलिए मनुस्मृति के दाह-संस्कार का कार्यक्रम दलितों के हाथो ब्राहमण ही करवा रहे जान पड़ते हैं | यानि मनुस्मृति के दाहसंस्कार से ब्राह्मण भी खुश और दलित भी खुश… चलिए कम से कम कोई एक ग्रन्थ तो ऐसा है भारत में जिसके दाह-संस्कार से दो परस्पर विरोधी एकमत होकर खुश होते हैं |

वास्तव में मुझे उत्तर कभी भी कोई विद्वान या पंडित से नहीं मिला, उत्तर मिला स्वयं से ही | आत्मचिंतन व मनन से | उसके बाद एक फिल्म देखने मिली ली-चेन की चाइनीज़ मार्शल आर्ट्स की मूवी थी | उसमें वह कुत्ते को मारकर खाने बैठता है, तभी उसके गुरुजी पहुँच जाते हैं और वह बुद्ध का कोई वाक्य कहते हैं जिसका आधार वह कहानी है जिसमें एक भिक्षुक को भिक्षा में कुछ नहीं मिलता तो वह खाली कटोरा लिए लौट रहा होता है, तभी आकाश से कौआ उड़ता हुआ गुजरता है और उसके पंजो से छूट कर एक मांस का टुकड़ा उसके कटोरे में गिरता है | वह गौतम बुद्ध के पास ले जाकर पूछता कि इस भिक्षा का क्या किया जाए | तो बुद्ध उत्तर देते हैं, “जो भी भिक्षा में मिले उसे पूरी श्रृद्धा से ग्रहण करो और क्या दिया है, किसने दिया है इसपर विचार मत करो | जिसने भी जो भी भिक्षा दिया है, उसने अपनी सामर्थ्यानुसार ही दिया है |”

फिर मेरे आश्रम के संस्थापक यानि हमारे गुरूजी के विचार पढ़े वह भी मेरे निष्कर्ष के विरोधाभासी नहीं लगे, इसलिए मैंने इस आश्रम में रहने का निर्णय लिया | क्योंकि बाकी सभी आश्रम व गुरु मेरी समझ में नहीं आये | यही आश्रम मुझे ऐसा लगा, जिसे मैं सनातनी कह सकता हूँ, बाकी सभी आश्रम ब्राह्मणवादी, कर्मकांडी आश्रम ही दिखाई दिए और आये दिन उनके साधु-संतों, ब्रहाम्चारियों के काण्ड अख़बारों में प्रकाशित होते ही रहते हैं |

फिर कल ही मैंने पढ़ा कि वैज्ञानिकों की रिसर्च से पता चला है कि मानव जन्मजात हत्यारा यानि हिंसक होता है | मानव पशुओं की उस प्रजाति से सम्बन्ध रखता है जो स्वजातियों, प्रजातियों की हत्या करके अपने आस्तित्व की रक्षा करता है | और इतिहास में भी हम यही सब पढ़ते हैं कि सत्तासुख के लिए लोगों ने अपनों के ही खून से हाथ रंगे हैं, मासूम बच्चों और स्त्रियों से लेकर नवजातों और कोख में पल रहे बच्चों तक की हत्या कि है मानवों ने | और ऐसा करने वालों में अधिकांश वही हैं, जिन्हें पूजनीय, सम्माननीय समझा जाता रहा, जो सबसे अधिक धार्मिक व्यक्ति व्यक्ति माना जाता रहा | जैसे अशोक, औरंगजेब आदि |

आज भी जो खुद को ब्राहमण कहते हैं, उनकी हिंसकता देखिये किसी मंदिर में जाकर… अभी हाल ही में हमारे पड़ोस के गाँव में एक पंडा अपने जजमान की हत्या इसलिए कर देता है क्योंकि जजमान पण्डे की मनोवान्छित दक्षिणा दे पाने में असमर्थ था | तो ये शाकाहारी पंडे ही आध्यात्मिक उत्थान नहीं कर पा रहे…. अरे योगी-प्राची-साक्षी जैसे शाकाहारी ब्राहमणों और संतो को ही देख लो… इनकी प्यास तो मुसलमानों के खून से ही बुझती है…. और लोग इनको पूजते हैं यह समझकर कि इन्होने कोई अध्यात्मिक उत्थान कर लिया है

इससे यह सिद्ध होता है कि आध्यत्मिक उत्थान का शाकाहार-माँसाहार से कोई लेना देना नहीं है | न ही लेना-देना है धार्मिकता, अधार्मिकता, आस्तिकता-नास्तिकता या साम्प्रदायिकता, हिन्दू या इस्लामिकता से | परिवेश, अनुभव, संगत और मानसिकता के साथ साथ जींस और पूर्वजन्मों के संस्कार ही प्रभाव डालते हैं कि कौन अध्यात्मिक मार्ग में उन्नत होगा या पाशविक प्रवृति के अधीन रहेगा |

~विशुद्ध चैतन्य

252 total views, 8 views today

लेख से सम्बंधित अपने विचार अवश्य रखें

About

More then 20 years, I have worked with various organizations, production houses, Broadcast Media and commercial sound studios, both as a full time employee as well as free-lancer. This has enabled me to gain valuable audio restoration and optimization expertise including designing and installation of new studios. Besides, I have done lot of dubbing jobs for National Geography, History Channel, Hungama, Pogo, Doordarshan.But now I have left that field and writing articles and short posts in blog and social media to awake the society and people for the Humanity, Social and the National cause.If you appreciate my efforts for social awakening by my own ways, and willing to support me unconditionally, it will be great Support for me.Thanks for your Support.~विशुद्ध चैतन्य

Comments are closed.