ईमानदारी जिससे परहेज है राजनीतिज्ञों और पढ़े-लिखे समाज के धार्मिकों को

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मिजोरम की राजधानी आईजोल पूर्वोत्तर के सबसे खूबसूरत शहरों में से है. लेकिन जब आप यहां से दक्षिण, पूर्व और उत्तर की तरफ जाने वाली घुमावदार सड़कों पर निकलते हैं तो पहाड़ों की सुंदरता के बीच आपको राजधानी भूलने में कुछ ही मिनट लगते हैं. अपनी इसी यात्रा के दौरान आपको कई जगह सड़क किनारे कुछ ऐसी दुकानें दिखेंगी जिनमें मौसमी सब्जियां और फल तो होंगे लेकिन कोई दरवाजा या दुकानदार नहीं. भरोसे की डोर पर टिकीं ये दुकानें आज के दौर में एक अनूठी मिसाल हैं. इन्हें नघालॉह डॉर कहा जाता है. मिजो भाषा में इसका मतलब है बिना दुकानदार की दुकान.

इन दुकानों पर सभी वस्तुओं की कीमत की सूची पहले से टंगी होती है. महंगाई के इस दौर में ये कीमतें आपको कतई महंगी नहीं लगेंगी. साथ में प्लास्टिक का एक डिब्बा रखा होता है. आपको बस यह करना है कि अपनी मनपसंद सब्जी या दूसरी सामग्री उठाइए और उसकी जो भी कीमत है उतने रुपये साथ वाले डिब्बे में डाल दीजिए. आपके पास खुल्ले पैसे नहीं है तो वह हिसाब-किताब भी आप डिब्बे के पैसों से कर सकते हैं. कुछ दुकानों पर चीजें साफ-सफाई के साथ पारदर्शी पॉलीथिन बैगों में रखी जाती हैं. कहीं उन्हें करीने से केले के पत्तों में बांधकर रख दिया जाता है. आपको फलों के जूस भी प्लास्टिक की बॉटल में रखे मिल जाएंगे. हर बॉटल पर उसकी कीमत लिखी होती है.

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नघालाह डॉर अर्थात बिना दुकानदार की दूकान

इन दुकानों की खासबात है कि यहां नापतोल की व्यवस्था नहीं होती. सारे फल-सब्जियां गट्ठर या ढेरी में होते हैं. कीमत भी एक ढेरी या गट्ठर के हिसाब से होती है

मिजोरम में लगभग 87 फीसदी आबादी ईसाई धर्म को मानने वाली है. यह पूर्ण आदिवासी राज्य है और आम धारणा है कि आदिवासी व्यवहार में निश्छल होते हैं. इस आधार पर कहा जा सकता है मिजोरम में यह ‘ईमानदारी की दुकानदारी’ सालों से चल रही होगी. इस राज्य के बारे में आपको धोखा बस इसी बात से मिलेगा.

मिजोरम के लिए भी इन दुकानों का अस्तित्व कोई दशकों पुराना नहीं है. आज से 12 साल पहले की बात है. आइजोल से लगभग 100 किमी दूर एक गांव के किसान वनलाल्डिगा के खेत में सब्जियों की बंपर पैदावार हुई थी. इस गांव तक पहुंचना काफी मुश्किल है और वनलाल्डिगा के लिए यही मुश्किल थी कि इस पैदावार को बाजार तक कैसे ले जाएं. लेकिन सब्जियां तो बेचनी थीं. आखिरकार उन्होंने अपने गांव से 30 किमी दूर आईजोल-चंफाई रोड पर सब्जियों की एक दुकान खोल ली.

पहला दिन निराशा का रहा. सुबह से लेकर शाम हो गई लेकिन दुकान पर कोई ग्राहक नहीं आया. उदास मन से वनलाल्डिगा रात को अपने घर लौट गए. उनके लिए इन सब्जियों का कोई मतलब नहीं था तो उन्होंने इनको दुकान में ही छोड़ दिया. लेकिन अगले दिन सुबह जब वे लौटे तो दुकान से सारी सब्जियां गायब हो चुकी थीं और वहीं एक कोने में कुछ रुपये पड़े हुए थे.

मिजोरम के ग्रामीण समाज में चोरियां न के बराबर होती हैं. इस वजह से आम लोग एक दूसरे पर पूरा भरोसा करते हैं और ‘बिना दुकानदारों की दुकानों’ की बुनियाद भी इसी भरोसे पर टिकी है

वनलाल्डिगा आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. उनके लिए यह नई बात तो थी लेकिन, अपने समाज के मूल्यों को समझने वाला यह ग्रामीण इस घटना से हैरान नहीं था. यह घटना उनके लिए एक सबक बन गई. अगले दिन उन्होंने और ज्यादा सब्जियां अपनी दुकान में रखीं और उनके साथ कीमत की सूची भी टांग दी. अगले दिन भी वही हुआ और इसके साथ ही इस अंचल में एक नई तरह की दुकान अस्तित्व में आ गईं. मिजोरम की यह पहली दुकान थी जिसे स्थानीय लोगों ने नघालॉह डॉर नाम दिया.

इस अंचल में वनलाल्डिगा अकेले किसान नहीं थे जिन्हें अपनी फसल बेचने में दिक्कत आई हो. लेकिन उनकी इस दुकान ने क्षेत्र में एक तरह की क्रांति कर दी. उनके पड़ोसी दूसरे किसानों को भी यह आइडिया इतना भाया कि देखते ही देखते आईजोल-चंफाई रोड पर दसियों नघालॉह डॉर खुल गईं. आज सिर्फ इस रोड पर ही नहीं बल्कि मिजोरम के बाहरी इलाकों में आपको ऐसी कई दुकानें मिल जाएंगी.

नाघलाह डॉर

इन दुकानों की खास बात यह है कि यहां नापतोल की व्यवस्था नहीं होती. सारे फल-सब्जियां गट्ठर या ढेरी में होते हैं. कीमत भी एक ढेरी या गट्ठर के हिसाब से होती है. वनलाल्डिगा एक अखबार को बताते हैं, ‘नापतोल में बहुत झंझट होता है इसलिए हम सभी सामान ढेरी या जोड़ी में बेचते हैं.’

आईजोल-चंफाई रोड मिजोरम की सबसे व्यस्त सड़कों में से है. म्यांमार सीमा पर यह प्रमुख व्यापारिक मार्ग है और इसपर बड़ी संख्या में पर्यटकों की आवाजाही लगी रहती है. इन दुकानों के ज्यादातर ग्राहक पर्यटक ही हैं. नघालॉह डॉर ने ग्रामीण मार्केटिंग की एक ऐसी तकनीक ईजाद की है जहां लोगों को अपना सामान बेचने के लिए बिचौलिए की जरूरत नहीं है. दुकान पर सेल्समैन रखने या कहें कि खुद बैठने की जरूरत नहीं है और फायदा पूरा है. यहां जो समय बचता है उसे दुकान के मालिक खेतों में ही बिताना पसंद करते हैं.

ऐसा नहीं है कि मिजोरम में चोरियां नहीं होतीं लेकिन, ग्रामीण अंचलों में चोरी करने वालों और उनके परिवार को इतनी हिकारत से देखा जाता है कि इनका अपने आप ही सामाजिक बहिष्कार हो जाता है. कुछ स्वभाविक निश्छलता और थोड़े-बहुत सामाजिक भय के मेल की वजह से मिजोरम के ग्रामीण अंचलों में चोरी की घटनाएं न के बराबर होती हैं. मिजोरम के समाज में यह व्यवस्था दशकों से रही है जिसके चलते आम लोग एक दूसरे पर पूरा भरोसा करते हैं. नघालॉह डॉर की बुनियाद में भी यही भरोसा है और सबसे अच्छी बात है कि इन ग्रामीणों की ईमानदारी इतनी संक्रामक है कि यहां आने वाले पर्यटक भी इस भरोसे को नहीं तोड़ते.

साभार: सत्याग्रह

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