संन्यासियों को भीख क्यों माँगना पड़ता है ?

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संन्यासी का मुख्य कर्म होता है स्वयं को जागृत करना और उसके पश्चात समाज को जागृत करना | यदि सभी संन्यासी रामदेव या श्री श्री रविशंकर की तरह व्यवसायी बन जाएँ, या नौकरी करने लगें या खेती करने लगें, तो वे अपने मूल कर्म से भटक जायेंगे |

उदाहरण के लिए कोई व्यापारी अपनी दूकान छोड़ खेती करने लग जाये तो वह न तो दूकान संभाल पायेगा और नहीं खेती ही ठीक से कर पायेगा | जो नौकरी कर रहे हैं, वे समाज को जगाने के लिए नहीं निकल सकते, क्योंकि उन्हें खुद का ही होश नहीं रहता |

इसी प्रकार एक संन्यासी का कर्म है वह समाज को सही राह दिखाए, और उसके लिए उसे मुक्त रहना आवश्यक है | और चूँकि वह कोई व्यापार, नौकरी या खेती आदि से धन अर्जित नहीं कर रहा, इसीलिए ही उसे भिक्षा या दान माँगनी पड़ती है | यह शुद्ध सनातन विनिमय का सिद्धांत है | यदि आपको मेरे विचारों से कोई लाभ मिलता है, तो यह आपका कर्त्तव्य है कि आप मेरा सहयोग करें | यदि नहीं, तो अपना समय व्यर्थ न करें |

कई ऐसे भी लोग यहाँ जुड़े हुए हैं, जिनको मेरे पोस्ट उटपटांग लगते हैं, न जाने वे क्यों यहाँ अपनी टांग अडाए बैठे हैं ? क्या उनके पास इतना फालतू समय है कि जहाँ उनका कोई हित नहीं हो रहा, वहाँ बैठे रहें ?

मेरा तो जो काम है, जिस काम के लिए इस दुनिया में आया हूँ, वही कर रहा हूँ…बिलकुल वैसे ही जैसे आप नौकरी करते हैं, व्यपार करते हैं, खेती करते हैं….बस अंतर इतना ही है कि आप जो कुछ करते हैं, उसके बदले आपको धन तुरंत मिल जाता है या आप लड़ झगड़ कर ले सकते हैं | क्योंकि आप उसे अपना अधिकार मानते हैं | जबकि हम ऐसा नहीं करते | क्योंकि हम आपके दान या भीख पर निर्भर नहीं हैं | हमें तो दो वक्त की रोटी कोई भी कहीं भी खिला देगा और वह भी बिना कोई एहसान जताए, पूरे सम्मान के साथ |

तो हम नहीं लड़ने आयेंगे आपसे कि आपने हमें दान क्यों नहीं दिया….लेकिन सनातन धर्म यही है कि यदि आपको मुझसे कोई लाभ होता है, तो आप कुछ न कुछ अवश्य विनिमय करें | उदाहरण के लिए वृक्ष आपसे कार्बनडाई ऑक्साइड गैस लेता है तो विनिमय में आपको ओक्सिजन देता है | यही सनातन धर्म है |

तो भविष्य में मुझे या किसी और को भिखारी या मुफ्तखोर कहने से पहले अपने गिरेबान में अवश्य झाँक लें कि कहीं आप खुद भिखारी या मुफ्तखोर तो नहीं हैं ?

~विशुद्ध चैतन्य

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