सनातनी होने का आनन्द

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सनातनी होने का आनन्द तो अब आ रहा है जब देखता हूँ कि शाकाहारी समाज, माँसाहारी समाज, हिन्दू समाज, मुस्लिम समाज, संघी समाज, मुसंघी समाज, मोदीवादी समाज, अम्बेडकरवादी समाज, गोडसे उपासक, मोदी उपासक, अम्बेडकर उपासक, साकार उपासक, निराकार उपासक….है भगवान अनगिनत समाज हैं दुनिया में !!!

केवल नाम के ही समाज है, वास्तव में हैं तो सभी दड़बे ही । समाज तो वह होता है, जिसमें सभी परस्पर सहयोगी होते हैं, विपरीत परिस्थितियों में परस्पर सहायक होते हैं । जबकि दड़बों में हर कोई अपने अपने सुखों की चिंता करता है और दूसरे की किसी को कोई चिंता नहीं रहती । मैं सुखी तो सब सुखी का सिद्धांत ही लागू रहता है दड़बों में ।

और आश्चर्य की बात तो यह कि सभी को भ्रम है कि वे दूसरे से श्रेष्ठ हैं ।

यदि मैं सनातनी नहीं होता तो दुनिया इतनी रंग-बिरंगी और मनोरंजक है कभी जान ही नहीं पाता । सनातनी होने के बाद अब अनुभव कर पाता हूँ कि ऊँचें आकाश में उड़ते पक्षियों को कितना मनोरंजक लगता होगा दड़बों में कैद मानवों को श्रेष्ठता के भ्रम में जीते हुए देखना ।

वास्तव में बहुत ही आनन्द दायक है यह अनुभव । किसी दड़बे से मेरी कोई नारजगी नहीं, कोई परहेज नहीं, किन्तु हर दड़बा मुझसे नाराज और हर दड़बे में कोई न कोई मेरा शुभचिंतक !

कल्पना करिये किसी स्कूल का हर विद्यार्थी कहे कि वही टॉपर है । बस यही स्थिति है इन दड़बों में कैद मानवों की ।

मैं मुक्त हूँ इन दड़बों से क्योंकि मैं सनातनी हूँ । मुक्त हूँ महानता की दौड़ से, श्रेष्ठता की दौड़ से क्योंकि मैं सनातनी हूँ । आसमान में उड़ते परिंदे की तरह देख रहा हूँ सभी को दौड़ते हुए श्रेष्ठता और महानता की दौड़ में ।

आनंदम ! आनंदम ! आनंदम !

~विशुद्ध चैतन्य

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