मानवता की परिभाषा क्या है ?

Definition of Humanity
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सोशल मिडिया पर मैंने एक ही प्रश्न दो बार पूछा कि ‘मानवता की परिभाषा क्या है ?’ किन्तु संतोषजनक कोई उत्तर नहीं मिला | इन्टरनेट पर सर्च करके जानने का प्रयास किया, किन्तु वहां भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला | अधिकांश उत्तर ऐसे थे जो मानवता को परिभाषित करने की बजाय, यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे थे कि मानव श्रेष्ठ है सभी प्राणियों में | शायद श्रेष्ठता की परिभाषा उनकी यह है कि मानव ही दुनिया भर के आविष्कार करता है, ऊंची ऊंची इमारतें और प्रतिमाएं बनाता है, चाँद पर जाता है, मंगल पर जाता है, किताबें लिखता है, पढ़ता है….और यह सब कार्य बाकी प्राणी नहीं कर पाते | तो मानव श्रेष्ठ हो गया किन्तु मेरी नजर में ये श्रेष्ठता का मानदंड नहीं हो सकता |

किसी को लगता है कि मुसलमान हो जाना मानवता है, तो किसी को लगता है हिन्दू हो जाना मानवता है | किसी को लगता है कि उसका मजहब ही मानवता सिखाता है और बाकी सभी मजहब पशुता या दानवता सिखाते हैं | किन्तु परिभाषा किसी को नहीं पता |

फिर भी दो कॉमेंट्स ऐसे अवश्य आये जो मानवता को आँशिक रूप से अवश्य परिभाषित करते हैं |

  1. “इंसानियत का अर्थ यही है कि अगर दूसरे का दुःख दूर न कर पाओ तो उसके दुःख को आपस में इतना बांट लो, कि दुःख का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए |”Raj Aryan Suryavanshi
  2. “इस्लाम के अनुसार हर एक को उस का हक़ देना इंसानियत है | ईश्वर, माता-पिता, पति-पत्नी, बेटी-बेटा, भाई-बहन, पड़ोसी, समाज, प्रकृति, ख़ानदान, देश और ख़ुद अपने शरीर का हक़ | और अगर किसी एक के हक़ में कटौती करके दूसरे को ज़्यादा दे रहे हैं वह इंसानियत के विरुद्ध है |”Khursheeid Ahmad

यदि हम सभी सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथो को उठाकर देखें, तो सभी में उपरोक्त विचारों से सम्बंधित बातें अवश्य मिलेंगी, अर्थात सभी धर्म ग्रंथों में अलग अलग रूपों में यही सब समझाया गया है | और सभी सम्प्रदायों की मान्यता है कि उन्हीं का सम्प्रदाय श्रेष्ठ है, उन्हीं के धार्मिक, आसमानी, हवाई किताबों में जो ज्ञान है वही श्रेष्ठ है | सभी मानते हैं कि मानवता का ज्ञान उन्ही के सम्प्रदाय को है, दूसरों को नहीं | और जहाँ ऐसी धारणा या मान्यता व्याप्त हो, वहाँ मानवता नहीं, साम्प्रदायिकता महत्वपूर्ण हो जाता है | जहाँ सम्प्रदायों में होड़ मच जाए श्रेष्ठता की वहाँ मानवता तिरोहित हो जाता है और दानवता का राज स्थापित हो जाता है | किताबी ज्ञान, नैतिकता, धर्म सब किताबी ही रह जाते हैं व्यवहारिक रूप कभी ले ही नहीं पाते | अधिकांश केवल कुछ एक प्रतिशत भले लोगों के पीछे खड़े होकर अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ दिखा रहे होते हैं | जबकि उन सम्प्रदायों में कोई एक प्रतिशत ही ऐसे लोग होंगे जो मानवता को समझते हैं, निभाते हैं, जीते हैं | बाकि सभी केवल गाल बजाते हैं या उपदेश देते हैं या फिर दावत देते फिरते हैं कि हमारी किताबें पढ़ लो, इसमें सारी दुनिया का ज्ञान समाया हुआ है |

तो नैतिकता, धार्मिकता का रट्टामार किताबी ज्ञान मानवता नहीं है | सम्प्रदायों में खंडित मानसिकता मानवता नहीं है | मानवता तो समस्त मानव जाती के लिए है, किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए नहीं | यह और बात है कि हर सम्प्रदाय यही मानता है कि उनका साम्प्रदायिक नैतिकता, धार्मिकता, कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ, रीतिरिवाज, मत-मान्यताएँ समस्त मानव जाति के लिए है | और सभी सम्प्रदाय यही मानते हैं कि चाहे उनके सम्प्रदायों में लाख मतभेद हों, चाहे सभी आपस में ही लड़ते मरते रहते हों, चाहे उनके अपने ही सम्प्रदाय में उंच नीच हो, चाहे उनके अपने ही सम्प्रदाय के शोषितों पीड़ितों की सहायता उनका अपना ही समाज न करता हो…फिर भी वे मानते हैं कि उनका सम्प्रदाय ही सही अर्थों में मानवता को महत्व देता है |

और ऐसी मानसिकता यही सिद्ध करती है कि मानवता यानि इंसानियत की समझ ही नहीं है किसी को | किसी को परिभाषा ही नहीं पता मानवता की | और जब मानवता की परिभाषा ही नहीं पता, तो फिर मानवता निभाएंगे कैसे और जियेंगे कैसे ? ऐसे लोग तो केवल साम्प्रदायिकता ही निभायेंगे और साम्प्रदायिकता ही जियेंगे |

देखा जाए तो सभी समझाते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, सभी समझाते हैं कि परोपकार करो, प्रेम करो, दूसरों की सहायता करो…किन्तु ये सभी नैतिक बातें किताबें ही अधिक जान पड़ती है क्योंकि आचरण में लाते हुए बहुत ही कम लोग दिखाई देते हैं | अर्थात ये ज्ञान भी मानवता नहीं है |

तो फिर मानवता क्या है मानवता की परिभाषा क्या है ?

यह विडियो देखिये…क्या इस विडियो में जिनके विषय में बताया जा रहा है, वे मानवता ही निभा रहे थे ?

10 ऐसी सच्ची घटनाए जो इंसानियत पे फिरसे विश्वास करने के लिए मजबूर कर देगी।

10 ऐसी सच्ची घटनाए जो इंसानियत पे फिरसे विश्वास करने के लिए मजबूर कर देगी।

Posted by Now INDIA on Tuesday, November 13, 2018

अब नीचे एक कहानी दे रहा हूँ…क्या यह है मानवता है ?

एक डॉक्टर को जैसे ही एक अकस्मात् सर्जरी के बारे में फोन करके बताया गया. वो जितना जल्दी वहाँ आ सकते थे आ गए, वो तुरंत ही कपडे बदल कर ऑपरेशन थिएटर की और बढे. डॉक्टर को वहाँ उस लड़के के पिता दिखाई दिए, जिसका इलाज होना था. पिता डॉक्टर को देखते ही भड़क उठे और चिल्लाने लगे……

“आखिर इतनी देर तक कहाँ थे आप? क्या आपको पता नहीं है, की मेरे बच्चे की जिंदगी खतरे में है? क्या आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है? आप का कोई कर्तव्य है या नहीं ? ” डॉक्टर ने हल्की सी मुस्कराहट के साथ कहा- “मुझे माफ़ कीजिये, मैं हॉस्पिटल में नहीं था, मुझे जैसे ही पता लगा, जितनी जल्दी हो सका मैं आ गया. अब आप शांत हो जाइए, गुस्से से कुछ नहीं होगा”

ये सुनकर पिता का गुस्सा और चढ़ गया, भला अपने बेटे की इस नाजुक हालत में वो शांत कैसे रह सकते थे. उन्होंने कहा- “ऐसे समय में दूसरों को संयम रखने का कहना बहुत आसान है, आपको क्या पता की मेरे मन में क्या चल रहा है। अगर आपका बेटा इस तरह मर रहा होता तो क्या आप इतनी देर करते, यदि आपका बेटा मर जाए अभी, तो आप शांत रहेगे? कहिये ?” डॉक्टर ने स्थिति को भांपा और कहा- “किसी की मौत और जिंदगी ईश्वर के हाथ में है। हम केवल उसे बचाने का प्रयास कर सकते है। आप ईश्वर से प्रार्थना कीजिये, और मैं अन्दर जाकर ऑपरेशन करता हूँ” ये कहकर डॉक्टर अंदर चले गए। करीब 3 घंटो तक ऑपरेशन चला। लड़के के पिता भी धीरज के साथ बाहर बैठे रहे। ऑपरेशन के बाद जैसे ही डाक्टर बाहर निकले, वे मुस्कुराते हुए, सीधे पिता के पास गए और उन्हें कहा- “ईश्वर का बहुत ही आशीर्वाद है, आपका बेटा अब ठीक है।

अब आपको जो भी सवाल पूछना हो पीछे आ रही नर्स से पूछ लीजियेगा, ये कहकर वो जल्दी में चले गए। उनके बेटे की जान बच गयी इसके लिए वो बहुत खुश तो हुए, पर जैसे ही नर्स उनके पास आई, वे बोले: “ये कैसे डॉक्टर है, इन्हें किस बात का गुरुर है, इनके पास हमारे लिए जरा भी समय नहीं है.” तब नर्स ने उन्हें बताया: कि ये वही डॉक्टर है जिसके बेटे के साथ आपके बेटे का एक्सीडेँट हो गया था, उस दुर्घटना में इनके बेटे की मृत्यु हो गयी, और जब उन्हें फोन किया गया, तो वे उसके क्रियाकर्म कर रहे थे और सब कुछ जानते हुए भी वो यहाँ आए और आपके बेटे का इलाज किया। नर्स की बाते सुनकर बाप की आँखो मेँ आँसू बहने लगे । क्या यही इन्सानियत यानी मानवता की सही परिभाषा ?

क्या उपरोक्त विडियो और कहानी में मानवता ही दिखाया या बताया गया है ?

मेरे विचार से तो बिलकुल भी नहीं | उपरोक्त दोनों ही उदाहरणों में मानवता के विषय में कोई चर्चा नहीं हुई, अपितु केवल व्यक्ति विशेष द्वारा स्वविवेकानुसार लिए गये निर्णय ही थे वे | अर्थात उन्होंने जो किया वह मानवता नहीं, उनकी व्यक्तिगत रूचि थी दूसरों का हित करने की | जैसे दशरथ माँझी ने पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया..वह उसकी अपनी सनक थी न कि मानव प्रजाति का मूल स्वभाव या आचरण | बिलकुल वैसे ही जैसे कोई संन्यासी होने का निर्णय ले ले या कोई अपना जीवन परोकार में लगाने का निर्णय ले ले |

किन्तु इसे मानवता नहीं कहा जा सकता क्योंकि मानवता वह माना जाएगा जो मानवों की मूल प्रवृति हो | अर्थात अपवादों को छोड़कर सभी की पहचान हो, सभी का आचरण हो | उदाहरण के लिए कोई शेर किसी हिरण की रक्षा करे, तो वह अपवाद है | भेड़ियों का कोई समूह किसी मानव के बच्चे को पाल पोस कर बड़ा करे, तो वह अपवाद है | कुत्ते को बिल्ली से दोस्ती हो जाये, यह अपवाद है | बिल्ली दोस्त बन जाए चूहे की यह अपवाद है | बिल्ली दूध की रखवाली करने लगे यह अपवाद है | सामान्यतः ये उनके मूल गुणधर्म के विरुद्ध है |

यदि दशरथ माँझी ने जो किया वह मानवता होती, तो दशरथ मांझी का कृत्य अपवाद नहीं होता, सारा गाँव उसके साथ लगा होता | उसे अकेला भूख से मरने के लिए छोड़कर सारा गाँव न भाग गया होता, जब अकाल पड़ा था | यदि परोपकार मानवता होता तो किसी भी समाज में कोई भूखा, गरीब, शोषित पीड़ित नहीं देखने मिलता | तो परोपकार भी मानवता नहीं है |

फिर मानवता है क्या ?

सामान्य दृष्टि से देखने पर जो मुझे समझ में आया है, वह यह कि साम्प्रदायिकता ही मानवता है | या फिर धार्मिक कर्मकाण्ड करना, पूजा नमाज करना, धार्मिक ग्रंथों का रट्टा लगाना, धर्म व जाति के नाम पर कुत्ते बिल्लियों की तरह लड़ना, धूर्त, मक्कार, रिश्वतखोर अधिकारीयों व नेताओं की जय जय करना, ईश्वर से भयभीत होने का ढोंग करना और अधर्मियों, गुण्डे-मवालियों के सामने नतमस्तक हो जाना, बेईमानों का साथ देना और ईमानदारों को दुत्कारना ही मानवता है |

यह मैं इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि मानव प्रजातियों में सर्वाधिक यही चलन में हैं | समाज चाहे  कोई भी हो, सम्प्रदाय कोई भी हो, उनकी मत-मान्यताएं, रीतिरिवाज, खान-पान कुछ भी हो, किन्तु सभी में अपवादों को यदि अनदेखा कर दें, तो सभी अधर्मियों के सामने नतमस्तक ही मिलेंगे | अर्थात अधर्म के पक्ष में रहना, अधर्मियों की जय जय करना ही मानवता है | और यह मानवता इसीलिए है क्योंकि पशु-पक्षी ऐसा नहीं करते | ऐसा करने की विशिष्ट योग्यता केवल मानवों को ही प्राप्त है | अर्थात मानव जो भी नैतिकता या धार्मिकता पढ़ाता या सिखाता है, उसी के विरुद्ध आचरण करना ही मानवता है | अब कुछ लोग अपवाद निकल आते हैं और अधर्मियों के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं | कुछ लोग अपवाद निकल आते हैं और परोपकार करने लगते हैं | लेकिन उनकी संख्या इतनी कम है कि उन्हें मानवता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता | मानवता तो वही माना जाएगा जो बहुमत अपनाएगा | मानवता तो वही माना जाएगा जो सम्पूर्ण मानव जाति अपनाती हो अपवादों को छोड़कर |

मानवता की आधुनिक परिभाषा

पशुता क्या है वह हम सब जानते ही हैं किन्तु में पशुओं में भी कुछ सरफिरे निकल ही आते हैं जो पशुता के विरुद्ध आचरण करते हैं और अपनी प्रजाति से अलग प्रजाति से प्रेम कर बैठते हैं | पशुओं में भी कई ऐसे अधर्मी, काफिर होते हैं जो पशुता से अलग गुणधर्म अपना लेते हैं और क्रूरता करने की बजाय दया करने लगते हैं | पशुओं में भी ऐसे कई सरफिरे होते हैं जो किसी की जान लेने की बजाय बचाने लगते हैं | हम उन्हें अपवाद कहते हैं या भटके हुए कह सकते हैं | क्योंकि वे पशुता से भटक गये और ऐसे कार्यों में लिप्त हो गये, जो पशु समाज में अधर्म माना जाता है |

ठीक इसी प्रकार से कुछ लोग जो परोपकार करने लगते हैं, वे अपवाद हैं | जो धर्म व जाति के आधार पर किसी से नफरत नहीं करते, किसी से बैर नहीं रखते वे अपवाद हैं | जो धूर्त-मक्कार नेताओं, धर्म व जाति की राजनीती करने वाले राजनीतिज्ञों, गुंडों, मवालियों का समर्थन नहीं करते, खुलकर उनका विरोध करते हैं, वे अपवाद हैं | अर्थात वे बहुसंख्यक मानव समाज द्वारा निर्धारित मानवता के विरुद्ध आचरण कर रहे हैं और समाज ऐसे लोगों को बड़े ही हिकारत की नजर से देखता है, उन्हें पाकिस्तानी, देशद्रोही, अधर्मी कहता है | इसीलिए ऐसे लोगों को कठिनाइयों का सामना अधिक करना पड़ता है | आर्थिक सहयोग भी न के बराबर मिलता है | जबकि दंगा-फसाद करने या करवाने वालों को खुलकर मानव समाज सहयोग करता है उन्हें देशभक्त कहता है, सच्चा धार्मिक कहता है | धर्म व जाति के नाम पर आपस में लड़वाने वालों को, सबसे अधिक आर्थिक व सामाजिक सहयोग मिलता है | ऐसे नेताओं को जनता अपने सर पर बैठाकर नाचती है |

इस आधार पर मानवता की परिभाषा या यह कहें कि आधुनिक परिभाषा इस प्रकार होगी:

धर्म व जातियों के आधार पर कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ने, परस्पर मार-काट करने, गुंडे-मवालियों को सर माथे पर बैठाने, धूर्त मक्कार, जुमलेबाज, घोटालेबाज, अपराधी प्रवृति के नेताओं की जय जय करने की प्रवृति ही मानवता है | अपने समाज के शोषितों, पीड़ितों की सहायता करने के स्थान पर शोषकों, अत्याचारियों के पक्ष में खड़े रहना ही मानवता है | यदि अपने ही समाज के किसी किसान या आदिवासी की भूमि माफिया हड़पते हैं तो किसान या आदिवासी का साथ देने की बजाय माफियाओं का साथ देना या फिर मौन धारण कर लेना ही मानवता है | आत्मनिर्भर होने के लिए प्रयास करने के स्थान पर आरक्षण व सरकार भरोसे बैठे रहना ही मानवता है |

संक्षेप में कहें तो परोपकार, दया, करुणा, परस्पर सहयोगिता, आत्मोत्थान, आत्मनिर्भरता के विरुद्ध आचरण और साम्प्रदायिक वैमनस्यता व घृणा का समर्थन करना ही मानवता है |

~विशुद्ध चैतन्य

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