आपको गुरु मिला ?

गुरु कि खोज में भटक रहे लोगों को देखता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे कोई मानसरोवर में पानी की बूंद खोज रहा है |

काफी पुरानी बात है एक सज्जन मिले मुझे और बताया कि वे आसाराम को अपना गुरु मानते हैं | उन दिनों उनके लड़के का आना जाना रहता था हमारे स्टूडियो में तो मैं लगभग परिचित ही था आसाराम जी से भी | तो मैंने कहा यह तो बहुत ही अच्छी बात है कि आपको गुरु मिल गया |

उन्होंने मुझसे पूछा, “कि आपको गुरु मिला ?”

मैंने कहा” “मैं यह तो नहीं कह सकता कि मुझे गुरु मिला या नहीं मिला, लेकिन गुरु की खोज अब समाप्त हो गयी है मेरी | अब मैं स्वेट मार्टिन, डेल कार्नेगी, ओशो आदि को पढ़ता हूँ तो मुझे नहीं लगता कि मुझे किसी और गुरु को खोजने की आवश्यकता है |”

“अरे कैसी मुर्ख आदमी हो तुम भी ?” ये भी भला कोई गुरु हैं ? और ओशो तो महा ठरकी है… सम्भोग की बातें करता है… विदेशी लड़कियां रखता है…. अरे दो नम्बरी है वह | मेरे साथ चलो कल आश्रम में… पास ही तो है… देखो एक बार दर्शन कर लोगे तो जिंदगी बन जाएगी | और वे भी आप जैसे नौजवान से मिलकर खुश होंगे |” वह सज्जन बड़ी गर्मजोशी से बोले |

“अरे उसके लड़के कि रिकार्डिंग है दो चार दिन बाद फिर आयेगा उसे ही देख कर धन्य होजाता हूँ और अधिक धन्य नहीं होना मुझे |” यह कहकर मैं अपने काम में लग गया |

कुछ महीने बाद वही सज्जन फिर मिले और मोरारी बापू के गुणगान करने लगे और मुझे कहा कि चलो मोरारी बापू से मिलवा देता हूँ | मैंने कहा, “अरे आप मेरे पीछे क्यों पड़े हैं ? आपको गुरु मिल गया तो झेलिये उन्हें, मुझे क्यों घसीटते हैं ? अब क्या हुआ आसाराम को छोड़ दिया ?”

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“नहीं यार.. वहाँ बात कुछ जमी नहीं, मोरारी बापू की बातों में बहुत दम है…. …”

इसी प्रकार वे साल छह महीने में किसी न किसी नये गुरु के गुणगान करते दिख जाते थे और दुर्भाग्य से मैं बहुत ही अहंकारी व्यक्ति हूँ और खुद को ही खुद का गुरु मानता था ओशो, विवेकानंद, आदि को पढ़ने से पहले तक | तो उनके किसी भी गुरु का प्रभाव मुझपर नहीं पड़ता था…. फिर एक दिन वे स्टूडियो में आये और सम्भोग से समाधी तक नाम कि पुस्तक को अखबार से कवर करके ऐसे लेकर आये जैसे कामसूत्र की पुस्तक लेकर आये हों | और मुझे कण्ट्रोल रूम में अकेला पाकर वह पुस्तक निकालकर दिखाई | मैंने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा, “अरे !!! ये किताब आपके हाथ में ? आपको तो घोर नरक भोगना पड़ेगा |”

वह बोले, “अरे नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं है | मैं तो आपको देने के लिए लाया था छुपाकर |”

मैंने कहा कि मैंने पढ़ रखी है और घर में पडी हुई है | लेकिन अब क्या हुआ फिर गुरु बदल लिया ?

वह बोला, “समझ में नहीं आ रहा यार कोई भी गुरु जम ही नहीं रहा और बिना गुरु के गति नहीं होती इसलिए कोई ढंग का गुरु ढूंढ रहा हूँ |”

मैं मुस्कुरा कर बोला, “क्या आप इस योग्य हो गये कि गुरु की परीक्षा ले सको और पहचान कर सको कि कौन सा गुरु सही है और कौन नहीं ?”

वह फिर दोबारा कभी नहीं दिखा और अब मैं उसका नाम और चेहरा भी भूल गया | बस एक स्वप्न की धूमिल यादें है कि ऐसा कुछ हुआ था उसी के आधार पर लिखा यह पोस्ट | और ध्यान रखें दूध का धुला गुरु कोई नहीं होता और कोई गुरु ऐसा भी नहीं होता जिसमें कोई दोष न हो | अगर आप बांसुरी सीखना चाहते हैं तो गुरु की कला व दक्षता पर ध्यान दें, न की उसके व्यक्तिगत जीवन में | हो सकता है वह दारुबाज हो रंडीबाज हो….और सौ बुराइयाँ हों उसमें | लेकिन यदि केवल बांसुरी ही सीखना है और उससे अच्छा गुरु कोई और नहीं मिल रहा आपको तो उसे ही गुरु माने | हाँ यदि वह कोई ऐसा अनाचार करता है जो किसी के जान-माल का नुक्सान कर सकता है तो फिर उससे दूरी बना लें या फिर उसे सजा दिलवाएं |

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सारांश यह कि दुनिया में कोई भी इस योग्य नहीं है कि वह योग्य गुरु को खोज पाए, और न ही कोई गुरु ही इस योग्य है कि वह योग्य शिष्य को खोज पाए, ये दोनों ही प्रकृति के नियमों के अंतर्गत आपस में मिलते हैं और आकस्मिक मिलते हैं | शर्त बस इतनी सी है है कि शिष्य को पता होना चाहिए कि गुरु में खूबियाँ क्या हैं और गुरु को पता होना चाहिए कि शिष्य में खूबियाँ क्या है | और दोनों के बीच पिता-पुत्र से भी अधिक घनिष्ठता हो जाए तो भीष्म, कर्ण, अर्जुन जैस शिष्य आस्तित्व में आते है और द्रोण, विश्वामित्र, ब्रहस्पति जैसे गुरु |~विशुद्ध चैतन्य

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