साम्प्रदायिक नेताओं की रूचि केवल साम्प्रदायिकता में होती है, राष्ट्र निर्माण में नहीं

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किसी भी सांप्रदायिक नेता या पार्टी को देश सौंपने का अर्थ है सामाजिक व आर्थिक विकास का पतन और मंदिर, मस्जिद के लिए लड़ते दिमाग से पैदल धर्मांध | साम्प्रदायिक पार्टियों व नेताओं की बुद्धि उतनी ही विकसित होती है, जितनी कि किसी दिमाग से पैदल अंधभक्त की होती है | ये शहरों का विकास करने योग्य नहीं होते, इसीलिए नाम बदलते फिरते हैं | इनकी योग्यता इतनी ही होती है कि दूसरों की संपत्ति और कार्यों पर अपना नाम चेप दें | ये आदिकाल से यही करते हैं और अनंतकाल तक यही करते रहेंगे क्योंकि ये न तो कुछ नवीन खोज सकते हैं और नहीं कुछ नव निर्माण कर सकते है | इनकी बुद्धि हज़ार वर्ष पहले लिखी किताबों पर ही अटक कर रह गयी, उससे आगे बढ़ी ही नहीं |
 
लेकिन यदि किसी सनातनी या सेक्युलर नेता या पार्टी को सत्ता मिलती है, तो वह नाम बदलने के चक्कर में नहीं पड़ा रहेगा, वह कुछ नया करेगा और पहले किये कार्यों से श्रेष्ठ करेगा, ताकि लोग पुराने नाम स्वतः ही भूल जाएँ और नए को याद रखें |
 
यदि किसी सनातनी या सेक्युलर को सत्ता मिलती है, तो वह साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाने में अपना समय व्यर्थ नहीं करेगा, बल्कि साम्प्रदायिकता से मुक्त राष्ट्रीयता को महत्व देने वाले समाज का निर्माण करेगा | वह किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन नहीं करेगा, लेकिन इस बात का ध्यान अवश्य रखेगा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आड़ में कोई समाज या राष्ट्र को क्षति न पहुँचाये, साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने न पाए |
 
साम्प्रदायिक नेताओं की रूचि केवल साम्प्रदायिकता में होती है, राष्ट्र निर्माण में नहीं | ये नेता तो अपने ही सम्प्रदायों के शोषितों पीड़ितों की कोई सहायता नहीं कर पाते तो राष्ट्र की चिंता भला कहाँ से कर पाएंगे ?
 
सनातनी नेताओं या व्यक्तियों से साम्प्रदायिक समाज इसीलिए भयभीत रहता है, क्योंकि उन्हें भय रहता है कि कहीं ये उनके सम्प्रदाय का ही अहित न कर दे |
 
तो स्पष्ट कर दूं कि सनातनी और कम्युनिस्टों में जमीन आसमान का अंतर होता है | लोग अक्सर भ्रम में पड़ जाते हैं सनातनियों के विचारों से | सनातनी सर्वधर्म समभाव की बात अवश्य करता है, लेकिन साम्प्रदायिकता को धर्म नहीं मानता | यदि आप हिन्दू हैं और हिन्दुओं के हितों के लिए खड़े हैं, तो अच्छी बात है | यदि आप मुस्लिम हैं और मुस्लिमों के हितों के लिए खड़े हैं तो अच्छी बात है | यदि आप आदिवासी हैं और आदिवासियों के हितों के लिए खड़े हैं तो अच्छी बात है | किन्तु एक सनातनी किसी हिन्दू, किसी मुस्लिम, किसी आदिवासी को महत्व नहीं देता, वह केवल राष्ट्र व राष्ट्र के नागरिकों महत्व देता है | वह किसी को हिन्दू, मुस्लिम, आदिवासी, अनुसूचित जाति, सवर्ण दलित के रूप में नहीं देखता, केवल इंसान के रूप में देखता है | और राष्ट्र के नागरिक को सुख सुविधायें मिलनी चाहिए, जो सम्मान मिलना चाहिए, जो अधिकार मिलना चाहिए उसे ही प्राथमिकता देता है |
 
~विशुद्ध चैतन्य

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