चैतन्यता की परिभाषा

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जब तक आप चैतन्य नहीं हो जाते, तब तक आप दूसरों के द्वारा थोपी गयी धारणाओं और मान्यताओं से मुक्त नहीं हो पाते । आप इस भ्रम में जीते हैं कि आप ही सही हैं और सामने वाला गलत । अर्थात चैतन्यता की परिभाषा भी आपकी स्वयं जानी या अनुभव की हुई नहीं, अपितु थोपी हुई ही होती है |

यदि आप किसी व्यक्ति या विचारों से प्रभावित भी होते हैं, तो भी आप उसके व्यक्तिव व विचारों से नहीं, अपनी ही मान्यताओं व धारणाओं से प्रभावित रहते हैं । अर्थात यदि आप कांग्रसी हैं, तो कांग्रसी से प्रभावित होंगे चाहे वह दुनिया भर के बकवास ही क्यों न करता हो । यदि आप शाकाहारी हैं, तो शाकाहारी से प्रभावित होंगे, चाहे वह महान जुमलेबाज ही क्यों न हो ।

वहीं यदि आपकी मान्यताओं व धारणाओं के विरुद्ध कोई हो, तब उसके विचार या व्यक्तित्व कितने ही अच्छे क्यों न हों, कितने ही कल्याणकारी क्यों न हों, आपको प्रभावित नहीं कर पाएंगे । आपको आकर्षित नहीं कर पाएंगे ।

लेकिन यदि आप चैतन्य हैं, तो आप थोपी हुई मान्यताओं व धारणाओं से मुक्त होंगे और स्वयं की रुचि व अरुचि से परिचित हो जाएंगे । तब आपका किसी व्यक्ति या विचारों से प्रभावित होने का अर्थ बिल्कुल अलग हो जाएगा । अर्थात तब आप प्रभावित होंगे अंगुलिमाल की तरह और रूपांतरित हो जाएंगे । तब आप प्रभावित होंगे सम्राट अशोक की तरह और रूपांतरित हो जाएंगे ।

आप शाकाहारी से माँसाहारी हो सकते हैं या माँसाहारी से शाकाहारी । आप कांग्रेसी से भाजपाई हो सकते हैं या भाजपाई से कांग्रेसी । अर्थात जो आपकी मान्यता या धारणा हैं, उसके बिल्कुल विपरीत हो जा सकते हैं । क्योंकि तब आप सत्य को महत्व देंगे, क्योंकि तब आप धर्म को महत्व देंगे, न कि थोपी हुई मत-मान्यताओं को ।

आप मुक्त हो जाएंगे भेदभाव से । आपको तब न शाकाहारी महान दिखाई देंगे और न ही माँसाहारी निकृष्ट । तब न तो भाजपाई राष्ट्रभक्त दिखाई देंगे और न ही कांग्रेसी राष्ट्रद्रोही । न तो हिन्दू राष्ट्रभक्त दिखाई देंगे और न ही मुस्लिम राष्ट्रद्रोही । क्योंकि तब आप थोपी हुई मान्यताओं से मुक्त हैं । अब आप किसी को सही या गलत केवल उसके द्वारा किये जा रहे व्यवहारों के आधार पर कहेंगे, न कि थोपी हुई मान्यताओं व धारणाओं के कारण ।

वास्तव में कोई भी व्यक्ति किसी के विचारों से प्रभावित नहीं होता, अपितु अपने विचारों व प्रकृति से मेल रखने वाले प्रमुख व्यक्तियों के प्रति आकर्षित होता है | अर्थात व्यक्ति स्वयं की मान्यताओं व धारणाओं से अधिक आसक्त रहता है जब तक वह स्वयं चैतन्य नहीं हो जाता । और जो चैतन्य नहीं हो पाता, उसके लिए चैतन्यता की परिभाषा भी किताबी होता है ।

अर्थात यदि कोई उससे कहे कि वह चैतन्य है, तो वह सामान्य व्यक्ति अपनी थोपी हुई मान्यताओं के आधार पर तुलना करेगा कि किताबों में जैसा लिखा है, वैसा है या नहीं । वह गौतम बुद्ध से तुलना करेगा, वह महावीर से तुलना करेगा, वह मोहम्मद से तुलना करेगा, वह क़ुरान में खोजेगा, वह गीता में खोजेगा, वह विज्ञान की किताबों में खोजेगा । और अंत में चैतन्य व्यक्ति को भी घसीट कर वहीं ले जाना चाहेगा, जहाँ हज़ारों वर्ष पहले उसके पूर्वज छोड़ गए थे । उसके लिए चैतन्य होने का अर्थ हो जाएगा बुद्ध की तरह भीख मांगते हुए भटकना । उसके लिए चैतन्य होने का अर्थ हो जाएगा महावीर की तरह निर्वस्त्र घूमना । स्वयं को चैतन्य कहने वाला व्यक्ति यदि कहे कि उसने स्वप्न देखा, तो तुरन्त कहेंगे कि गौतम बुद्ध को तो स्वप्न नही आते थे ? यानी जिसे स्वप्न नहीं आते वह चैतन्य है यही उसकी मान्यता या धारणा होगी ।

चैतन्यता की परिभाषा वास्तव में यह है कि व्यक्ति परम्पराओं, व धारणाओं से पुर्णतः मुक्त हुआ | उसकी तुलना किसी धार्मिक ग्रन्थ, किसी ऐतिहासिक चरित्र, या किसी वैज्ञानिक सिद्धांत से नहीं की जा सकती | उसे उसी की मौलिकता में स्वीकारना होगा, उसे उसके वर्तमान रूप में ही स्वीकारना होगा तभी आप उसे यानि चैतन्य व्यक्ति  को समझ पाएंगे, तभी आप नवीनता का साक्षात्कार कर पाएंगे | चैतन्य व्यक्ति सदैव अपवाद ही होगा अर्थात वह आपकी मान्यताओं व धारणाओं के विरुद्ध ही होगा यदि आपकी मान्यताएं खोखली हैं, किताबी हैं, पूर्वजों द्वारा थोपी गयीं हैं |

~विशुद्ध चैतन्य

राजनैतिक व सामाजिक व्यंग्य संग्रह की यह पुस्तक सोशल मिडिया पर मेरे द्वारा लिखे गये लेखों का संग्रह है | मैं सीरीज के रूप में अपने लेखों का संग्रह EBOOK के रूप में आप सभी के सामने ला रहा हूँ | यदि पुस्तक आपको पसंद आती है और मुझे इतना आर्थिक लाभ प्राप्त हो जाता है इन EBOOKS से कि मैं कागजी किताब छपवा सकूं, तो अवश्य छपवाऊंगा डिमाण्ड पर | तब तक आप अपनी राय अमेज़न की साईट पर मुझे दे सकते हैं | पुस्तक की कीमत अवश्य अधिक रखी है मैंने, ताकि केवल वही लोग खरीदें, जिनकी रूचि है पढ़ने में |

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