परिभाषा आत्मनिर्भरता और दान की

क्या आप आत्मनिर्भर हैं और ऐसा मानते हैं कि दान-दक्षिणा पर निर्भर संन्यासी आत्मनिर्भर नहीं होते और समाज व देश पर बोझ हैं ?

अक्सर मुझे सुनना पड़ता है कि मुफ्त का खाने मिलता है इसीलिए लोग संन्यासी बने घूमते हैं | कोई कहता है कि मेहनत कर लिया करो, खुद कमाओ काहे को भीख मांगते फिरते हो ! किसी की नजर में मुफ्तखोर तो किसी की नजर में हरामखोर तो किसी की नजर में समाज और देश पर बोझ होते हैं संन्यासी | इन्हीं सब धारणाओं और मान्यताओं को ध्यान में रखकर ही मैंने इस विषय पर विस्तार से लिखने का मन बनाया | तो सबसे पहले यह समझते हैं कि आत्मनिर्भरता क्या है ?

आत्मनिर्भरता

जिस प्रकार साम्प्रदायिकता को धर्म बना दिया समाज ने, जिस प्रकार दिव्यांग का अर्थ विकलांग बना दिया समाज ने, ठीक उसी प्रकार मजदूरी, Slavery, नौकरी, व्यापार को ही आत्मनिर्भरता मान लिया समाज ने | अक्सर जिसे नौकरी मिल जाये, या कोई बिजनेस करने लग जाए वह स्वयं को आत्मनिर्भर मानने लगता है और कोई उसके दरवाजे पर कोई भिक्षुक दान माँगने आ जाये तो वह भिखारी कहकर पूरे अधिकार से दुत्कारने का अधिकारी हो जाता है | उसे लगता है कि भिक्षुक आत्मनिर्भर नहीं है, जबकि वह आत्मनिर्भर है | और जो आत्मनिर्भर नहीं होता उसे दुत्कारने का अधिकार हर किसी को होता है |

तो सबसे पहले तो यह समझ लीजिये ठीक से कि इस दुनिया में तो क्या, पूरे ब्रह्माण्ड में कोई भी आत्मनिर्भर नहीं है | क्योंकि प्रत्येक जीव ही नहीं, ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण परस्पर निर्भर है | हमारा शरीर ही कई कोशिकाओं का समूह मात्र है जो परस्पर निर्भर है | एक व्यापारी बिना ग्राहक के व्यर्थ है और एक उपभोक्ता बिना विक्रेता के व्यर्थ है | आप स्वयं अपने आपको देखिये कि आप स्वयं कितने लोगों पर निर्भर हैं | लिस्ट बनाइये उन लोगों की, जिनके बिना आप ठाठ-बाट से जी सकते हैं | कुछ भी नहीं तो आप किसानो पर निर्भर हैं ही, क्योंकि किसान अन्न न उपजाएँ, फल न उपजाएँ, तो आप भूखों मर जायेंगे |

आत्मनिर्भरता का अर्थ एकांकी होना नहीं होता | और न ही भिखारियों को भीख देकर आप कोई एहसान करते है | फिर भिखारी और संन्यासी में जमीन आसमान का अंतर होता है | भिखारी हैं क्योंकि आपका समाज उनकी चिंता नहीं करता | यदि आपका समाज उनकी चिंता कर रहा होता, आपका धर्म और धर्मों के ठेकेदारों को उनकी चिंता होती, यदि उन्हें भीख माँगता देख आपकी धार्मिक भावनाएं आहत होतीं, तो आपका समाज, आपकी सरकार उनके लिए यथोचित व्यवस्था करती | तो दोषी आपका समाज ही है किसी को भीख मांगने के लिए विवश करने का |

जबकि संन्यासी किसी विवशता में दान नहीं माँगता | वह दान माँगकर आप पर दया ही कर रहा होता है, वह करुणा ही लुटा रहा होता है, वह आपको कंजूस, मक्खीचूस, स्वार्थी होने से बचा रहा है | आप उसे दान नहीं भी देंगे तो उससे कोई अंतर नहीं पड़ने वाला, और न ही भिखारियों की तरह आपके गले पड़ने वाला है | भिखारियों की तरह संन्यासी आपके दिए हुए दान से अपने लिए कोठी-बंगला नहीं खड़े कर रहे होते | बल्कि वे आपके दिए दान से अधिकांश परोपकार में ही खर्च करता है | संन्यासियों को यदि कोई वाहन भी दान करता है, तो भी उस वाहन का उपयोग वह गाँवों में घुमने, समाज को जागृत करने के लिए उपयोग करता है |

संन्यासी होने का अर्थ ही है, समस्त संसार का ट्रस्टी यानि संरक्षक होना | संन्यासी समाज को चैतन्य करने का निरंतर प्रयास करते रहते हैं अपने अपने अंदाज़ में |

और आपने यह कैसे मान लिया कि संन्यासी आत्मनिर्भर नहीं होता ? क्या आपने भीख नहीं दिया तो वह मर गया ? क्या वह आप पर निर्भर था ? जो भी भीख उसे दे रहा है, क्या वह उसपर निर्भर है ? नहीं….वह तो ईश्वर पर निर्भर होता है | कोई न कोई उसे दे ही देगा और जो देता है, वह उसपर भी निर्भर नहीं है | क्योंकि जो एक बार उसे भीख दे देता है, वही उसे हर बार भीख देगा यह आवश्यक तो नहीं ? तो यह कैसे कह सकते है कि वह आत्मनिर्भर नहीं है ?

दान और भीख में अंतर

यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि दान और भीख में अंतर होता है | दुर्भाग्य से समाज को अभी तक दान और भीख का अंतर भी नहीं पता |

दिखने में दोनों ही एक जैसे लगते हैं, लेकिन दोनों में बहुत ही बड़ा अंतर है | भीख देते समय आप स्वयं को महान समझते हैं और भीख माँगने वालों के प्रति दया का भाव रखते हैं | और दया करके आप उनकी तरह एक दो सिक्के उछाल देते हैं | उन सिक्कों से न तो तो उसकी भूख मिटेगी और न ही उसकी आवश्यकता पूरी होगी | भीख देना कुछ वैसा ही होता है, जैसे किसी प्यासे को एक दो बूँद पानी पिलाना इस आशा में कि बाकी लोग भी एक दो बूँद पानी देंगे देंगे ही तो दिन भर में उसे गिलास भर पानी मिल ही जायेगा और उसकी प्यास बुझ जायेगी | वास्तव में आप भिखारी को विवश कर रहे होते हैं कि वह और कई लोगों से भीख माँगकर अपनी आवश्यकता पूरी करे | वास्तव में आप उस पर दया भी नहीं कर रहे होते, केवल दयावान होने का ढोंग कर रहे होते हैं और वह भी इस आशा से कि बदले में पुण्य मिल जाएगा, क्योंकि किताबों में कहीं ऐसा लिखा है |

जबकि दान देने वाले की स्थिति भीख देने वाले से बिलकुल विपरीत होती है | दान देने वाला स्वयं को कृतार्थ समझता है जब कोई संन्यासी उससे दान माँगने पहुँच जाए | वह धन्य समझता है स्वयं को और ईश्वर को धन्यवाद् देता है कि आज वह इस योग्य हुआ कि भीख नहीं, दे पाए किसी को और किसी ने उसे अवसर दिया दान देने का |

वह दान लेने वाले के सामने नतमस्तक हो जाता है, न कि भीख देने वाले की तरह अकड़ कर खड़ा होता है | दान लेने वाले को वह अपने से श्रेष्ठ समझता है, कि निकृष्ट या तिरस्कृत

क्या संन्यासी समाज पर बोझ होते हैं ?

कई लोगों को लगता है कि संन्यासी कुछ नहीं करते, केवल मुफ्तखोरी करते हैं और समाज पर बोझ बने हुए हैं | उनके पास उदाहरण होते हैं अय्याश साधू संन्यासियों के | लेकिन उन साधू संन्यासियों को वे भूल जाते हैं जिन्होंने समाज को दिशा दिखाई, जिन्होंने समाज को नई राह दिखाई |

इस आधार पर यदि मैं देखूं तो समाज पर बोझ साधू संन्यासी नहीं, राजनेता और रिश्वतखोर सरकारी अधिकारी व कर्मचारी हैं | समाज पर बोझ वे पढ़े लिखे युवा हैं जो इस लायक नहीं हो पाए कि बिना नौकरी मांगे भी आत्मनिर्भर हो सकें | वे डिग्रीधारी हैं जो अपने खेत को उपयोगी बनाने की बजाये उन्हें बेचकर शहरों में धक्के खा रहे हैं नौकरी के लिए | ये बिलकुल वैसी ही बात हो गयी कि सभी अपने अपने काम धंधा छोड़कर संन्यासी बन जाएँ और भीख मांगने लगें | बोझ हैं वे लोग जो गाँव से शहर जाते हैं पढने के लिए, लेकिन वहीँ नौकरी की लाइन में लग जाते हैं, न कि गाँव लौटकर गाँव के उत्थान के लिए कोई सकारात्मक कार्य या प्रयोग करते हैं |

और ऐसे लोगों को जब नौकरी मिल जाती है तो संन्यासी इन्हें भिखारी नजर आने लगते हैं | इन्हे समाज व देश पर बोझ बने पढ़े लिखे बेरोजगार दिखाई नहीं देते | इन्हें समाज पर बोझ बने, रिश्वतखोर नेता और अधिकारी दिखाई नहीं देते | लेकिन संन्यासी इन्हें बोझ दिखाई देते हैं, और वह भी तब, जबकि वे न तो कोई घोटाला करते हैं, न ही रिश्वत मांगते हैं | और जब आप संन्यासियों को फूटी कौड़ी भी नहीं देते तो वह आप या समाज पर बोझ कैसे हो गया ? क्या वह जबरदस्ती किसी से वसूलने जाता है सरकारी टैक्स की तरह ? बोझ तो उसे लगना चाहिए जो उसे दे रहा है | और उसे भी बोझ तभी लगेगा जब उसे मन मारकर देना पड़ रहा है |

 

संन्यासी बोझ नहीं समाज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सदस्य है

गौतम बुद्ध के सिद्धांत से प्रेरित होकर आदि शंकराचार्य ने संन्यास परम्परा की नयी नींव रखी बौद्धों के विरुद्ध | बुद्ध के संन्यासी अहिंसा को महत्व देते थे, शंकराचार्य के संन्यासी हिंसा को | गौतम बुद्ध के संन्यासी भिक्षा केवल अपनी मूल भुत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए माँगते थे, शंकराचार्य परम्परा के संन्यासी आडम्बरों, दिखावों, शानो-शौकत के लिए |

दुर्भाग्य भारत का रहा कि अच्छी से से अच्छी शिक्षा, गौतम बुद्ध जैसे महान आत्माएं भी इन्हें जागृत नहीं कर पायीं | जबकि गौतम बुद्ध की वही शिक्षाएं, विदेशियों को जागृत कर गयीं, उन्हें सनातन धर्म सिखा गयीं | जबकि हम भारतीय दडबों में कैद होकर रह गये, सनातन धर्म से इतने दूर हो गये कि दान देना भी बोझ लगने लगा | और संन्यासियों को ही बोझ समझने लगे |

दुर्भाग्य संन्यासी नहीं, दुर्भाग्य है भारत के धर्मगुरु और धर्मों के ठेकेदार, जिन्हें धर्म की बेसिक समझ भी नहीं है | किताबों को रट्टा मार लिया और विद्वान् बने बैठे हैं | भले समझ में किसी एक श्लोक या आयत का अर्थ भी ठीक से न आया हो | कई ऐसे भी विद्वान मिले हैं मुझे, जिन्हें सारे वेद, पुराण, गीता ही नहीं, क़ुरान और बाइबल तक कंठस्थ हैं | लेकिन उनके आचरण यदि देखें, तो गाँव के किसी अनपढ़, गरीब से कहीं अधिक गरीब पाता हूँ संस्कारों में | उनकी भाषा ऐसी कि सड़क के गुण्डे मवाली उनसे कहीं अधिक सभ्य नजर आते हैं |

ये धर्मगुरु धर्म के नाम पर समाज में नफरत फैलाते हैं, बेरोजगारों को खोज खोजकर उनके भीतर नफरत का जहर बोते हैं | अर्थात गौतम बुद्ध के संन्यासियों से बिलकुल विपरीत आचरण होता है इनका | यही लोग जब दान माँगते हैं, तब समाज के कल्याण के लिए नहीं, अपितु समाज में जहर बोने के लिए, मंदिर-मंदिर खेलने के लिए, हिन्दू-मुस्लिम खेलने के लिए |

मेरी थाईलैंड यात्रा मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा रही | मैं आभारी हूँ उनका, जिन्होंने मुझे थाईलैंड न केवल आमंत्रित किया, अपितु मुझे थाईलैंड की संस्कृति से परिचित होने का अवसर दिया | वहाँ जाकर ही समझ में आया कि गौतम बुद्ध क्यों महान थे, जबकि यहाँ के बौद्धों को देखकर ये भी बाकी दड़बों में कैद अनुयाइयों की तरह ही दिखाई देते हैं | थाईलैंड के बौद्ध दिन में केवल एक बार सुबह ग्यारह बजे ही भोजन ग्रहण करते हैं | सुबह पाँच बजे वे भिक्षाटन के लिए निकलते हैं और जो कुछ भी भोजन में उन्हें प्राप्त हुआ, उससे जितना वे सब मिलकर ग्रहण कर सकते हैं, करते हैं | बाकि सभी वे किसी स्कूल, या अनाथालय या अस्पतालों में बाँट देते हैं | अपने लिए कुछ भी बचाकर नहीं रखते | यदि भेंट में उन्हें कोई अन्य भौतिक चीजें मिल गयीं, मानो घड़ी, या, मोबाइल या कुछ और…वह अलग बात है | वे उनके उपयोग में आ जाती हैं |

वहां के संन्यासी इस प्रयास में रहते हैं कि वहां के नागरिकों को सनातन धर्म की न केवल समझ हो, अपितु वे उसे आचरण में भी उतारें | और थाईलैंड घुमने पर मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि अधिकांश सनातनधर्मी हैं | भारत के धार्मिकों का बहुमत स्वार्थियों का है, जबकि थाईलैंड के धार्मिकों का बहुमत निःस्वार्थियों का है | वहां हर कोई आपकी सहायता के लिए तत्पर मिलता है, जबकि भारत में हर कोई सहायता के नाम से भी दूर भागता है | वहां तीन घंटे के सफर में भी बस में शोर नहीं सुनने मिलता, यहाँ पांच मिनट की यात्रा भी बिन चिक-चिक किये पूरी नहीं कर सकते लोग |

और इतने अच्छे संस्कार वहां के नागरिकों को देने वाले संन्यासी ही होते हैं, यही कारण है कि थाई नागरिक के लिए संन्यासियों का स्थान राजा के बाद सर्वोच्च सम्मानीय व्यक्तित्वों में होता है | वहां न तो राजा के विरुद्ध कोई अपशब्दों का प्रयोग करता है, न ही संन्यासियों के लिए | वहां न तो संन्यासियों से कोई अभद्रता करता है और न ही उनसे ऊँची आवाज में कोई बात करता है | जबकि भारतीय धार्मिकों के संस्कार में संन्यासियों को माँ-बहनों की गालियाँ देने से मार-पीट करना तक सामान्य बात है | और संन्यासियों को गालियाँ देने के लिए बड़ी उम्र का होना आवश्यक नहीं है, कोई बच्चा भी गाली दे सकता है और माता-पिता गर्व से उसकी पीठ थपथपाएंगे कि हमारा बेटा अब जवान हो गया |

तो भारतीय धर्मगुरु और थाईलैंड के धर्मगुरुओं में जमीन आसमान का अंतर है | भारतीय धर्म गुरु और उनके अनुयाई बोझ हैं देश में, अराजकता और उत्पात की जड़ हैं | जबकि थाईलैंड के धर्म गुरु राष्ट्र का गौरव हैं, वे समाज को शालीनता व शिष्टता का पाठ पढ़ाते हैं | वे उन्हें सभ्य नागरिक बनाते हैं उन्हें परस्पर सहयोगी होना सिखाते हैं |

तो संन्यासी बोझ नहीं है समाज व देश के लिए, लेकिन शंकराचार्य व अन्य परम्पराओं के धर्मगुरुओं के कारण संन्यासियों की गरिमा मिटटी में मिल गयी और बोझ बन गये समाज व राष्ट्र के लिए |

दान और आत्मनिर्भरता

आप किसी को दान तभी कर सकते हैं, जब आप आत्मनिर्भर हैं, प्रसन्नचित हैं, ईश्वर के प्रति आभार व कृतज्ञता से भरे हुए हैं और स्वयं को धन्य मानते हैं कि आपकी मेहनत और ईश्वर की कृपा से आप इस योग्य हो पाये कि बिना स्वार्थ या शर्त किसी को दान कर सकें | आप उन लोगों से ऊपर उठ पाए जो भीख देकर स्वयं को धन्य समझते हैं | आप आत्मनिर्भर तभी हैं, जब आप किसी की निःस्वार्थ सहयोग होने योग्य हो गये | आप आत्मनिर्भर तभी हैं, जब आपको किसी की सहायता या सेवा के बदले में कुछ भी लेने की आवश्यकता नहीं पड़ रही और न ही आप कुछ मिलने की अपेक्षा रखते हैं |

जरा अपने भीतर झांककर देखिये, कि क्या आप वास्तव में आत्मनिर्भर हैं ? क्या आप किसी की कोई सहायता करते समय, किसी को कोई दान देते समय कोई अपेक्षा नहीं रखते ?

क्या आप सहायता या दान माँगने वालों के प्रति घृणा व तिरस्कार का भाव रखते हैं और आपका मन मारकर कुछ भी करते हैं उनके लिए ? क्या आप किसी को कुछ देने के बाद ढिंढोरा पीटते हैं कि मैंने फलां को यह दिया और वह दिया ? क्या आप दान लेने वाले को ताना मारते हैं कि मुफ्त की रोटियाँ तोड़ते हो, मेहनत क्यों नहीं करते ? तो निश्चित मानिये कि अभी आप आत्मनिर्भर नहीं हुए हैं, अभी और मेहनत करने की आवश्यकता है आत्मनिर्भर होने के लिए |

दान माँगने वाला दान का क्या करता है वह उसकी समस्या है, आपकी नहीं | यदि वह दुरूपयोग करेगा, वह परिणाम भुगतेगा आप नहीं | और यदि आपकी रूचि दान देने में नहीं, भीख देने में है, तो प्रयास करिए, परिश्रम करिए कि आप ऊपर उठ पायें | क्योंकि आपकी स्थिति भिखारियों से बेहतर नहीं है क्योंकि दो चार सिक्के फेंककर बदले में पुण्य प्राप्त करने की अभिलाषा भिखारी ही कर सकते हैं | व्यापार की दृष्टि से भी यदि देखा जाए तो भीख के बदले पुण्य, या आशीर्वाद कमाना सबसे निकृष्ट व्यापार है |

~विशुद्ध चैतन्य

 

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