धर्म बंधन है या स्वतंत्रता ?

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धर्म के विषय में इतनी भ्रांतियाँ फैली हुई हैं कि क्या है धर्म, किसी की समझ में ही नहीं आया आज तक | जब भी कभी धर्म से सम्बंधित कोई चर्चा होती है, वह विवाद में रूपांतरित हो जाता है | जबकि धर्म की चर्चा में विवाद हो ही नहीं सकता क्योंकि धर्म सार्वभौमिक है सर्वहितकारी है | धर्म का विपरीत केवल अधर्म है कोई सम्प्रदाय, समाज, पंथ या संविधान नहीं |

सामान्य धारणा है कि जीवन शैली ही धर्म है लेकिन इन्हीं में से अधिकाँश का मानना है कि समाज के लिए बनाये गये नियम कानून धर्म है | अर्थात किसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसके विषय में बने संविधान ही धर्म हैं | यदि संविधान धर्म है तो फिर कर्त्तव्य क्या है ? क्या कर्त्तव्य ही धर्म है ?

सामान्य दृष्टिकोण से देखा जाए तो कर्त्तव्य ही धर्म प्रतीत होता है | यदि कर्तव्य धर्म है तो कर्त्तव्य शब्द की आवश्यकता ही नहीं थी, तो फिर कर्त्तव्य शब्द की आवश्यकता क्यों पड़ी ? हम धर्म शब्द से ही काम चला लेते ?

तो कर्त्तव्य धर्म नहीं है, धर्म और कर्त्तव्य में अंतर है |

सोशल मिडिया पर प्रश्न किया मैंने कि धर्म बंधन है या स्वतंत्रता, तो किसी ने कहा बंधन है किसी ने कहा स्वतंत्रता, तो किसी ने कहा दोनों | किसी ने जानना चाहा कि क्या आस्था ही धर्म होती है ? या दूसरे शब्दो में “आस्था क्या है, धर्म क्या है, रीति रिवाज क्या है? ये तीनों चीजों में क्या-क्या समानताएं हैं और क्या-क्या विषमताएं हैं???

तो आइये आज इसी गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करते हैं

धर्म बंधन है या स्वतंत्रता ?

जब तक धर्म की समझ नहीं होगी, समझ में ही नहीं आएगा कि धर्म बंधन है या स्वतंत्रता | इसीलिए पहले धर्म को समझ लेते हैं |  सामान्य धारणा है कि जो धारण किया जा सके, वही धर्म है | लेकिन यह सही नहीं है | क्योंकि धारण तो कुछ भी किया जा सकता है, जैसे कपडे, फ़ोन, डंडा, बन्दूक, तलवार….आदि | तो धारण की जा सकने वाली चीजें या नियम कानून धर्म नहीं है | न ही कर्त्तव्य धर्म है और न ही आस्था, रीतिरिवाज धर्म है | कुछ लोगों का मानना है कि कर्म ही धर्म है जबकि यह भी पूर्ण सत्य नहीं है |

कर्म पर आधारित है कर्त्तव्य अर्थात जो किया जा सके वह कर्म है और जो करना अनिवार्य है वह कर्त्तव्य है |

आस्था भी धर्म नहीं है क्योंकि यह व्यक्ति विशेष पर आधारित होता है | किसी की आस्था किसी पर होगी तो किसी की आस्था किसी और पर | आस्था पुर्णतः व्यक्तिगत विषय है और यह कोई अनिवार्य क्रिया या भाव नहीं है | जिस पर आपकी आस्था है वह यदि जीवित है तब उसकी कोई न कोई व्यव्हार ऐसा हो सकता है कभी, जो आपकी आस्था को खंडित कर सकता है | आस्था सदैव मृत व्यक्ति पर ही रखनी चाहिए क्योंकि उसमें कोई परिवर्तन होने की सम्भावना नहीं रहती | लेकिन यह धर्म नहीं है |

रीतिरिवाज यानि परम्पराएं भी धर्म नहीं है और कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ भी धर्म नहीं है | तो फिर प्रश्न उठता है कि जब कर्म धर्म नहीं है, रीतिरिवाज, धर्म नहीं है, पूजा-पाठ धर्म नहीं है, कर्त्तव्य धर्म नहीं है तो फिर धर्म है क्या ?

बस यहीं उलझ गया समाज कि धर्म है क्या ? क्योंकि धर्म की सही परिभाषा ही समझ में नहीं आयी किसी की | और चूँकि धर्म की सही परिभाषा ही समझ में नहीं आयी इसलिए किसी के लिए धर्म बंधन बन गया तो किसी के लिए स्वतंत्रता तो किसी के लिए दोनों | वास्तव में धर्म को भौतिक रूप से ही समझा व समझाया गया आध्यात्मिक रूप से नहीं |

धर्म में क्रिया भी है और निष्क्रियता भी, धर्म में रीतिरिवाज भी है और नियम कानून भी लेकिन ये सब धर्म नहीं है | जैसे एक देश में राज्य होते हैं, शहर होते हैं, गाँव होते हैं, लेकिन इन्हें अलग अलग करके शहर को देश या गाँव को देश नहीं कहा सकता | देश एक नाम है राज्य, शहर व गांवों के समूह का | इसी प्रकार धर्म नाम है संस्कृति, संस्कारों, कर्म, रीतिरिवाजों, भावनाओं, आस्थाओं के सकारात्मक प्रभावों व क्रियाओं का | संस्कृति, संस्कार, रीतिरिवाज, कर्त्तव्य, भावनाएं, आस्थाएं यदि सकारत्मक हैं, सर्वकल्याणकारी हैं, तो वह धर्म कहलाएगी | किन्तु यदि नकारात्मक है, हानिकारक है, घृणा व वैमनस्यता से युक्त है, तो वह अधर्म कहलाएगी |

अब प्रश्न उठता है कि क्या धर्म बंधन है ?

निश्चित ही यह बंधन है, किन्तु स्वतंत्रता युक्त बंधन | जैसे कि गुरुत्वाकर्षण बल | गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही आप पृथ्वी से चिपके हुए हैं, अन्यथा पृथ्वी के बाहर कहीं भटक रहे होते उल्कापिंड या छुद्र ग्रहों की तरह | कल्पना करिए कि यदि पृथ्वी से अचानक गुरुत्वाकर्षण बल लुप्त हो जाये, तब आप उस समय को स्वतंत्रता मानेंगे या विनाश ?

गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है, किन्तु अपनी स्वतंत्रता रखते हुए | अर्थात वह अपनी धुरी पर भी घुमती है अपने सतह पर अद्भुत सौंदर्य व प्रकृति का निर्माण भी करती है | वह बाध्य नहीं है मंगल की नकल करने के लिए, या शुक्र ग्रह की नकल करने के लिए | सूर्य नहीं कहता पृथ्वी से कि मंगल की जैसे हो जाओ या बुद्ध ग्रह की तरह हो जाओ |

तो धर्म बंधन होते हुए भी स्वतंतत्रता है | आप स्वतंत्रत है अपने ही अनुरूप जीने के लिए, अपनी कलात्मकता दिखाने या आविष्कार करने के लिए | आप बाध्य नहीं कि आपको भेड़चाल पर ही चलना है, आप बाध्य नहीं हैं कि जो सभी मानते हैं वही मानना हैं, आप बाध्य नहीं हैं कि किसी धर्म या जाति के ठेकेदारों द्वारा तय किये गये विधि-विधान को ढोना है | आपके पास अपना विवेक है, अपनी बुद्धि है, उसके प्रयोग का पूरा अधिकार है आपके पास | और जहाँ आपकी निजता, आपकी स्वतंत्रता बाधित होती है, वहाँ से धर्म लुप्त होने लगता है और साम्प्रदायिकता व अधीनता का प्रवेश शुरू हो जाता है |

यदि आपसे कहा जाता है कि परोपकार करने से पुण्य मिलता है, इसीलिए करना चाहिए, तो यह धर्म नहीं है | यदि आपको यह कहा जाए कि परोपकार करना ही इसीलिए चाहिए क्योंकि दुनिया में हमारे आने का उद्देश्य ही यही है, तब वह धर्म हो जाएगा | श्रीकृष्ण ने यही समझाने का प्रयास किया था यह कहकर;

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

भावार्थ : तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो॥47॥

यदि हम लाभ के लालच में कोई कर्म करते हैं तब वह धर्म नहीं होता, यदि हम स्वार्थ को सर्वोपरि रखकर कोई कर्म करते हैं, तब वह धर्म नहीं होता, यदि हम साम्प्रदायीकता, घृणा व वैमनस्यता को आधार बनाकर कोई कर्म करते हैं, तब वह धर्मं नहीं होता | स्वार्थ, लोभ, बदले में कुछ पाने की कामना के वशीभूत होकर जब भी कुछ करते हैं वह धर्म नहीं अधर्म हो जाता है | फिर चाहे आप कितना ही भला कार्य कर रहे हों | लेकिन यदि आप निस्वार्थ भाव से किसी का हित करते हैं, किसी का सहयोग करते हैं, तब वह निश्चित ही धर्म हो जाता है |

कोई भी सम्प्रदाय या दडबों में रूपांतरित हो जाता है, जब अनुयाइयों के कर्मों, या भाषा के कारण समाज को हानि होने लगती है | जब अनुयाई स्वयं ही समाज को कष्ट देने लगते हैं, अपनी मान्यताएँ दूसरों पर थोपने लगते हैं | सम्प्रदाय दडबों में रूपांतरित हो जाते हैं, जब उस दडबों के सदस्य स्वयं लोभ और स्वार्थ में अंधे हुए पड़े हों और उस दड़बे का ठेकेदार दुनिया को बता रहा होता है कि उसका दड़बा कितना महान है, उस दड़बे का धार्मिक ग्रन्थ कितना महान है, उस दड़बे का संस्थापक या आराध्य कितना महान है | ऐसे दडबों में कभी झांककर देखें तो पायेंगे कि इन दडबों के सदस्य परस्पर ही सहयोगी नहीं हैं | इनके सदस्य केंकड़ों के उस समूह में रूपांतरित हो चुके हैं, जो न तो स्वयं ऊपर उठना चाहते हैं और न ही किसी और को उठने देना चाहते हैं | इन दडबों में झाँककर देखें तो इनके सभी नैतिक नियम कानून केवल किताबी होते हैं, इनके सदस्य ही उनका अनुसरण नहीं कर रहे होते |

जैसे भारतीय संविधान की धज्जियाँ स्वयं संविधान के रखवाले ही उड़ा रहे होते हैं, वैसे ही किताबी धर्मों की धज्जियाँ इन्हीं के ठेकेदार और अनुयायी उड़ा रहे होते हैं | और ये दड़बे दूसरे दडबों के दोष गिनाने में व्यस्त रहते है, न कि अपने दड़बे की कमियों व बुराइयों को दूर करने का प्रयास करते हैं |

और चूँकि ऐसे दडबों को धर्म मान लिया गया, इसीलिए ही धर्म के नाम पर उत्पात मचा हुआ है | जबकि ये धर्म हैं ही नहीं |

तो धर्म का सीधा सा अर्थ यह है कि जो आपका स्वाभाविक, मौलिक व्यक्तित्व है, जो आपकी योग्यता है, उसी के अनुरूप समाज, परिवार, देश के हितार्थ किये गये कर्म धर्म हैं | ऐसे कर्म भी धर्म हैं जो केवल अपने लिए किये गये लेकिन किसी का अहित किये बिना | लेकिन जो कर्म दूसरों को कष्ट पहुंचाते हों, जो कर्म दूसरों का सुख चैन छीनते हों, वह अधर्म है | फिर चाहे आप डीजे पर धार्मिक गाना ही बजाएं, फिर चाहे आप कीर्तन भजन ही करें, फिर चाहे आप धार्मिक जुलुस ही निकालें, फिर चाहे आप शोर मचाते हुए पूजा-पाठ ही करें…..लेकिन आपके ऐसे किसी भी कार्य से यदि कोई परेशान हो रहा है, यदि किसी की नींदें खराब हो रही है, सड़क चलते यात्रियों को असुविधा हो रही है….तो निश्चित मानिए कि आप अधर्म ही कर रहे हैं | फिर यह मायने नहीं रखता कि आपकी धार्मिक ग्रंथों में कितनी अच्छी अच्छी बातें लिखीं हुईं हैं, फिर यह मायने नहीं रखता कि आपके पूर्वज या अराध्य कितने महान थे |

~विशुद्ध चैतन्य

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