विवाह बंधन है या समर्पण ?

जब भी कभी यह प्रश्न उठता है कि विवाह बंधन है या समर्पण? तो अधिकांश का उत्तर होता है बंधन है | बहुत ही कम होंगे जिन्हें लगता है कि समर्पण |

लेकिन यदि समाज की दृष्टि से देखें तो विवाह केवल सामाजिक स्वीकृति है स्त्री-पुरुष के मिलन की और साथ ही दो परिवारों के बीच संधि की | इसके अलावा विवाह का और कोई उद्देश्य नहीं होता सामजिक रूप से | समाज को विवाहित जोड़ों के सुख-दुःख व परस्पर अनबन व टकराव से भी कोई सरोकार नहीं होता | दोनों यदि एक दूसरे से संतुष्ट या सुखी न भी हों, तब भी समाज केवल साथ रहने पर जोर देगा या फिर दोनों यदि साथ न रहना चाहें तब कई बाधाओं से युक्त सम्बन्ध-विच्छेद यानि तलाक की व्यवस्था करेगा |

नैसर्गिक व प्राकृतिक सम्बन्ध है स्त्री-पुरुष का मिलन

यह मिलन दो विपरीत शक्तियों को परस्पर सामंजस्यता व सहयोगिता से विषम से विषम परिस्थियों का सामना करने का बल प्रदान करता है | यह दुनिया का इकलौता ऐसा सम्बन्ध है, जिसमें पूर्णता है बाकि सभी सम्बन्ध अधूरे हैं, आंशिक हैं |

ऐसा विवाह जिसमें आपस में समर्पण का भाव न हो, केवल व्यवसाय हो, केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक स्वार्थ हो, वह विवाह कभी भी स्त्री-पुरुष को वह सुख प्रदान नहीं कर सकता, जिससे पूर्णता प्राप्त होती है |

जीवनसाथी चुनने और सरकार या नेता चुनने में अंतर होता है

कहते हैं कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं | लेकिन देखने में आता है कि जोड़ियाँ माँ-बाप, रिश्तेदार, परिवार के लोग ही बनाते हैं | और यदि कोई खुद ही खुदा के भेजे बन्दे को अपना जोड़ीदार बना ले, तो परिवार कई बार इतना क्रोधित हो जाता है कि दोनों की हत्या करने से भी परहेज नहीं करता |

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यही सिद्धांत सरकार चुनते समय भी समाज में लागू होता है | कहा जाता है कि जनता अपना नेता चुनती है लोकतंत्र में | जबकि होता यह है कि पार्टियाँ पहले नेता चुनती हैं और फिर जनता से कहती है इसे चुनो क्योंकि हमने इसे चुना है प्रत्याशी के रूप में | यदि कोई विरोध करता है तो फिर उनके इलाज के लिए आईटी सेल के एक्सपर्ट होते हैं, गुंडों-मवालियों की कई सेनायें होती हैं |

सरकार चुनना हो या जीवन साथी चुनना हो, तय कोई और करता है कि किसे चुनना है और फिर कहा जाता है कि हमने तो पूरी स्वतंत्रता दे रखी है, किसी पर कुछ थोपा नहीं | अब जनता ठगी जाए या नवदंपत्ति स्वयं को ठगा हुआ महसूस करें, तो कहा जाएगा कि तुमने ही चुना था अब तुम्ही भुगतो |

जीवनसाथी चुनने और सरकार चुनने में अंतर होता है | जीवन साथी को यदि ढोना पड़ रहा है, झेलना पड़ रहा है सरकार की तरह, तो इसका अर्थ यह हुआ कि जीवन साथी मिला ही नहीं अभी तक आपको | आपने तो केवल व्यापारिक, सामाजिक समझौता मात्र किया है किसी से और निभा रहे हैं किसी तरह, काट रहे हैं ज़िन्दगी, ढो रहे हैं जीवनसाथी नाम के पार्टनर को |

और यह सब किसलिए ?

केवल इसलिए क्योंकि आधुनिक भागदौड़ की ज़िन्दगी में, खुदा के बनाए जोड़ीदार की प्रतीक्षा करनी बेवकूफी है | और जनसँख्या भी इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि ईश्वर ने भी जोड़ियाँ बनाने काम बंद कर दिया | अब तो थोक के भाव में इंसानों के रूप में मशीन बनाये जा रहे हैं और उन मशीनों का काम है पूंजीपतियों की गुलामी करना, माफियाओं की गुलामी करना, धूर्त मक्कार नेताओं और पार्टियों की गुलामी करना | या फिर गुंडे-मवालियों की टोलियों में शामिल होकर हिंदुत्व या इस्लाम की रक्षा करना, निहत्थे, गरीबों को मारना पीटना |

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तो अधिकांश युवाओं को उनका जोड़ीदार नहीं मिल पाता इसलिए वे लोग छल-बल-कपट से समझौता करते हैं और फिर उसे विवाह का नाम दे देते हैं | ऐसे अधिकांश रिश्ते व्यापारिक होते हैं, स्वार्थ और लालच युक्त होते हैं | किसी को सरकारी अधिकारी चाहिए होता है दामाद के रूप में तो उस दामाद के परिवार को मोटा दहेज़ चाहिए होता है | किसी को ऊँचा खानदान चाहिए होता है तो किसी को बड़ा बैंक बेलेंस, कार, बंगला कोठी चाहिए होता है | किसी को राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करना होता है, तो किसी को व्यावसायिक स्वार्थ | और स्वार्थ लोभ पर आधारित इन रिश्तों को लोग ईश्वरीय जोड़ी कहकर दूसरों को और स्वयं को भ्रम में रखते हैं |

और ऐसे ही रिश्तों को ढो रहे दंपत्ति अपनी ज़िन्दगी को कोसते हैं, अपनी किस्मत को कोसते हैं और आजीवन लड़ते भिड़ते रहते हैं आपस में | घर में क्लेश मचा रहता है और एक दिन तलाक की नौबत भी आ जाती है |

~विशुद्ध चैतन्य

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