आदर्श आराध्य गुरु और वंश परम्परा

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प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी गुरु की आवश्यकता होती है, किसी न किसी आदर्श कि आवश्यकता होती और कभी न कभी वह किसी न किसी को आराध्य बना ही लेता है | लेकिन कम ही लोग हैं जो यह समझ पाते हैं कि आदर्श, आराध्य, गुरु और वंश परम्परा क्या है और इनका महत्व क्या है | आपने कभी न कभी किसी न किसी से यह कहते अवश्य सुना होगा की फलाना मेरा गुरु है, फलाना मेरा आदर्श है, फलाना मेरा आराध्य है और फलाना वंश का हूँ | नास्तिकों के लिए ये बड़ी ही उलझन वाली स्थिति होती है और विशेषकर आधुनिक कान्वेंट स्कूल में पढ़े लिखों के लिए समझ के परे कि ही चीज होती है | वे लोग इन सब बातों को दकियानूसी, जाहिल, गंवारों वाली बातें मानते हैं | इसीलिए मुझे लगा की इस विषय पर कुछ लिखा जाए और सबसे पहले शिक्षा पर ही चर्चा कर लेते हैं |

अशिक्षित डिग्रीधारियों का समाज

शिक्षा का स्तर कभी अवश्य ही बहुत अच्छा रहा होगा, तभी तो दूर देश के लोग तक्षशिला, नालन्दा विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आते थे | वे विद्यालय अच्छे इसलिए रहे क्योंकि उनके गुरु अपने कर्तव्यों के प्रति सजग थे और इसी लिए वे बच्चों को केवल लिखना पढ़ना ही नहीं सिखाते थे, बल्कि नैतिक मूल्य भी सिखाते थे | और उन शिक्षकों की लगन व परिश्रम का ही परिणाम था की व्हेनसांग को भारत एक सुसभ्य व शालीन देश लगा | लेकिन….

  • ऐसा क्या हुआ कि शिक्षा का स्तर गिरता चला गया और बच्चे शिक्षित होने की बजाये, पढ़े-लिखे डिग्रीधारी मात्र बनकर रह गये ?
  • ऐसा क्या हुआ कि शिक्षा से व्यक्ति आत्मनिर्भर होने कि बजाय बेरोजगार भटकने लगा ? ऐसा क्या हुआ कि शिक्षित व्यक्ति असभ्य, अमर्यादित और उद्दंड होता चला गया ?
  • ऐसा क्या हुआ कि शिक्षकों की गरिमा गिरती चली गयी और शिक्षकों का सम्मान न छात्र करते हैं और न ही पुलिस ?

कारण मुझे जो नजर आ रहा है वह यह कि शिक्षित करना या होना अब महत्वपूर्ण नहीं रह गया | अब महत्वपूर्ण है पढ़ा-लिखा डिग्रीधारी होना | आप शिक्षित हैं या नहीं, यह कोई नहीं जानना चाहेगा | केवल यही जानना चाहेगा कि आपके पास डिग्रियाँ कितनी हैं और किस ग्रेड की डिग्रियाँ हैं | और डिग्रियों की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? केवल नौकरी पाने के लिए, विवाह करने के लिए, उसके अलावा डिग्रियों का कोई महत्व नहीं है | क्योंकि डिग्रियाँ प्राप्त व्यक्ति इस योग्य नहीं होता कि पुश्तैनी भूमि के छोटे से टुकड़े को अपने लिए उपयोगी बना सके, उससे अपनी आजीविका चला सके | कई लोग भूमि के टुकड़े में मकान बनाकर किराये पर चढ़ा देते हैं और वही उनकी आजीविका का साधन बन जाता है | कुछ लोग भूमि बेच देते हैं और शहर में जाकर नौकरी खोजने लगते हैं | लेकिन उनकी डिग्रियाँ बेकार हो जाती हैं जब वे अपनी पुश्तैनी भूमि बेच रहे होते हैं या उसपर मकान बनाकर किराए पर चढ़ा रहे होते हैं | क्योंकि भूमि का इस प्रकार उपयोग तो बिना डिग्री प्राप्त किया व्यक्ति भी आसानी से कर लेगा | इस काम के लिए डिग्रियों कि आवश्यकता ही क्या थी ?

तो डिग्रियाँ प्राप्त कर लेने मात्र से कोई शिक्षित नहीं हो जाता, शिक्षित होने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है | और गुरु का डिग्रीधारी होना अनिवार्य नहीं होता, क्योंकि जीवन की शिक्षा डिग्रियों से नहीं, अनुभवों से प्राप्त होती है |

अनोखे किन्तु कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक

भारत के कुछ ऐसे स्कूल .. केवल 1 मिनट देकर ये वीडियो जरूर देखले

भारत के कुछ ऐसे स्कूल .. केवल 1 मिनट देकर ये वीडियो जरूर देखलेCredits: Knowledge Tv हिन्दीFollow Knowledge Tv हिन्दी on YouTube

Posted by भारत की सरकार on Tuesday, November 27, 2018

गुरु कौन होता है और उसका महत्व क्या है ?

अध्यापक और शिक्षक वे होते हैं, जो पारम्परिक व किताबी ज्ञान देते हैं | उनका काम होता है, जो उन्होंने अब तक पढ़ा, रटा वह आपको रटा दें | उससे आपको अच्छी नौकरी मिल सकती है, समाज में आपको शिक्षित होने का सम्मान मिल सकता है, अच्छे घर में आपका विवाह हो सकता है…..लेकिन मौलिक ज्ञान से आप वंचित रह जाते हैं | अर्थात वह ज्ञान जो आपको आपसे ही परिचित करवा दे, वह ज्ञान जिससे आप अपनी ही योग्यताओं, क्षमताओं को परख व समझ पायें, उससे आप चूक जाते हैं | आप उस ज्ञान से चूक जाते हैं जो आपके ही भीतर था, जिससे आप अपनी मौलिकता को खोज पाते और समाज द्वारा थोपे ज्ञान व चश्में से मुक्त होकर अपनी ही वास्तविक आँखों से देख व समझ पाते |

ऐसा ज्ञान केवल गुरु ही दे सकता है | वास्तव में गुरु ज्ञान देता नहीं, केवल आपको चोट पहुँचाता है, आपके खोखले स्वाभिमान, गौरव पर चोट करता है, आपके ऊपर समाज ने जो झूठे अहंकार का खोल डाल रखा था, उसे वह तोड़ देता है | और फिर निकल कर आता है आपका वास्तविक व्यक्तिव | इसीलिए गुरु को आप पालतू नहीं बना सकते | गुरु कोई ट्यूटर नहीं होता है कि चंद रुपयों में आप उसे खरीद लें | गुरु बिकाऊ नहीं होता, गुरु के प्रति केवल समर्पित हुआ जा सकता है | और यही सबसे कठिन कार्य है किसी भी शिष्य के लिए |

गुरु और शिष्य का सम्बन्ध पिता-पुत्र के समान होता है लेकिन पिता-पुत्र जैसा नहीं | गुरु और शिष्य का सम्बन्ध पिता-पुत्र से कहीं ऊँचा और गहरा होता है | क्योंकि पिता और पुत्र का सम्बन्ध तो प्राकृतिक रूप से बनता है, इसमें पुत्र की पसंद नापसंद का कोई प्रश्न ही नहीं | किन्तु गुरु को चुना शिष्य और शिष्य को गुरु ही चुनते हैं |

जिस प्रकार पुत्र का दायित्व होता है पिता का सहयोगी होना, ठीक उसी प्रकार शिष्य का दायित्व होता है गुरु की सेवा करना बिना कोई शर्त | यदि किसी को आपने गुरु माना है तो उनकी आवश्यकताओं या समस्याओं को सुलझाना भी आपका ही दायित्व है | गुरु आपसे नहीं कहेगा हर बार कि मेरी सहायता करो, क्योंकि वह आपकी सहायता पर निर्भर नहीं है | किन्तु आपको स्वयं सहायता करनी चाहिए यदि आप योग्यता रखते हैं सहायता करने की |

अराध्य की आवश्यकता क्यों ?

अराध्य होता कौन है पहले यह समझ लें | अराध्य वह होता है, जो विश्वास, सामान, श्रृद्धा की सीमाओं से ऊपर उठ जाए | जब कोई व्यक्ति या प्रतीक हमारे ह्रदय के बहुत ही करीब हो जाए, जब कोई इतना सम्मानीय और प्रिय हो जाए कि तर्कों से हम व्याख्या न कर पायें, तब वह अराध्य हो जाता है | जैसे किसी के लिए राष्ट्रीय ध्वज अराध्य हो जाता है तो किसी के लिए मातृभूमि अराध्य हो जाती है | किसी के लिए उसका पति ही अराध्य हो जाता है, तो किसी के लिए उसकी पत्नी |

अराध्य या पूजनीय होने का अर्थ केवल इतना ही होता है कि उसके प्रति प्रेम व समर्पण का भाव इतना अधिक है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो प्राणों की भी चिंता नहीं की जायेगी |

अराध्य की आवश्यकता पड़ती है जब आप अकेले पड़ जाते हैं और कोई साथ नहीं होता | कभी कभी हम ऐसी स्थिति में पड़ जाते हैं कि सारी दुनिया एक तरफ हो जाती है और आप अकेले एक तरफ | आप जानते हैं कि आप गलत नहीं हैं, लेकिन दुनिया आपको गलत मानती है | ऐसी स्थिति में अराध्य ही एकमात्र वह शक्ति होती है, जो आपको बल देती है, टूटने नहीं देती | वह आपके साथ रहे न रहे, वह आपको अपने होने का एहसास अवश्य देता है | आप चाहे इसे भ्रम ही कहें, लेकिन वही एकमात्र ऐसी शक्ति होती है, तो आपको विषम परिस्थिति में बिखरने नहीं देती |

वंश परम्परा वास्तव में है क्या ?

वंश परम्परा दो प्रकार की होती है | एक आनुवांशिक और दूसरा गुरु-शिष्य परम्परा | आनुवांशिक परम्परा में आप पिता या माता के वंश के उत्तराधिकारी बनते हैं | और गुरु शिष्य परम्परा में गुरु के उत्तराधिकारी बनते हैं |

उत्तराधिकारी होने का दायित्व बहुत ही बड़ा होता है | इसका अर्थ यह होता है कि जिसके भी आप उत्तराधिकारी नियुक्त हुए, उनसे बेहतर कार्य आपको करना है और जहां तक आपके पूर्वज ने कार्य किया, उससे आगे बढ़ाना है, उसे उन्नत करना है |

केवल गुरु का नाम या पिता नाम या गोत्र ढोने मात्र से ही वंश परम्परा का निर्वाह नहीं हो जाता और न ही उनकी संपत्ति का अधिकारी हो जाने मात्र से वंश परम्परा कर निर्वहन हो जाता है | आपको अपने कुल व मर्यादा को अधिक उन्नत व समृद्ध बनाना होगा तभी वंशज होने पर गौरव प्राप्त करने के अधिकारी होंगे | केवल आपके पूर्वज महान थे, इसलिए आप महान नहीं हो जाते और न ही आपका वंश महान हो जाएगा | महानता तभी प्राप्त होगी और पूर्वजों कर्जों से आप तभी मुक्त होंगे, जब आप वंशपरम्परा को उन्नत करें, गौरवशाली बनायें |

क्या वर्तमान समाज अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर रहा है ?

शायद बिलकुल भी नहीं | आज समाज केवल अपने पूर्वजों के किस्से-कहानियों में ही अटक कर रह गया | पूर्वज महान थे इसका ढिंढोरा पिटते फिरते हैं, पूर्वज ईमानदार थे, अपने देश के प्रति निष्ठावान थे बड़ी शान से बताते हैं | लेकिन स्वयं बेईमान हो गये, स्वयं अपने देश से नहीं, विदेश से प्रेम कर बैठे | स्वयं अपने गाँव प्रदेश के हितों को अनदेखा कर व्यक्तिगत स्वार्थों को महत्व देने लगे | और यह समझने की मूर्खता कर रहे हैं कि उनकी इस व्यव्हार से उनके पूर्वजों का मान-सम्मान बढेगा |

यदि आपके पूर्वज अत्याचारियों, अधर्मियों के विरुद्ध थे, तो आप अत्याचारियों अधर्मियों के समर्थन में क्यों खड़े हैं ? और यदि आप ऐसा कर रहे हैं तो क्या आप वंशपरम्परा का निर्वहन कर रहे हैं ? क्या आप अपने आदर्श, अपने आराध्य, अपने माता-पिता, अपने गुरु कि शिक्षाओं व आदर्शों का मान रख रहे हैं ?

वंश परम्परा में व्यक्ति ऊपर उठता है

वंश परम्परा का अर्थ यह नहीं कि आपके पूर्वज लूट-मार करते थे तो आप भी करें, आपके पूर्वज निर्दोषों कि हत्याएं करते थे थे तो आप भी करें | वंश परम्परा कर अर्थ होता है जो गलतियाँ आपके पूर्वजों से हुईं वह आप न दोहरायें | बल्कि आपके पूर्वजों ने यदि किसी का अहित किया, तो आप उनके वंशजों के प्रति सहानुभूति का भाव रखें, उनके सहयोगी बनें, न कि शत्रु |

व्यक्ति जैसे जैसे ज्ञान को प्राप्त करता जाता है, वह क्षमाशील होता है | जब तक व्यक्ति अज्ञानी रहता है, वह घृणा व द्वेष की अग्नि में जलते रहता है |

~विशुद्ध चैतन्य

नीचे एक फिल्म दे रहा हूँ, इसे अवश्य देखिये तब, जब आप बिलकुल शांत-चित्त हों, और कोई आपको डिस्टर्व करने वाला न हो |

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