धर्म, पार्टी और दड़बे में अब कोई अंतर नहीं है

एक सिद्धांत होता है, जिसपर कोई पार्टी खड़ी होती है और उस सिद्धांत से सहमत लोग उस पार्टी से जुड़ते हैं | फिर वे दूसरी पार्टी पर रिसर्च करते हैं और बुराइयाँ निकालते हैं, जिसे चुनावों में ब्रह्मास्त्र की तरह प्रयोग करते हैं |

इस सारी प्रक्रिया में जो चूक हो जाती है वह यह कि मूल उद्देश्य पार्टी खड़ी करने का चूक जाता है | न नेता और न ही कार्यकर्त्ता को याद रहता है कि उनकी पार्टी का सिद्धांत और उद्देश्य क्या था | क्योंकि वे तो जब से पार्टी बनी है अपनी पार्टी के लिए कभी काम किया ही नहीं होता, केवल दूसरी पार्टी की जासूसी में ही लगे रहे |

अब ऐसे में सुनने में आता है कि कोई नेता अपनी पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में शामिल हो गया तो आश्चर्य होता है कि कल तक जिस पार्टी का वह विरोधी था, उसमें कैसे चला गया ! फिर वह सिद्दांतों की बात करता है और अपनी पार्टी में मीन-मेख निकालता है | लेकिन तहकीकात करो तो खरीद-फरोख्त और लाभ-हानि का मामला मिलता है |

ठीक वही स्थिति धर्मों की हो चुकी है | हर धर्म पंथ के अपने अपने तौर-तरीके हैं और जिसको जो समझ में आता है वह उसमें हो जाता है | धर्म, पार्टी और दड़बे में अब कोई अंतर नहीं है | यहाँ भी वही सब चलन है जो राजानीतिक पार्टियों में है | यहाँ भी साम, दाम, दंड, भेद की नीति ही लागू होती है आध्यात्म की नहीं | यहाँ भी जमीन, पैसा और नौकरी ही महत्वपूर्ण होता है, आत्मिक उत्थान नहीं | थोड़े से पैसे फेंकों तो लोग हिन्दू हो जाते हैं और थोड़े से लालच में मुसलमान | यहाँ ईमान और उसूल से कोई लेना देना नहीं रहता | धर्म के ठेकेदार भी जानते हैं कि वे भी कोई धर्म-मार्ग पर नहीं हैं, लेकिन धंधा है सो जमे हुए हैं धंधे और राजनीति के खातिर |

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तो मैं जिसे धर्म कहता हूँ और जिसे मानता हूँ, वह धर्म यह नहीं जिसे लोग हिन्दू या मुस्लिम के नाम से जानते हैं | ये तो केवल संप्रदाय हैं और कांग्रेस पार्टी और बीजेपी पार्टी जैसी ही ये भी पार्टियाँ ही हैं | हिन्दू हैं तो संघी-बजरंगी पार्टी के हो गये और मुस्लिम हैं तो ओवैसी के पार्टी के हो गये |

यदि राष्ट्र को समृद्ध व सुखी देखना चाहते हैं, सच्चे राष्ट्रभक्त के रूप में राष्ट्र से प्रेम करते हैं, तो इन दड़बों से ऊपर उठना होगा और मानवीयता (Humanism) को अपनाना होगा | आप हिन्दू हैं, मुस्लिम हैं यह सब आप लोगों का व्यक्तिगत विषय होना चाहिए, दूसरों पर न थोपें | जब भी एक दूसरे से मिलें तो भारतीय बनकर मिलें ताकि भेद-भाव की दीवारें गिर सकें और नेताओं और धर्मों के ठेकेदारों के षड्यंत्रों से एक दूसरे की रक्षा कर सकें |

यदि कभी ध्यान दें तो ये नफरत के बीज बोने वाले, वे ही सड़क छाप दादा हैं जो सड़क की पुलिया पर बैठे सुट्टा लगाते खुद को धर्मेन्द और अमिताभ बच्चन समझते हैं… यदि नहीं देखा तो कभी जाकर शाम के समय नुक्कड़, पान की दूकान या किसी पुलिया पर अवश्य देखियेगा | ये लोग आती जाती लड़कियों पर शम्मी कपूर शशि कपूर स्टाइल मारते मिल जायेंगे | और ये ही लोग हैं जो फेसबुक पर गर्व से कहते फिरते हैं, “कहों हम हिन्दू हैं….हम मुस्लिम हैं” वाले डायलॉग चिपका रहे होते हैं | ये ही सड़कछाप मजनू धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाये घूमते हैं सड़कों में |

जरा सोचिये ! इनकी बातों में आकर हम आपस में लड़ रहे होते हैं ? ~विशुद्ध चैतन्य

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