साम्प्रदायिकता धर्म नहीं है

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कितना ही समझा लो कि साम्प्रदायिकता धर्म नहीं है, लेकिन लोग बार बार सम्प्रदायों को ही धर्म बताएँगे |

कितना ही समझा लो कि पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड, रीतिरिवाज, रोजा, नमाज, व्रत, उपवास धर्म नहीं है, लेकिन लोग इन्हें ही धर्म बताएँगे |

कितना ही समझा लो कि किसी मत मान्यताओं से किसी समूह में बंधना कोई धर्म नहीं है….लेकिन लोग इसे ही धर्म मानेंगे |

क्योंकि सरकार ने ही सम्प्रदायों, पंथों को धर्म घोषित कर रखा है तो कितने भी तर्क दो, कितने ही अच्छी तरह से समझा दो, सब व्यर्थ | और यही कारण है कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी दिखाई देते हैं और इन्हें गर्व भी है खुद पर अपने सम्प्रदायों पर | लेकिन इनमें अधिकांश धार्मिक नहीं होते, केवल कुछ इक्के दुक्के कभी कभार धार्मिक दिख जाते हैं |

साम्प्रदायिकों और धार्मिकों में अंतर करना बहुत ही आसान है | साम्प्रदायिकों की भीड़ सबसे बड़ी दिखाई देगी जब भी कहीं कोई मंदिर-मस्जिद का खेल चल रहा हो, जब भी कहीं कोई धार्मिक दिखावा व ढोंग का कार्यक्रम चल रहा हो | इनकी भावनाये आहत हो जाती हैं जब कोई इनकी आसमानी किताबों को भला बुरा कहता है, इनके आराध्यों को भला बुरा कहता है |

लेकिन धार्मिकों की भीड़ ऐसी भीड़ों से अलग किसानों के साथ खड़ी नजर आएगी | धार्मिकों कि भावनाएं आहत होती हैं जब किसी किसान या आदिवासी पर अत्याचार होता है, जब कोई किसी कमजोर, निहत्थे पर अत्याचार करता है, जब कोई भूमाफिया किसी गरीब कि भूमि छीनता है | क्योंकि धार्मिक लोग धर्म का रट्टा लगाकर नहीं घूमते, बल्कि धर्म को जीते हैं | जबकि साम्प्रदायिक लोग धर्म व धार्मिक कार्यों से हमेशा दूरी बनाये रखते हैं, लेकिन दिखावों जैसे मंदिर-मस्जिद, धर्म के नाम पर जुलुस, धर्म के नाम पर उत्पात आदि में हमेशा बढ़चढ़कर भाग लेते हैं |

तो धार्मिक आपको बहुत ही कम दिखाई देंगे, जबकि साम्प्रदायिकों की भीड़ सबसे बड़ी दिखाई देगी | और चूँकि इनकी जनसँख्या धार्मिकों से कई गुना अधिक होती है, इसीलिए इन्हीं कि हुकुमत भी चलती है | धार्मिकों को ये लोग किसी गिनती में नहीं रखते क्योंकि साम्प्रदायिकता ही इनका धर्म है, न कि अन्याय, व अत्याचार के विरुद्ध खड़े होना, गरीबों कमजोरों की सहायता करना |

सौभाग्यशाली हूँ मैं कि मेरे पारिवारिक संस्कारों ने मुझे साम्प्रदायिक नहीं, धार्मिक बनाया |

मेरी धार्मिक भावनाएँ साम्प्रदायिक उन्मादियों के इशारों पर आहत नहीं होतीं, बल्कि तब आहत होतीं हैं, जब साढ़े सात सौ किलो प्याज उगाने के लिए किसी किसान को चार महीने श्रम करना पड़ता है और उसे कीमत मिलती है केवल एक हज़ार रूपये उन साढ़े सात सौ किलो प्याज के |

मेरी धार्मिक भावनाएं तब आहत होती हैं, जब किसान को अपनी भूमि बेचनी पड़ती है अपनी बेटी के लिए दहेज़ जुटाने में |

मेरी धार्मिक भावनाएँ तब आहत होती हैं, जब बैंक में जमा अपने ही धन को निकालने के लिए टैक्स चुकाना पड़ता है |

मेरी धार्मिक भावनाएं तब आहत होतीं हैं जब देश के बैंकों को चूना लगाने वाले विदेशों में ऐश करते हैं और उनका कर्जा आम जनता से वसूला जाता है |

जबकि साम्प्रदायिकों की धार्मिक भावनाएँ ईशनिंदा पर आहत होती हैं, उनके धार्मिक ग्रंथों और आराध्यों के अपमान पर आहत होती हैं | साम्प्रदायिकों को केवल हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर मस्जिद, सवर्ण-दलित खेलने में ही रूचि है, बाकि कोई भी सामाजिक, राष्ट्रिय हितों से सम्बंधित विषयों में इनकी कोई रूचि नहीं होती |

~विशुद्ध चैतन्य

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