राजनीति में अपराधियों का वर्चस्व क्यों ?

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अधिकांश नागरिकों को कहते सुना होगा आपने कि हमें राजनीति से कोई मतलब नहीं, हम राजनीती से दूर ही रहते हैं | रॉबर्ट ए० डहल ने लिखा है; ‘‘राजनीति आज मानवीय अस्तित्व का एक अपरिहार्य तत्व बन चुकी है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में किसी न किसी प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था से संबंद्ध होता है।’’

जो निष्क्रिय हैं वे भी राजनैतिक रूप से सक्रिय हैं

मनुष्य, राज्य की इकार्इ है। मनुष्यों के बिना राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती | किसी भी राज्य की प्रथम इकाई होता है व्यक्ति, दूसरी इकाई होता है परिवार, तीसरी इकाई होता है समाज….फिर गाँव, फिर नगर | लेकिन ये सभी मनुष्यों पर ही निर्भर हैं क्योंकि मनुष्य ही न हों जिस गाँव, नगर, राज्य या राष्ट्र में, तब उसे कोई राज्य या राष्ट्र नहीं कहता | तो जब पहली ही ईकाई व्यक्ति होता है, फिर वह राज्य से अलग कैसे हुआ और जब राज्य से अलग नहीं तो राज्य की नीति अर्थात राजनीती से अलग कैसे हो सकता है ?

कोई चाहे कितना ही निष्क्रिय दिखे राजनीति में, लेकिन उसकी निष्क्रियता भी राजनीती में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही होती है | क्योंकि निष्क्रियता में भी यह छुपा होता है कि वह वर्तमान राजनीती को स्वीकार रहा है | यदि महँगाई बढ़ती है कोई व्यक्ति विरोध नहीं कर रहा, इसका अर्थ है वह महँगाई का समर्थन कर रहा है | यदि राज्य में भ्रष्टाचार या अन्य अपराध बढ़ रहे हैं, कोई विरोध नहीं कर रहा या निष्क्रिय है, इसका अर्थ है कि वह भ्रष्टाचार व अन्य अपराधों का समर्थन कर रहा है | जो सक्रिय रूप से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का समर्थन या विरोध कर रहे होते हैं, केवल वही लोग राजनीती नहीं कर रहे होते |

यदि आप टैक्स देते हैं, यदि आप राज्य से प्राप्त सुविधाओं का उपभोग करते हैं, जैसे कि बस, ट्रेन, सड़क, ड्राविंग लाइसेंस, स्कूल-कॉलेज के सर्टिफिकेट, डिप्लोमा, डिग्री, सरकारी नौकरी, नागरिक प्रमाणपत्र आदि इत्यादि…तो आप राजनीती से अलग नहीं हैं | राज्य सरकारों की निति तय करेगी कि आपकी कमाई की कितनी राशि सरकार को टैक्स के रूप में चुकाना है, सरकार विदेशों से जो कर्ज लेती है, वह आपको ही चुकाना होता है, महंगाई और टैक्स के रूप में…..तो कोई भी नागरिक राजनीती से अछूता कैसे हो सकता है ?

अधिकांश नागरिक क्यों स्वयं को राजनीति से अलग मानने लगे ?

जहाँ भी ताकत हो, जहाँ भी प्रभुत्व हो, जहाँ भी दूसरों से अधिक श्रेष्ठ दिखने या अनुभव करने का अवसर हो, जहाँ भी धन हो…वह सभी क्षेत्र महत्वपूर्ण हो जाते हैं | हर व्यक्ति उस क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित करने का स्वप्न देखने लगता है | और जहाँ भी ऐसी स्थिति होगी, वहाँ संघर्ष होगा ही | और जहाँ संघर्ष होगा वहाँ अपराधियों का वर्चस्व भी बढ़ेगा ही | क्योंकि अपराधियों को मृत्यु का भय उतना नहीं रहता, जितना कि स्वयं को ईश्वर भक्त, या धार्मिक, या सभ्य समझने वालों में होता है |

सभ्य लोग वास्तव में सभ्य केवल इसलिए दिखते हैं क्योंकि वे कायर होते हैं | और यही कायरता उन्हें ईश्वर के प्रति अंधभक्ति प्रदान करती है, यही कायरता उन्हें अपराधियों का सामना करने से रोकती है, यही कायरता उन्हें अस्त्र-शस्त्रों से दूर रखती है और यही कायरता उन्हें विवश करती है यह कहने के लिए कि उन्हें राजनीती में कोई रूचि नहीं है | सभ्य समाज ने यह धारणा बैठा ली है मन में कि राजनीति केवल अपराधियों, हत्यारों के ही बस की बात है, अधर्मियों के ही बस की बात है, सभ्य व धार्मिकों को दूर ही रहना चाहिए |

जबकि वास्तविकता बिलकुल विपरीत है | राजनीति अपराध करने, घोटाले करने, जनता को लूटने के लिए नहीं बनी | राजनीति बनी है राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए, सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवस्था को सहज बनाने के लिए | राजनीति का उद्देश्य ही है, समाज के प्रत्येक नागरिक के साथ न्याय करना, किसी के साथ कोई छल-कपट न हो यह सुनिश्चित करना |

राजनीती में हिंसा व अपराध का वर्चस्व क्यों

इतिहास उठाकर देख लीजिये राजनीति हमेशा खून से सना ही मिलेगा |

शेष…..बाद में लिखूंगा…..

 

 

राजनीति क्या है?

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