घातक है कायर व भयभीतों का संगठन

कोई कितना ही बहादुर या ताकतवर क्यों न हो, जब घिर जाता है सियार, लकड़बग्घे या जंगली कुत्तों के झुण्ड में, जैसे इंस्पेक्टर सुबोध घिर गये थे, तब वह असहाय हो जाता है कुछ इसी तरह जैसे यह शेर असहाय हो गया |

ऐसे में कोई एक भी साथी आगे बढ़ जाए सहायता के लिए, तो घिरे हुए प्राणी के लिए नयी उर्जा व शक्ति बन जाता है | उसके बाद जो होता है वह इस विडियो में आप स्वतः ही देख व समझ सकते हैं |

अकेला शेर 

दुर्भाग्य से ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों के आसपास कायरों का ही झुण्ड ही अधिक होता है जो संकट देखते ही साथी को अकेला छोड़कर हिरण हो जाते हैं | जबकि असामाजिक तत्त्व व नेताओं के पालतू गुंडे-मवालियों में वही एकता होती है, जो लकड़बग्घों, सियारों, भेड़ियों, जंगली कुत्तों में होती है | यही कारण है कि कुछ मुट्ठी भर गुंडे-मवाली पूरे सभ्य व धार्मिक समाज पर हावी हो जाते हैं | ईमानदार लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें पता होता है कि वे बेईमानों से घिरे हुए हैं और उन्हीं का कोई अपना ही साथी उन्हें शिकार बना सकता है |

जिस दिन भले लोग, सभ्य लोग, धार्मिक लोग परस्पर उसी तरह से संगठित हो जायेंगे, जिस प्रकार लुच्चों-लफंगों, गुंडे-मवालियों, दंगाइयों का समाज संगठित रहता है, उस दिन स्थिति बिलकुल पलट जायेगी | तब सत्ता में धूर्त-मक्कार नहीं पहुंचेंगे, बल्कि ईमानदार लोग पहुँचेंगे | तब धर्म-जाति के आधार पर समाज को बाँटने नेताओं कि जयजयकार नहीं हुआ करेगी, बल्कि समाज को जोड़ने वाले नेताओं की जयजयकार हुआ करेगी | तब मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, आरक्षण-आरक्षण खेलने वाले नेताओं और पार्टियों को महत्व नहीं दिया जाएगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, न्यायिक समानता, सद्भाव, सुरक्षा, कृषि, किसान, विज्ञान, राष्ट्रीय उत्थान आदि को महत्व दिया जाएगा | तब धर्म और जाति के आधार पर नेता नहीं चुने जायेंगे, बल्कि चुने हुए नेताओं से प्रश्न पूछे जायेंगे कि पाँच वर्षों में क्या किया…यदि उसने सिवाय धर्म व जाति के नाम पर नफरत फैलाने, जनता को लूटकर अमीरों को दान करने के सिवाय और कोई महान कार्य नहीं किया, तो उसे विदा कर दिया जाएगा और किसी नए नेता को अवसर दिया जाएगा |

घातक होता है भयभीत व कायरों का संगठन

भयभीत व कायरों का संगठन समाज व राष्ट्र के लिए घातक होता है | क्योंकि ये स्वार्थ व भय के वशीभूत होते हैं | क्योंकि इनके पास विवेक बुद्धि बहुत ही कम होती है | क्योंकि ये दूसरों पर निर्भर रहते हैं और इनकी एकता व परस्पर सहयोगिता परमार्थ पर नहीं, स्वार्थ व भय पर आधारित होता है | इनका संगठन कितना ही विशाल क्यों न हो जाए, ये असहाय व बेबस ही दिखाई पड़ेंगे और दूसरों की बनायीं, उपजाई चीजों को छीनना ही इनके समाज में बहादुरी मानी जाती है |कोई भी धूर्त इन्हें दूसरे दड़बे से खतरा बताकर इन्हें डरा सकता है और फिर ये डरे हुए लोग आस्तीन के सांप बन जाते हैं | यानि फिर ये अपने ही समाज अपने ही देश को डसने लगते हैं |

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ऐसे संगठनों या दलों का सबसे अधिक लाभ धर्म व जाति के ठेकेदार व धूर्त मक्कार राजनेता और पार्टियाँ ही उठाती हैं | इनका उपयोग दंगा-भड़काने, साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने, समाज में फूट डालने और छल-कपट से चुनाव जीतने में ही अधिक होता है | ये संगठन समाज व राष्ट्र के लिए सदैव घातक रहे हैं और रहेंगे |

संगठन यदि शोषितों, पीड़ितों का बन जाये तब भी ये समाज व राष्ट्र के लिए कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं देते | न ही इनका संगठन परस्पर सहयोग करके एक दूसरे को उठाने का कार्य करते हैं | ये लोग तो इस लायक भी नहीं होते कि अपना ही कोई मंदिर बना लें, बल्कि दूसरों के बनाये मंदिरों को हथियाने की जुगत लगाते फिरते हैं |

इनकी मानसिकता जंगली कुत्ते और लकड़बग्घों से अधिक उन्नत नहीं होती क्योंकि ये संगठन स्वयं को अयोग्य मान चुके लोगों का होता है जो स्वार्थ और लोभ में अंधे हो चुके होते हैं |लेकिन यदि इन्हें कोई समझदार विवेकवान नेता मिल जाए तो यही लोग राष्ट्र व समाज के लिए बहुत बड़ा योगदान देने की क्षमता रखते हैं |

लाभकारी हैं निडर, निःस्वार्थ पर्मार्थियों का संगठन

यदि संगठन ऐसे लोगों का बने, जो विवेकवान हों, साम्प्रदायिक नहीं बल्कि धार्मिक हों, निःस्वार्थी हों, निर्भय हों, तो निश्चित ही ऐसे संगठन समाज व राष्ट्र के लिए लाभकारी होते हैं | ऐसे संगठन बने भी और उन संगठनो से समाज के हितों के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य भी किये, महत्वपूर्ण योगदान भी दिए |

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बौद्ध, जैन, सिख, इस्लाम, आदि सभी कभी संगठन बने सामाजिक हितों के लिए, और आगे चलकर समाज का महत्वपूर्ण अंग बने और फिर स्वयं ही समाज या सम्प्रदाय में रूपांतरित हो गये |

यदि संगठन सामाजिक हितों को महत्व देता है, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं करता, अपनी शक्ति का प्रदर्शन निर्बलों को आतंकित करने, लूटने-खसोटने या शोषण के लिए नहीं करता, सभी के लिए समान भाव रखता है कोई भेदभाव नहीं करता, तब यह पंथ या सम्प्रदाय में रूपांतरित हो जाता है |

लेकिन यदि ऐसे संगठनों में स्वार्थियों, लोभियों की घुसपैठ शुरू हो जाती है और फिर जल्दी ही वह समूह दूसरों पर अत्याचार शुरू करना शुरू कर देता है | जैसे जैसे संगठन विशाल होता जाता है स्वार्थियों, लोभियों के जुड़ने से, वैसे वैसे ही वह दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप करना शुरू कर देता है | यदि ऐसे संगठनों की मजबूत पकड़ सत्ता पर हो गयी, तब ये नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने से भी नहीं चूकते |यही सम्प्रदाय जब अराजक तत्वों के अधीन हो जाता है, तब साम्प्रदायिकता का उदय होता है और वह सम्प्रदाय अपने ही सदस्यों के हितों के लिए कार्य करना बंद करके, दूसरे सम्प्रदायों को परेशान व आतंकित करना शुरू कर देता है |

सारांश यह कि संगठन का बहुत महत्व है किन्तु तभी तक, जब तक उस संगठन के नेतृत्व विवेकवान, जनहितैषी, भेदभाव मुक्त प्रतिनिधियों के हाथ रहता है | लेकिन यदि स्वार्थी, लोभियों के हाथ नेतृत्व आ गया तो किसानों, आदिवासियों पर अत्याचार बढ़ जाएगा | निर्बलों, निर्धनों को सबल, समृद्ध बनाने के स्थान पर उनका शोषण शुरू हो जायेगा |

~ विशुद्ध चैतन्य

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