आपको कितने रूपये कमाने की आवश्यकता है सुखी होने के लिए ?

आनंद धाम सोसायटी के फ्लैट संख्या-302 में कुनाल गिलहोत्रा अपने परिवार के साथ रहते है। उन्होंने एक लैबराडॉर पाला है। गत 24 अप्रैल को भूकंप आने पर उनका बेटा लैबराडॉर लेकर लिफ्ट से नीचे आ रहा था। इस दौरान लिफ्ट में मौजूद दो महिलाओं ने शोर मचा दिया।

महिलाओं की शिकायत पर आरडब्ल्यूए ने 26 अप्रैल को बैठक बुलाई और पालतू पशु रखने वाले तीन रेजिडेंट्स को नोटिस जारी कर दिया। आरडब्ल्यूए ने रेजिडेंट्स की असुविधा का हवाला देते हुए पालतू पशुओं को सोसायटी से बाहर निकालने का निर्देश दिया गया।

पालतू पशुओं को बाहर नहीं निकालने पर बिजली-पानी का रिचार्ज नहीं करने की चेतावनी दी गई। गत 27 अप्रैल का जब कुनाल रिचार्ज कराने गए जो आरडब्ल्यूए ने मना कर दिया। उन पर कुत्ते को बाहर निकालने का दबाव बनाया गया। courtesy: Amarujala

 एक बार अपने घर से बाहर निकले नौकरी की तलाश में तो फिर जीवन भर नौकर ही बने रहते हैं | मालिक कभी बन ही नहीं पाते न घरे के न स्वयं के | एक किसान होना स्वयं में गर्व की बात है क्योंकि अपनी जमीन के हम ही मालिक होते हैं और कम से कम हम अपने परिवार का पेट तो भर ही सकते हैं अपनी जमीन से | लेकिन आज भेड़चाल और चमक-दमक में उलझकर किसानों ने अपनी जमीने बेचनी शुरू कर दी और सोसायटी या सरकारी फ़्लैट नामक दड़बों में अपने अपने घोंसले बनाने शुरू कर दिए | महंगी कीमत में खरीदे ये दड़बे भी उतनी ही अहमियत रखते हैं, जितने गुलामों के बैरक या दड़बे | इन दड़बों का मालिक कोई और होता है और वह जब चाहे आपकी बिजली पानी बंद कर सकता है | और आप असहाय हो जाते हैं क्योंकि आपका सारा पैसा इस दड़बे को खरीदने में लग गया और बैंक की किश्ते भर रहे हैं जो अलग |

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कुल मिलाकर यदि आप स्वयं से यह प्रश्न करें कि क्या आप स्वतंत्र हैं ? तो उत्तर मिलेगा नहीं | आप कभी स्वतंत्र थे ही नहीं | आप कभी भी इतने स्वतंत्र नहीं थे, जितना कि कोई किसान होता है | लेकिन किसानों को लगता है कि ये दड़बों में रहने वाले अधिक सुखी हैं | और दड़बों में रहने वाले किसानों को दुखी समझते हैं क्योंकि आये दिन किसानों की आत्महत्या की खबरें छपती हैं | लेकिन शहरों में किसानों से कहीं अधिक आत्महत्याएं हो रहीं हैं | शहरी लोग एक किसान से कहीं अधिक तनाव में रहते हैं | शहरी लोग १२ से अधिक घंटे गुलामों की तरह काम करते हैं, जबकि किसान काम करते हुए भी तानव मुक्त रहता है |

जरा सोचिए कि एक एकड़ की भूमि कहीं किसी गाँव में आपके पास हो और उसमें न कोई फ़्लैट हों और न ही कोई और अनावश्यक आडम्बर | बस छोटा सा बगीचा हो, जिसमें अपनी आवश्यकता की सब्जियां, फल, फूल आदि हों, बड़े छायादार वृक्ष हों, सोलर उर्जा की व्यवस्था हो…… तो कैसा जीवन हो ? फिर आपको कितने रूपये कमाने की आवश्यकता है सुखी होने के लिए ?

जीवन का क्या अर्थ है यदि वह समझ में आ जाए तो कोई व्यक्ति क्यों दड़बों में एक गुलाम की तरह रहना चाहेगा और क्योंकि वह पैसा कमाने की मशीन का जीवन जीना चाहेगा |

मनुर्भवः अर्थात मनुष्य बनो !

क्या आप मनुष्य बने ?

~विशुद्ध चैतन्य

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