तोते में प्राण


बचपन में एक राक्षस की कहानी सुनी थी कि एक राक्षस था जो अपने प्राण तोते में रखता था इसलिए वह तोते कि सुरक्षा में कोई कमी नहीं रहने देता था | लेकिन एक दिन किसीने उस तोते की गर्दन मरोड़ दी और राक्षस मर गया |

बचपन था और कहानियों का युग होता था वह, लेकिन समय के साथ साथ समझ में आने लगा कि कहानियां बनाने वाले बहुत ही विद्वान् होंते थे | वह राक्षस कोई और नहीं हम ही हैं, यह समाज ही है वह राक्षस | तोता कोई और नहीं वही नेता, मंदिर, मूर्तियाँ और वह सब चीजें हैं जिन्हें हम अत्यधिक महत्वपूर्ण मानते हैं और मरोड़ने वाला कोई और नहीं, वही लोग हैं जो हमें आपस में लड़ाते, डराते रहते हैं | और उन तोतों की सुरक्षा का ठेका लेकर बैठे हुए हैं |

हमारी जान अटकी है, नेता में तो कोई भी आपके नेता को गाली दे-दे और आपका खून खोलने लगता है फिर चाहे वह नेता आपके लिए कुछ करता हो या न हो, फिर चाहे वह नेता पुरे मोहल्ले में ही बदनाम क्यों न हो | कोई मंदिर-मस्जिद में मांस, या गोमांस फेंक दे तो मार-काट करने लगते हो क्योंकि आपकी जान अटकी है मंदिर-मस्जिद में | कोई कभी आपके प्रिय देवी देवताओं की मूर्ती को लेकर कुछ कह दे तो आप सर के बल खड़े हो जाते हो गुस्से में.. अक्ल को भेज देते हो चारा चरने.. विशेषकर जबकि ऐसे समय में अक्ल की सबसे अधिक आवश्यकता रहती है |

अब जरा सोचिये कि आपके तोतों के नाम पर कुछ मुट्ठी भर लोग सदियों से आपको बन्दर सा नचाते आये और आप लोगों का तमाशा बनांते रहे | कभी दंगा करवा दिया, कभी लड़की उठवा ली…. उनका बाल भी बांका नहीं होता और आप लोगों का घर-परिवार उजड़ जाता है |

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चलिए वह तो कहानी थी, और कथाकार अनपढ़ था उसे अंग्रेजी भी नहीं आती थी… लेकिन आप लोग तो पढ़े लिखे हैं ! फिर अंग्रेजी भी आपको आती है… तो इतनी सी बात क्यों नहीं सीखी इस कहानी से कि प्राण किसी तोते में नहीं रखना चाहिए | प्राण रखने ही है तो आजकल बैंकों में लॉकर की सुविधा है वहाँ रखिये, ऍफ़डी करवा दीजिये…. बहुत से आधुनिक उपाय हैं आजकल | अगर साइंस आपका विषय था तो आपको पता ही होगा कि प्राण नाम की कोई चीज होती ही नहीं है केवल भ्रम है | अगर औकल्ट साइंस आपका विषय रहा तो आप जानते है कि प्राण एक एनर्जी है और उसका विस्तार आपके पारिवारिक सदस्य के रूप में भी हो सकता है जैसे कि पिता, माँ, पति/पत्नी, बच्चे आदि | लेकिन तब भी केंद्र में आप ही होते हैं | जैसे ही आप मिटे, सभी कुछ मिट जाएगा आपके लिए | लेकिन कहानी के अनुसार तो तोता मिट जाता है तो आप मिट जाते हैं |

अब बताइये, इतनी अंग्रेजी सीखने के बाद भी आप लोग बेरोजगार, सड़कछाप टूटपूंजियों के बहकावे में आकर अपना सुख चैन खो रहे हैं ? ये लोग कोई भी उलुल-जुलूल पोस्ट बनाकर डालते हैं और आप लोगों का खून खोलने लगता है…इनके लिए आप लोग मनोरंजन का साधन मात्र बनकर रह गये | ये बेरोजगार, निकम्मे लोग आजकल राष्ट्रभक्ति, नेताभक्ति और धर्मों-जातियों के नाम पर यही सब करने में लगे हुए हैं | क्योंकि इनको पता चल चुका है की आपलोगों की जान किस तोते में अटकी हुई है | इसलिए ये लोग जब चाहें तब आप लोगों को आपस में लडवा देते हैं और फिर तालियाँ पीटते हैं ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोग मुर्गों को लड़वाकर तालियाँ पीटते हैं |

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यदि आध्यात्म में रूचि है आप में से किसी की तो केंद्र में आ जाइए स्वयं के | फिर आपको कोई भी धर्म के नाम पर नहीं उकसा पाएगा और न ही लडवा पायेगा किसी से | तब सही मायने में अपने प्राणों के विषय में ज्ञान होगा और आप दूसरों के बनाये तोतों पर अपने प्राण नहीं रखेंगे | और तब आप जान पायेंगे कि जीवन कितना सुख व प्रेम से भरपूर है | तब आप जान पाएंगे कि आज तक जिन विषयों पर आप लोगों को ध्यान देना चाहिए था, उसपर कभी दिया ही नहीं, केवल तोता नचाने वालों के इशारे पर नाचते रहे क्योंकि आपको यही बताया जाता रहा कि उनके हाथ में जो तोता है, उसमें ही आपकी जान है | और आप ने कभी सोचने तक कि फुर्सत नहीं निकाली कि वह सही कह रहा है या झूठ | ~विशुद्ध चैतन्य

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