विविधता में विद्यमान है सनातन धर्म

Beauty of nature

जब हमारे देश में सनातन-धर्म के नाम की चर्चा होती थी तब हिन्दू धर्म नहीं था और न ही इस्लाम या ईसाई या बौद्ध या जैन……. लेकिन ऋषियों का मूल उद्देश्य सनातन-धर्म नाम के प्रयोग का समय के साथ तिरोहित हो गया और सम्प्रदायों, पन्थो को धर्म का नाम दे दिया गया |

कारण केवल यही था कि मूल धर्म किसी की भी समझ में नहीं आया | प्रेम, सहयोग, भाईचारा आदि सब किताबी बातें ही रह गयीं, इनके अर्थ भी शायद धार्मिकों को समझ में नहीं आया | प्रेमियों को मार देना या जिन्दा जला देना आदि इस बात का प्रमाण है कि प्रेम से हमारे समाज को सख्त नफरत रहा कालान्तर में | जबकि उससे पहले स्त्रियों को स्वयंवर की स्वतंत्रता थी | उससे पहले गन्धर्व विवाह को मान्यता थी | उसके पहले…..

तो समय के साथ कट्टरता समाज में अपना स्थान बनाती चली गयी और सनातन धर्म व्यवहार से बाहर होता चला गया | फिर ज़माना आया कर्मकांडों का और कर्म कांडों को धर्म मान लिया गया और तब से लेकर आज तक कर्मकांडों को ही धर्म माना जा रहा है | यानि विभिन्न सम्प्रदाय और उनके कर्मकांडों को खानपान को धर्म के रूप में स्थापित कर लिया गया क्योंकि इससे सुविधा होती है आपस में लड़वाने और मार-काट करवाने में धर्मों के ठेकेदारों को |

लेकिन यदि मैं सनातन को महत्व देता हूँ तो उसका प्रमुख कारण है कि सनातन में विरोध नहीं है किसी के भी मौलिक गुणधर्मों का | यहाँ पशु को मानव बनाने की कोशिश नहीं की जाती, शेर को गीदड़ बनाने की कोशिश नहीं की जाती, गाय को माँस खाने को बाध्य नहीं किया जाता और शेर को घास खाने को बाध्य नहीं किया जाता | न ही मछली को उड़ने के लिए दबाव दिया जाता है और न ही चिड़ियों को तैरने के लिए | यह और बात है कि कोई मछली उड़ना चाहे तो उसे रोका नहीं जाता और कोई पक्षी तैरना चाहे तो उसे भी नहीं कहा जाता कि तुम काफिर हो या अधर्मी हो | लेकिन सनातन को छोड़ कर सभी तथाकथित धर्म जो कि धर्म नहीं केवल पंथ या सम्प्रदाय है, उनमें इतनी विराटता, इतना खुलापन नहीं है | उसका कारण केवल यही है कि किताबों पर आधारित हैं ये सारे सम्प्रदाय…. जरा-जरा सी बात बात पर इनका धर्म खतरे में पड़ जाता है… और सही भी है… कागज के धर्म तो पानी की बूंद से भी खतरे में पड़ जायेंगे |

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तो सनातन-धर्म ही वास्तविक धर्म है जो खतरे में नहीं पड़ता क्योंकि यह किसी किताब या अवतार या पैगम्बर या मसीहा पर नहीं टिका है | इसमें जो जैसा करता है, वैसा ही भरता है… किसी ठेकेदार या धर्मरक्षक की आवश्यकता नहीं पड़ती | प्रत्येक प्राणी स्वयं ही स्वयं का पैगम्बर, मसीहा और अवतार है | वह स्वयं अपने अच्छे बुरे का जिम्मेदार है कोई और न नहीं |

तो चूक गये हम और अपनी गलती थोपने लगे दूसरों पर | हम अपने किसानों और आदिवासियों के हित में तो कुछ कर नहीं पाए, लेकिन मंदिर बनाने में व्यस्त हो गये क्योंकि मंदिर हमारे लिए सिवाय धंधे और राजनीती के और कुछ नहीं है | स्वार्थी लोगों की जेब से पैसे ऐंठने के लिए मंदिर से बेहतर कोई और उपाय शायद नहीं दिखता इन धर्मों के ठेकेदारों को | लेकिन वास्तव में मंदिर का उद्देश्य भी वह नहीं है आज जो कि वास्तव में था कभी | आज जिस गाँव या शहर का मंदिर सबसे अमीर होगा, उसी के आसपास सबसे गरीबी और लाचारी दिखाई भी देगी.. क्योंकि मंदिर स्वयं धर्म से विमुख है | मंदिर भी केवल वसूली दफ्तर से अधिक कुछ और नहीं है, बस इसमें लोग खुद ही आकर लुटते हैं धर्म और श्रृद्धा के नाम पर | लेकिन सनातन धर्म का मूल आधार आपसी सहयोगिता का भाव यहाँ खो गया |

सनातन धर्म

गौतम बुद्ध ने भी यही समझाने का प्रयास किया था और नानक ने भी… लेकिन स्थिति इतनी विकृत हो चुकी है ठेकेदारों के कारण कि लोगों को अलग सम्प्रदाय बनाने में ही आसानी हुई | जबकि सनातन धर्म से विमुख तो वे आज भी नहीं हैं | आज भी उनके मूल सिद्धांत प्रेम, सहयोग आपसी भाईचारा… आदि ही हैं | सभी सम्प्रदायों में यही मूल सिद्धांत हैं जहां तक मेरी जानकारी है | लेकिन केवल खान-पान, रहन सहन के कारण ही वे यह मान रहे हैं कि ब्राहमण सनातनी हैं और दलित अलग हैं, हिन्दू अलग हैं आर्यसमाजी अलग हैं, ईसाई अलग हैं, मुस्लिम अलग हैं…..

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मेरा मानना है कि हम सभी सनातन धर्म के ही अनुयाई हैं चाहे कर्म-काण्ड, पूजा-पाठ, खान-पान, रहन-सहन भिन्न ही क्यों न हों | सनातन धर्म तो विविधता को इतना महत्व देता है कि उसने तो दो लोगों की अँगुलियों के निशाँ भी भिन्न रखे हैं | सनातन धर्म में भिन्नता का इतना महत्व है कि उसने हमारे ब्लड के ग्रुप भी एक जैसे नहीं नहीं रखे | इसमें तो फूलों के रंग भी एक जैसे नहीं हैं और पृथ्वी की जलवायु भी सभी जगह एक जैसी नहीं है | इसलिए ही सनातन धर्म से विराट, सेक्युलर और सभी को समान महत्व देने वाला धर्म कोई और है ही नहीं | और मेरे जैसा सनातनी न इसाइयों का विरोधी हो सकता है, न मुस्लिमों का न हिन्दुओं का न सिक्खों का, न बौद्धों का, न जैनों का.. हाँ विरोध होगा तो केवल कुर्तियों का होगा, बुराइयों का होगा | क्योंकि मैं धर्म और सम्प्रदायों के अंतर को जानता हूँ | क्योंकि मैं किताबी धर्म और व्यवहारिक धर्मों के अंतर को जानता हूँ | इसलिए मुझे नसीहत न दिया करें अपनी अपनी किताबी धर्मो को पढ़ने की |

~विशुद्ध चैतन्य

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