स्वयं को सुधारने का अर्थ गाँधी जी के तीन बंदर बनना नहीं होता


गुरु जी आप महान है। लेकिन ये महानता कब एकत्र होगी ओर देश का कल्याण होगा। सभी तरफ गलत ही गलत है। हम सिर्फ अपने को सुधार सकते ओर रहै है लेकिन कुछ नही कर सकते । न भक्त सिंह बन सकते ओर न गांधी जी। कोई रास्ता नही दिखाई देता ओर सिर्फ अपने गुणों को सुधारना मेरे को पाप् लगता है। जब हम कुछ नही कर पातै तो हमसे अछहै तो वै लोग जो कुछ गलत कर रहै है गलत मैं भी कुछ तो सही होता ही है | -रूद्र प्रताप


सभी महान आत्माओं, दार्शनिकों, अध्यात्मिक गुरुओं ने स्वयं को सुधारने पर ही बल दिया, सभी ने कहा कि दूसरों को सुधारने में समय व्यर्थ मत करो, स्वयं को सुधारों | तो लोगों ने स्वयं के सुधार के नाम पर समाज की बुराइयों, कूपमंडूकता, किताबी ज्ञान के भँवर में घिरे कूपमंडूकों से अपनी आँखें मूँद लीं | दुनिया भर के कबाड़ों, किस्से कहानियों, राष्ट्र व समाज को खंडित करने में व्यस्त समाज व धर्म के ठेकेदारों द्वारा परोसे गये विषैले ज्ञान को संचित, संगृहीत करके अपने मस्तिष्क व विचारों को विषाक्त करने में व्यस्त रहे | और यह समझते रहे कि स्वयं को बदल लिया | जबकि हुआ यह कि अपनी मौलिकता से दूर होते चले गये और दूसरों द्वारा थोपे गये ज्ञान को अपना समझकर भ्रमित होते रहे | यदि दूसरों के द्वारा लिखे, थोपे गये ज्ञान से ही कल्याण होना होता, तो ये पंडित-पुरोहित, पादरी-मौलवी, स्कूल के टीचर, प्रिसिपल, प्रोफेसर आदि लकीर के फ़कीर नहीं बने होते, नए नए अविष्कार कर रहे होते | फिर बुद्ध, महावीर, जीसस, ओशो, रूमी आदि सदियों में कभी कभार नहीं, हर रोज जन्म लेते कहीं न कहीं | थॉमस एडिसन बिना स्कूल गये अविष्कार करने की जगह, स्कूली शिक्षा पूरी करके ही आविष्कार करते | लेकिन ऐसा हुआ नहीं | क्यों ?

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क्योंकि स्वयं को सुधारने का अर्थ गाँधी जी के तीन बंदर बनना नहीं होता, बल्कि अपनी सोई हुई क्षमताओं को जान-पहचान कर काल-परिस्थिति-स्थानानुसार आचरण करना है | और जब हम ऐसा करने लगते हैं, तो स्वतः ही समाज के लिए बिना कुछ किये ही समाज में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है | सबकी समस्या यही है कि वे दूसरों की तरह बनना चाहते हैं, खुद की तरह कोई नहीं बनना चाहता | कोई गांधी बनना चाहता है, कोई गोडसे बनना चाहता है, कोई मोदी बनना चाहता है कोई मायावती बनना चाहता है…..

तो स्वयं को बदलो, थोपी गयी कायरता, भीरुता से मुक्ति पाओ और जहाँ गलत दिखे खुल कर विरोध करो बिना यह सोचे कि कोई आपको मिटा देगा | अपराधी स्वयं के मिटने के भय से मुक्त होते हैं इसलिए वे नेता बन जाते हैं और जो शराफत के कम्बल से अपनी कायरता को ढंककर बैठे हैं उनको अपना गुलाम बना लेते हैं | इसलिए तय कर लीजिये कि आप गुलाम नहीं बनेंगे चाहे परिणाम जो भी हो | और जिस दिन आप ऐसा संकल्प लेकर कार्य करना शुरू करेंगे, चाहे अपने लिए ही… समाज व राष्ट्र में परिवर्तन शुरू हो जायेगा | लेकिन जब तक स्वयं को सुधारने के नाम पर गाँधी जी के तीन बंदर बने रहेंगे, धूर्त नेता, बाबा और समाज व धर्मों के ठेकेदार राष्ट्र व समाज का शोषण करते रहेंगे और बेहोश समाज भेड़चाल में चलते रहेगा | ~विशुद्ध चैतन्य

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