एक अविस्मर्णीय यात्रा थाईलैंड की

“गुरु जी, हम किसी व्यवसाई/संपन्न व्यक्ति का कार्य करने के लिए अरुचि रखते हैं, उनका कार्य करके हम गुलामी की जंजीरों में कैद हुआ सा महसूस करते हैं, किन्तु उस धनाडय/रहीस व्यक्ति के पैसों पर हम विदेश घूमना, लजीज भोजन करना, ऊँचे और महंगी होटलो में रुकना पसंद करते हैं, जो किसी निरीह/गरीब मजदूर का शोषण कर कमाई गई दौलत का हिस्सा है, इससे अच्छा क्या ये नहीं होता कि पहले हम उस रहीस व्यक्ति की मजदूरी करते फिर कमाई गई राशी से उक्त शौक पूरा करते, कृपया मार्गदर्शन करने का कष्ट करें.”

वेद प्रकाश मिश्रा जी ने उपरोक्त प्रश्न किया था मुझसे |

ऐसे प्रश्न अक्सर मुझसे होते रहते हैं विशेषकर जातिगत ब्राहमण और दलित या फिर मुस्लिम ऐसे प्रश्न करते हैं मुझसे | इस प्रश्न में यदि आप ध्यान दें तो प्रश्न नहीं होते ये, बल्कि व्यंग्य होते हैं, कटाक्ष होते हैं | ये लोग मेरे किसी पोस्ट को कभी नहीं समझ पाते…वैसे भी जातिगत पंडितों, ब्राह्मणों को मेरी बातें समझ में कम ही आती हैं | हाँ वास्तविक ब्राह्मणों को अवश्य मेरी बातें समझ में आती हैं, सनातनियों को मेरी बातें स्पष्ट समझ में आती हैं क्योंकि ये लोग दडबों और किताबी ज्ञान से ऊपर उठ चुके होते हैं | मैं जानता हूँ कि मेरा उत्तर इनकी समझ में नहीं आएगा, फिर भी मैं इस पोस्ट के माध्यम से ऐसे प्रश्न करने वाले सभी किताबी व जातिगत विद्वानों को उत्तर दे रहा हूँ |

मैं अक्सर अपने खेतों, जमीनों को बेचकर नौकरी पाने के लिए लालायित लोगों को गुलाम या शूद्र मानसिकता का कहता हूँ | उसी को आधार बनाया गया इस प्रश्न में | क्योंकि मैं ऐसा क्यों कहता हूँ, वह न कभी समझने का प्रयास किया गया और न ही चिन्तन-मनन किया गया |

खेत खलिहान बेचकर नौकरी पाने की लालसा को मैं मूर्खता मानता हूँ | और क्यों मानता हूँ उसपर मैंने कई पोस्ट लिखे हैं, उन्हें पढकर भी यदि नहीं समझ में आया तो स्वाभाविक है अब दोबारा लिखना उस विषय पर मूर्खता ही होगी मेरी

अब इनकी दूसरी परेशानी यह है कि मैं जब पूंजीपतियों का विरोध करता हूँ, तो फिर धनाढ्य वर्ग के निमंत्रण पर महंगे होटलों पर भोजन क्यों कर रहा हूँ, उनकी महँगी गाड़ियों में क्यों घूम रहा हूँ | यहाँ भी इनकी ईर्ष्या ही झलकती है
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मैं थाईलैंड आने के बाद जिन लोगों के साथ घूम रहा हूँ, उनके विषय में जानकारी भी दी थी, लेकिन इन किताबी विद्वानों का दिमाग कुंद होता है, इसलिए इनको वह सब बातें नहीं दिखाई देती | इनको दिखाई देता है मेरा महँगी गाड़ियों में घूमना और जिसने महँगी गाड़ी ले रखी है वह गरीबों का शोषण करके ही ली होगी यह इनकी धारणा होती है | इस पोस्ट के साथ जो तस्वीर दी है मैंने, उसे ध्यान से देखें और पता करें इनकी शक्ल देखकर कि कौन धनी है और कौन गरीब | इस तस्वीर में कुछ यहाँ के बड़े उद्योगपति हैं जो कई हज़ार लोगों को रोजगार दे रहे हैं, देश विदेश में व्यापार कर रहे हैं और कुछ किसी कंपनी में नौकर हैं और कुछ इन उद्योगपतियों की ही कंपनी में नौकरी करते होंगे |

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मैंने अपने एक पोस्ट में बताया था कि कैसे एक कार चालक को मैं ड्राईवर समझने की भूल कर बैठा था, जबकि वह यहाँ का सम्मानित उद्योगपति था | दिन भर उसने हमें अपने से अलग नहीं होने दिया, खुद ही जूस, फल आदि लाकर देता रहा किसी नौकर के हाथों कुछ नहीं भिजवाया | मैंने यह भी बताया था कि कैसे यहाँ के साधू-संत इन उद्योगपतियों के साथ मिलकर गरीब परिवारों की सहायता करते हैं | वे सभी बातें आपके दिमाग से निकल गयीं, रह गयी तो केवल यह कि विशुद्ध चैतन्य पूंजीपतियों की गाड़ी में घूम रहा है | यानि विशुद्ध चैतन्य को यहाँ विदेश में भीख का कटोरा लिए पैदल घूमना चाहिए था और फूटपाथों या मंदिरों की सीढ़ियों पर सोना चाहिए था |

तीसरी बात जो इन पंडित जी ने कही इस प्रश्न में वह यह कि एक संन्यासी को नौकरी करनी चाहिए इन पूंजीपतियों की, फिर उस नौकरी से धन अर्जित कर अपने घुमने फिरने का शौक पूरा करना चाहिए था | आप इनकी मानसिकता से ही अनुमान लगा सकते हैं कि ये अपने नाम के पीछे मिश्रा लगाने वाली जाति हिन्दू धर्म और सन्यास के विषय में कितना ज्ञान रखते हैं | ये संन्यासियों से ईर्ष्या रखने वाली प्रजाति को शर्म नहीं आती हमें गुरूजी कहकर संबोधित करते हुए | इन्हें न तो गुरु शब्द की गरिमा का कोई भान है और न ही संन्यासी के प्रति कोई सम्मान है | ऐसे धूर्त दोगले ब्राह्मणों के कारण ही धूर्त साधू-संन्यासियों का वर्चस्व है भारत में |

जिस थाई नागरिक ने मुझे आमंत्रित किया था थाईलैंड घुमने के लिए, उनके विषय में थोड़ी जानकारी दे दूं आप लोगों को | वे बौद्ध दर्शन के प्रोफ़ेसर हैं और यहाँ स्वदेशी व विदेशी बौद्ध स्नातकों को बौद्ध दर्शन पढ़ाते हैं | वे व्यापार भी करते हैं लेकिन किसी का शोषण करने के लिए नहीं | वे दूसरे देशों से सामान आयात करते हैं और थाईलैंड के व्यापारियों को उपलब्ध करवाते हैं | वे यहाँ के नागरिकों की समस्याएँ भी सुलझाते हैं और जो आर्थिक रूप से उच्च शिक्षा प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं, उनकी आर्थिक सहायता भी करते हैं | ये बौद्ध भिक्षुओं के साथ मिलकर ग्रामीणों के उत्थान के लिए सतत प्रयासरत रहते हैं, इसलिए इनका सम्मान थाईलैंड के सभी वर्गों में होता है | इनका सम्मान विश्व हिन्दू परिषद भी करता है और आरएसएस भी और यहाँ के बौद्ध मंदिर, उद्योगपति, आम नागरिक से लेकर सरकार तक करते हैं | यहाँ के सभी अधिकारी इनका सम्मान करते हैं | और विनम्रता इनकी इतनी है कि मैं जब तक यहाँ हूँ, तब तक इन्होने सभी कामों से छुट्टी ले रखी है और दिन भर मेरे साथ रहते हैं | अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाते हैं, और वह सम्मान मुझे देते हैं, जो आप जैसे धूर्त पंडित, ब्राह्मण, मौलवी, पादरी, दलित नेता कभी नहीं दे सकते | कल्पना करिए कि मेरा आने जाने यहाँ घुमने फिरने में कितना खर्च हो रहा होगा, वह सब बिना किसी संकोच के कर रहे हैं व भी बिना एहसान जताए | मैं तो यहाँ के हिन्दू और भारतीय व्यापारियों से भी मिला लेकिन इनमें से किसी ने मुझपर फूटी कौड़ी खर्च नहीं की, उलटे संघी तो मुझे संन्यासी ही नहीं मानते | धमकी देते हैं कि देवघर में आकर पीटेंगे, थाईलेंड से सही सलामत नहीं जाने देंगे |

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जबकि बौद्ध उद्योगपति मेरे लिए खुद कार ड्राइव करते हैं क्योंकि वे संन्यासियों का सम्मान करते हैं और उनकी सेवा करना गर्व की बात समझते हैं | वे केवल कहते नहीं, व्यावहारिक रूप में करके दिखाते हैं | मैं यहाँ तीन जोड़ी कपडे लेकर आया था | लेकिन यहाँ के बौद्ध व्यापारियों में होड़ लग गयी मेरे लिए कपडे बनवाने की और अब मेरे पास आठ जोड़ी कपडे और हो गये | तो थाईलैंड में आने पर यहाँ बौद्धों से मिला मुझे असली मान-सम्मान किसी हिन्दू या भारतीय से नहीं | हाँ देवमन्दिर के पुजारी हरी ॐ शर्मा और आरएसएस के प्रचारक उमेश शर्मा जी अवश्य मुझसे अच्छी तरह से मिले, लेकिन मेरा मन कहता है कि वे बौद्धों की तरह इमानदार नहीं हैं | वे अब तक मिले हिंदुत्व के ठेकेदारों की तरह ही केवल दिखावे का सम्मान कर रहे हैं | हो सकता है मेरी धारणा गलत हो, लेकिन मैं मानता हूँ कि यहाँ के बौद्ध व्यापारी, समाज व साधू-संत मेरा सम्मान निश्छल मन से कर रहे हैं | यहाँ के बौद्ध संत मुझे अपने मठ में ही रहने का निमंत्र्ण दे रहे हैं |

तो मैं पूंजीपतियों के साथ हूँ, लेकिन वैसे पूंजीपतियों के साथ नहीं, जैसे कि हम भारत में देखते हैं | मैं इनकी गाड़ियों में अपनी टशन दिखाने के लिए नहीं घूम रहा हूँ, बल्कि यह दिखाने के लिए घूम रहा हूँ कि यहाँ के पूंजीपती कितने सहृदय व विनम्र होते हैं | मैं भारतीय समाज को थाईलैंड का वह रूप दिखाने का प्रयास कर रहा हूँ, जो कभी हमारी भारतीय धरोहर थी, जिसे बौद्ध इस देश में लेकर आये लेकिन हमने खो दिया | यहाँ का नागरिक भारतीय संस्कृति को धरोहर के रूप में नहीं सजा कर रखा, बल्कि आज भी अपने दैनिक जीवन में अपने आचरण से व्यक्त करता है | वह शिक्षा जो हम भारतीयों की कभी पहचान थी, आज भारत से विलुप्त हो चुकी, लेकिन थाईलैंड के हर नागरिक ने इसे कीमती धरोहर और बुद्ध से मिली भेंट के रूप में अपने ह्रदय में संजोकर रखा है | यहाँ के बौद्ध उद्योगपति हफ्ते में एक दिन मठों-मंदिरों में जाकर श्रमदान देते हैं और पूरे दिन कोई व्यपारिक चर्चा नहीं करते | वे उस दिन बिलकुल आम नगरिक की तरह जीते हैं, सभी से मिलते जुलते हैं और दिन भर वृक्षारोपण व साफ़-सफाई आदि के कार्यो में व्यस्त रहते हैं |

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तो मुझपर कटाक्ष करने से पहले अपने गिरेबान में झाँके, अपने हिंदुत्व के ठेकेदारों के सीने में झाँककर देखें | सिवाय ढोंग और पाखंड के कुछ नजर नहीं आयेगा | यहाँ लोग संन्यासियों को नहीं सिखाते कि उसे कैसा होना चाहिए, बल्कि उन्हें उनकी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ समग्रता से स्वीकार करते हैं | जबकि आप लोग अपना अपना फ्रेम लेकर घूमते हैं कि संन्यासियों को कैसा होना चाहिए | लेकिन स्वयं को कैसा होना चाहिए, समाज को कैसा होना चाहिए, आपका गाँव, आपका मोहल्ला कैसा होना चाहिए, उसकी कोई चिंता नहीं |

~विशुद्ध चैतन्य

Thailand

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