किताबी धार्मिकों का समाज आज भी मानसिक रूप से उन्नत नहीं हो पाया

यदि आप ध्यान दें, तो मानव समाज में बहुत ही कम लोग होते हैं जो मानसिक रूप से व्यस्क हो पाते हैं | अधिकांश केवल नौ दस वर्ष की आयु तक ही विकसित होते हैं और उसके बाद ठहर जाते हैं |

इस आयु के बच्चों को परीकथाएँ, रहस्यकथाएं, फेंटम, बेताल की कहानियाँ बहुत लुभाती हैं | गुड्डे-गुड़ियों से खेलने में बड़ा सुख मिलता है…और इन सब से गुजर कर ही हम युवा होते हैं, फिर व्यस्क होते हैं |

लेकिन जो लोग मानसिक रूप से व्यस्क नहीं हो पाते, तब वे मात्र श्रोता बनकर रह जाते हैं | उन्हें धार्मिक ग्रंथों की गप्पें रास आती हैं…उन्हें सुनना पसंद आता है, कि हनुमान ने सूरज को निगल लिया या पैगम्बर ने चाँद के दो टुकड़े कर दिए….और ये सब मासूम बच्चों की तरह उन कहानियों को सच मानकर भावुक हो जाते हैं |

इनमें से कुछ गुड्डे गुड़ियों के खेल से मुक्त नहीं हो पाते, तो देवी देवताओं की प्रतिमाओं को सजाने संवारने, खिलाने पिलाने में लग जाते हैं | कुछ तो इन प्रतिमाओं के इलाज के लिए डॉक्टर भी बुलाते हैं, चेकअप करवाते हैं |

रही ओशो को सुनने की बात, तो इनमें भी केवल एक प्रतिशत ही होते हैं जिन्हें ओशो की बातें समझ में आती हैं | बाकी तो सेक्स से समाधी के चक्कर में ओशो धाम घूम रहे होते हैं | उनकी रूचि केवल सेक्स में होती है और यह मानकर ओशो भक्त बनते हैं कि शायद कोई फिरंगन मिल जाए और स्वर्ग में होने के अनुभव प्राप्त हो जाए |

बाकी रामदेव जैसों के चक्कर लगाने वाले मुझे तो अधिकाँश बीमार ही मिले | इनके लिए योग भी एक फैशन मात्र है |

जैसे तुतलाना बच्चों में अच्छा लगता है, घुटनों के बल चलना बच्चों में अच्छा लगता है….लेकिन यदि बड़े होने पर भी यह व्यवहार नहीं छूटा, तो इसे बिमारी मान लिया जाता है | ठीक इसी प्रकार गुड्डे गुड़ियों के से खेलने का शौक हो या गप्प कथाएं सुनने का शौक, वह यदि बड़े होने पर भी लक्षित हो, तो वह बिमारी है | फिर चाहे आप देवी देवताओं की प्रतिमाओं को सजायें संवारें या फिर कब्रों और दरगाहों को | आप मानसिक रूप से विक्षिप्त ही हैं यदि मूल भाव आपकी समझ में नहीं आया |

मानसिक रूप से विक्षिप्त होते हैं धर्म, जाति व राजनीति के नेता व ठेकेदार

जाति आधारित आरक्षण भी मानसिक रूप से विक्षिप्तों की ही खोज है और उसे लागू रखना भी मानसिक रुग्णता है | यह इस बात का प्रमाण है कि आपकी धार्मिकता भेदभाव से मुक्त नहीं है | यह इस बात का प्रमाण है कि आपके धर्मग्रन्थ, आपके कर्मकाण्ड, आपकी परम्परा और मान्यताएं आज भी हजारों वर्ष पहले की स्थिति से उठ नहीं पायी |

भले ही आप कितने ही आधुनिक हो गये हों, भले ही आप कितने ही आधुनिक उपकरण प्रयोग कर रहे हों, लेकिन आपकी धार्मिकता आज भी बाल्यावस्था में ही है, आज भी वह विकृति से मुक्त नहीं हो पायी….अर्थात आपकी धार्मिकता उन्नत व आधुनिक नहीं हो पायी | क्योंकि मानसिक रूप से आप और आपका धार्मिक समाज उन्नत नहीं हो पाया | यदि उन्नत हो गया होता, तो आज जातिगत आरक्षण का नामों निशाँ मिट चुका होता |

और चूँकि धार्मिक समाज, तथाकथित सभ्य समाज जातिगत भेदभाव से मुक्त नहीं हो पाया, इसी लिए जातिगत आरक्षण को ढोना भी उनकी विवशता है | और परिणाम कुछ इस तरह से सामने आते हैं…..

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धर्म और जाति के आधार पर जो भेदभाव हैं, उन्हें दूर करने में धर्म गुरु और धार्मिक ग्रन्थ पुर्णतः असफल हो चुके हैं | असफल तो वे भी हो चुके हैं, जिन्होंने नए सम्प्रदायों की नींव रखीं | क्योंकि समाज तो अपनी मूल प्रवृति से मुक्त नहीं हो पाया और जब तक समाज भेदभाव से मुक्त नहीं जाता मानसिक रूप से, तब तक कोई भी पैगम्बर, अवतार, नबी, मेसेंजर आये इस दुनिया में, वे समाज को सही राह नहीं दिखा पाएंगे | समाज उनके दिखाए मार्ग को भी अपनी ही सुविधानुसार मॉडिफाई कर लेगा |

~विशुद्ध चैतन्य

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