पर्दे को रहने दो पर्दा न उठाओ….

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प्राचीन काल में पर्दा-प्रथा नही थी भारत में | लेकिन विदेशियों के आगमन, स्त्रियों के हरण व कुत्सित मानसिकता के उत्थान के साथ पर्दा प्रथा आस्तित्व में आ गया | फिर कई जागृत आत्माओं के योगदान व बलिदानों के बाद पर्दा प्रथा से भारत को मुक्ति मिली |

मैं मानता हूँ कि पर्दे का अपना महत्व है, जैसे घरों में पर्दों का होना न केवल सुन्दरता बढ़ाता है, बल्कि अवांछनीय ताक-झाँक से भी बचाता है | विवाह मंडप में भी यदि दुल्हन घुंघट में हो तो वह न केवल सुंदर लगता है, बल्कि दुल्हन को विशिष्टता भी प्रदान करता है | यह और बात है कि आज के आधुनिक दौर में नग्नता को आधुनिकता की उपाधि मिल चुकी है, इसलिए भविष्य में दुल्हनें बिकनी में विवाह मंडप पर नजर आयें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | आखिर स्त्रियों को भी जिस्म दिखाने का उतना ही अधिकार है, जितना कि मर्दों को |


तो मैं बात कर रहा था था पर्दा प्रथा की | ऐसा नहीं है कि पर्दा केवल स्त्रियों, दरवाजों और खिड़कियों को ही आकर्षक बनाते हैं, पर्दे काली कमाई, भ्रष्टाचार को भी ईर्ष्या करने वालों की काली नजर से बचाते हैं | और जो किसी प्रतिष्ठित विभाग, समाज या संगठन के काले कारनामों को बेपर्दा करने का प्रयत्न करता है, वह मानसिक रूप से स्वस्थ तो ही नहीं सकता | वह बेहया, बेशर्म, अनुशासनहीनता से ग्रस्त व्यक्ति ही हो सकता है जैसे कि तेजबहादुर |

अब सेना कभी गलत तो कर नहीं सकती और जो भी गलत होता है वह पर्दे के भीतर ही होता है | फिर ऐसे में कोई सेना का अनुशासन तोड़कर उनको बेपर्दा कर दे तो वह सच्चा सैनिक तो हो ही नहीं सकता | फिर चाहे उसे सोलह अवार्डस और गोल्ड मेडल ही क्यों न प्राप्त हुए हों २० वर्ष की सेवा काल में | सेना में भी एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब पर्दा प्रथा इतिहास हो जाएगा और आधुनिकता के रंगों में रंगा नंगापन सामने आ जाएगा | तब खुल कर राजनैतिक पार्टियों की तरह कह सकेंगे कि हम जितनी चाहे घोटाले करें, जितने चाहे बेईमानी करें, जितने चाहे काली कमाई करें किसी को अधिकार नहीं हमसे प्रश्न करने का | क्योंकि हम श्रेष्ठ हैं, देश की आन-बान-शान हैं |

तेज बहादुर के फेसबुक प्रोफाइल में मुस्लिमों के विरुद्ध नफरत दीखता है, इसलिए वह संघी मानसिकता का है | मुस्लिमों को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि उसने जो मुद्दा उठाया वह महत्वपूर्ण है या नहीं, उनके लिए तेजबहादुर संघी है | संघियों, हिंदुत्व के ठेकेदारों, सेना आदि को उसके मुस्लिम विरोधी पोस्ट से कोई आपात्ति नहीं थी, आपत्ति है तो यह कि उसने मटर की सब्जी न दिखाकर दाल का पानी और जली हुई रोटियों क्यों दिखाई | यदि उसने मटर की सब्जी दिखाई होती तो वह देशभक्त कहलाता, लेकिन उसने दाल का पानी दिखा दिया इसलिए वह देशद्रोही, मानसिक रोगी, अनुशासनहीन हो गया |

बहुमत कहता है कि सेना में अच्छा भोजन मिलता है और लोकतंत्र में बहुमत को सत्य से भी अधिक महत्व दिया जाता है | बहुमत यदि गलत के पक्ष में हो, तब सत्य को पराजित घोषित करने में कोई संकोच नहीं | फिर अदालत है, कानून है…. चाहे पैसे देकर खरीद लो इनको और गलत के पक्ष में कर दो… इनकी वाणी ईश्वरीय वाणी के  समतुल्य ही मानी जायेगी |

सेना के अधिकारी इस बात से परेशान नहीं हैं कि कुछ गलत हो रहा था, वह सामने आया और उस गलत को स्वीकार कर उसे दूर करने का प्रयास करें, अपितु इस बात से परेशान हैं कि जो बात आज तक परदे में थी, वह बेपर्दा कैसे हो गयी ? शायद कैमरा फोन की वजह से | जल्दी ही सेना में कैमरा और समार्ट फोन रखना अनुशासनहीनता की श्रेणी में शामिल हो जाएगा शायद | क्योंकि ऐसे फोन रखने वालों में कई ऐसे भी होते हैं जो पर्दे के महत्व को नहीं समझते |

सारांश यह कि किसी संगठन, किसी पार्टी, किसी विभाग, किसी समाज या किसी सम्प्रदाय को इतना महान मत बना दो, कि गलत देखने की योग्यता ही खो बैठें | हर समाज, विभाग, पार्टी, संगठन, राज्य, देश में अच्छा और बुरा दोनों ही घटता है, अच्छे बुरे दोनों ही मनोवृति के लोग होते हैं | समझदारी इसी में है कि जो गलत को सामने लाये उसे सम्मानित करके गलत करने वाले को सजा दी जाये, ताकि समाज में एक अच्छा सन्देश जाए कि हम अपने समाज, विभाग, पार्टी, संगठन, राज्य, देश में भ्रष्टाचार, शोषण आदि को सहन नहीं करते और ऐसा करने वालों को सामने लाने वालों का हम सम्मान करते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य


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अभी बीएसएफ के जवान तेज बहादुर का खाने से संबंधित वीडियो वायरल होने का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि रोहतक में जहां एक वायुसेना के पूर्व जवान का वीडियो वायरल हो गया है वहीं मथुरा में सीआरपीएफ के जवान ने भी वीडियो के जरिए अपनी पीड़ा बयां की है।

वायरल वीडियो में वायुसेना के पूर्व जवान ने वायुसेना के उच्च अधिकारियों पर आरोप लगाया कि 14 हजार रुपये नहीं देने पर उसके ऊपर कई चार्ज लगाकर नौकरी से निकाल दिया गया। परेशान होकर जवान ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मौत की गुहार लगाई है ताकि जलालत भरी जिंदगी से उसे छुटकारा मिल जाए।

वहीं मथुरा जनपद के गांव सहजुआ थोक सौंख निवासी जीत सिंह ने भी बीएसएफ जवान तेज बहादुर की भांति प्रधानमंत्री से गुहार लगाते हुए कहा है कि सीआरपीएफ के जवान चुनाव, वीआईपी, वीवीआईपी, संसद सहित विषम स्थितियों वाले राज्यों में तैनात हैं।

इसके बावजूद न वेलफेयर मिलता है न समय से छुट्टियां। आर्मी में पेंशन है, हमारी पेंशन थी वो भी बंद हो गई। 20 साल बाद नौकरी छोड़कर जाएंगे तो क्या करेंगे। हमें एक्स सर्विसमैन की सुविधा नहीं, केंटीन की सुविधा नहीं, मेडिकल की सुविधा नहीं, जबकि ड्यूटी हमारी सबसे ज्यादा है। हमें भी इसकी सुविधाएं मिलनी चाहिए।

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