कामना ऐश्वर्य की और नाम ईश्वर का

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भक्ति दौलत की

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी, लोभ की मुट्ठी
सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे खतरनाक वो आँखें होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन कि भाप पर ढुलक जाती है
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके ज़िस्म के पूरब में चुभ जाए

-पाश

ईश्वर या ऐश्वर्य

 यह एक खबर सामने आयी और इसके साथ ही कुछ और ख़बरें सामने आयीं जैसे;

ये सभी सामान्य ख़बरें हैं और सामान्यतः प्रतिदिन ऐसी ही कोई खबर छपती ही रहती हैं | कोई नयी बात तो है नहीं बल्कि यह सब सामान्य सामाजिक ढाँचे की सामान्य घटनाएं ही हैं | हम सभी इन खबरों के आदि हो चुके हैं और कोई हलचल नहीं होतीं हमारे मस्तिष्क या दिलों में | रिश्वत लेना या देना सामान्य सामाजिक व्यवहार के अंतर्गत ही आता है बस गिरफ्तार वही होते हैं जो अपनी ऊपरी कमाई का बड़ा हिस्सा ऊपर तक नहीं पहुँचाते या पिछला कमीशन नहीं भिजवाया समय पर | बाकि लेन देन स्वाभाविक व नियमित रूप से चलता ही रहता है |

यदि ऊपरी कमाई न होती तो शायद इतना क्रेज भी नहीं होता आईएएस या आईपीएस बनने का और न ही यह पढ़ाई इतनी महँगी व ग्लैमरस होती | जहाँ भी धन, वैभव, ऐश्वर्य व स्वर्गमय भोग-विलास जुड़ा हो, जहाँ भी सुर, सुरा और सुंदरियाँ उपलब्ध हो सकतीं हैं सहजता से, वह आकर्षक बन जाता है, वह ग्लैमरस बन जाता है | सारी दौड़ ही धन, वैभव व ऐश्वर्य के लिए है और सभी की दौड़ इन्हीं स्वर्गमय सुख की प्राप्ति के लिए ही है |

साधू और ऐश्वर्य

आप इस बात को लेकर असमंजस में होंगे कि मैंने ऊपर दो खबरें दिखाई, एक पादरियों वाली और एक नागा साधुओं वाली, लेकिन लिखा सबकुछ रिश्वत और भोग-विलास पर | जबकि पादरियों, ननो, साधू-संन्यासियों का भोग विलास रिश्वतखोरी से क्या लेना देना ?

बिलकुल लेना देना है | यहाँ मैं वही बताने जा रहा हूँ कि ये सब माया का ही खेल है, फिर ये नागा साधू हों या फिर सरकारी रिश्वतखोर अधिकारी, मंत्री या नेता या जमीन पर रेंगते तथाकथित भगवान् | सभी की पहली दौड़ भोग-विलास, धन, ऐश्वर्य की ही होती है, फिर वह चाहे तपस्या करने हिमालय पर जाये या फाइव स्टार होटलों या फार्म हाउस में | फिर चाहे वह बियाबान जंगलों में जाए या फिर गाँवों देहातों में | और यह सभी पर लागू है, मुझपर भी | मैं भी कोई अपवाद नहीं हूँ, मैं भी कोई दुःख भोगने के लिए संन्यासी नहीं बना था, सुख की ही कामना थी भीतर | वस्तुतः कोई भी दुःख भोगने के लिए कुछ भी नहीं करता, सभी जो कुछ भी करते हैं, जितने भी कष्ट उठाते हैं, वह सब सुख भोगने के लिए ही करते हैं |

कंजूस से कंजूस व्यक्ति भी एक एक दमड़ी तिजोरी में जमा करता जाता है, खुद को भूखा व दरिद्र बनाकर, अपनी इलाज तक पर खर्च नहीं करता, न ही किसी की सहायता के लिए कोई खर्च करता है….तो केवल इसीलिए कि किसी दिन वह इस धन से सुख भोगेगा….लेकिन वह दिन उसके जीवन में कभी नहीं आता, चाहे उसकी तिजोरी में अरबों का खजाना जमाना हो जाए |

यह और बात है कि जो भोग-विलास से उकता जाता है, वह बियाबान और जंगलों की तरफ भागता है, वह एकान्त खोजता है, वह भीड़-भाड़, शोर-शराबे से दूर भागता है | यह एक सामान्य प्रक्रिया है, सामान्य व्यव्हार और भाव है | जो भूखा है, वह भोजन की तरफ ही भागेगा, जो प्यासा है वह जल की तरफ ही भागेगा | लेकिन जिसका पेट भर गया या जो शाही भोजन से ही उकता गया, वह फूटपाथ की रेहड़ियों के प्रति आसक्त होगा, उसे सड़क किनारे लगे चाट-पकौड़े, छोले-कुलचे, भठूरे, आमलेट, चाय आदि आकर्षित करेंगे | सारांश यह कि एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव की ओर गति करना मानव का मूल स्वभाव है |

अब तक के जीवन में साधू-संतों से हुई भेंटों व चर्चाओं से मैं यह स्पष्ट समझ चुका हूँ कि साधू समाज के साधू-संन्यासी और बाकी सभी समाज जैसे आर्य समाज, अग्रवाल समाज, बाल्मीकि समाज, हिन्दू समाज, मुस्लिम समाज, ईसाई समाज, सिख, वैश्य, बहुजन व अन्य समाजों के सांसारिकों, गृहस्थों में कोई अंतर नहीं है | सभी समाज ही है और सभी उन्हीं सांसारिक मोह माया में ही उलझे हुए हैं, जिनसे भागने का ढोंग करते हैं साधू संन्यासी, त्यागी, बैरागी |

ये त्याग बैराग भी एक प्रकार की आसक्ति ही है और आधार है भोग-विलास | साधू-संन्यासियों को अक्सर कहते सुनता हूँ कि हमें धन, दौलत, शोहरत से क्या लेना देना, हमें तो बस ईश्वर की शरण में रहना है | लेकिन भीतर कामना होती है ऐश्वर्य के शरण में रहने की | इसीलिए नेताओं की चाटुकारिता करते हैं, इसीलिए अपराधियों की संगत करते हैं, इसीलिए धनपतियों के पीछे भागते हैं |

आपने ऐसी भी घटनाएँ सुनी होंगी कि साधू-समाज के दो गुटों में गोलियाँ चलीं, कई घायल हुए केवल इसलिए कि दोनों में यह विवाद था कि अध्यक्ष किस गुट का साधू बनेगा | साधू समाज में भी धन व सत्ता की होड़ रहती है, श्रेष्ठता की होड़ रहती है, अपने अपने वैभव, शक्ति प्रदर्शन की होड़ रहती है |

एक दिन एक आश्रम के संस्थापक ने मुझसे पुछा कि तुमने अब तक कितना कमाया ?

मेरा उत्तर था कि कुछ भी नहीं, जहाँ था वहीँ हूँ | तब भी गरीब था और अब भी, तब भी बेंक बेलेंस निल रहता था और अब भी | जो भी मिलता है वह खर्च कर देता हूँ और खाली हाथ ही रहता हूँ |

उन्होंने कहा कि यदि मेरे पास रहते तो कम से कम पाँच छः लाख कमा रहे होते आराम से | पहली बार जब हम मिले थे, तब मेरा जो शिविर लगता था, वह दस लाख के बजट का होता था और आज जो शिविर लगाता हूँ, वह सत्तर लाख से उपर के बजट का होता है | इसे कहते हैं प्रगति करना…..तुमने अपना जीवन व्यर्थ कर लिया |

मैं अपने ही आश्रम में आने वाले साधू संन्यासियों को देखता हूँ कि वे इस भ्रम में रहते हैं कि मैं कोई बहुत ही अमीर संन्यासी हूँ | कई लोग जो मेरे फेसबुक प्रोफाइल से जुड़े हैं वे इस भ्रम में रहते हैं कि इतने बड़े बड़े लोग जुड़े हैं तो बहुत ही अच्छी प्रणामी भी मिलती होगी लेकिन यह कंजूस है जो सारे पैसे बैंक में दबाये बैठा है और हमारी खातिरदारी में फूटी कौड़ी नहीं खर्च करता |

तो इन सब बातों से यह प्रमाणित हो जाता है कि साधू-संत भी चन्द रुपयों के पीछे ही दौड़ रहे हैं, उनकी आसक्ति रुपयों में ही है | वे किसी संन्यासी या साधू को उसके ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़े वैभव से महत्व देते हैं | मुझसे कभी भी कोई ज्ञान, आध्यात्म सम्बन्धी चर्चा करने नहीं आया नहीं | जब भी कोई आया तो व्यक्तिगत हितों व स्वार्थवश आया या फिर इस भ्रम में आया कि मेरे माध्यम से वह मुझसे जुड़े अमीरों तक पहुँच बना पाए और अपने आश्रम के लिए अधिक से अधिक धन की व्यवस्था कर पाए | कई बार लोग कहते हैं कि उनके अपने आश्रम के विषय में कुछ लिखकर फेसबुक पर पोस्ट करूँ ताकि मुझसे जुड़े अमीर लोगों तक उनके आश्रम कि पहुँच बन सके |

सारांश यह कि सारा खेल ही धन दौलत का है | ईश्वर की खोज किसी को नहीं, सभी ऐश्वर्य के ही पीछे दौड़ रहे हैं | वास्तव में यही सत्य भी है कि ऐश्वर्य ही ईश्वर है | सुख ही ईश्वर है और सारी दुनिया सुख के ही पीछे दौड़ रही है | इस दौड़ में वे पिछड़ जाते हैं जो व्यक्तिगत हितों को महत्व नहीं देते और दूसरों की चिंता में दुबले हुए चले जाते हैं |

यदि आपके पास धन नहीं भी है, लेकिन धनपतियों की भीड़ आपके पीछे खड़ी है, तब भी आप सम्मानीय और पूजनीय हो जाते हैं | अर्थात किसी की रूचि आपमें नहीं, आपके साथ जुड़े धन व ऐश्वर्य में है |

यदि साधू-संत वास्तव में समाज के हितों को महत्व दे रहे होते, धन के पीछे न भाग रहे होते, तो आज यह देश सबसे समृद्ध देश होता | इस देश में कोई दुखी व शोषित न होता | क्योंकि साधू या संन्यासी राजा का चाटुकार नहीं होता, वह सदा अत्याचार व शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है, सदा निर्बलों की रक्षा के लिए खड़ा रहता है | लेकिन आज वास्तविक न तो साधू-संत रह गये, न ही धार्मिक व सात्विक लोग रह गये, न ही समाज सेवक ही समाज के सेवक बन पाए, ना ही राजकीय अधिकारी व मंत्री ही नागरिकों के हितैषी रह गये……हर क्षेत्र, हर समाज में केवल ढोंग और पाखंड का ही बोल बाला है | ढोंगियों और पाखंडियों की ही जय जयकार और स्वार्थियों से भरा यह मानव समाज है |

हर कोई निःस्वार्थ होने को महत्व देता है लेकिन स्वयं स्वार्थ से मुक्त नहीं हो पाता | हर कोई परोपकार करने का प्रवचन देता फिर रहा है, लेकिन स्वयं परोपकारी नहीं बन पा रहा | मैं भी अपवाद नहीं हूँ….यदि गृहस्थ समाज से लेकर त्यागी, बैरागियों, साधू-संन्यासियों का समाज तक स्वार्थ में आकण्ठ डूबा हुआ है, तो भला मैं निःस्वार्थी कैसे रह सकता हूँ | बस मेरा स्वार्थ बाकी सामाजिक, धार्मिक व सात्विक सभ्य लोगों के समाज से भिन्न है | मेरा स्वार्थ है भूमाफियाओं, भ्रष्टाचारियों से समाज मुक्त हो और हर कोई समृद्ध, सुखी व सम्पन्न हो | फिर चाहे वह आम नागरिक हो, या फिर साधू-संत | सभी को सुख समृद्धि व वैभव भोगने का मौलिक ईश्वर प्रदत्त अधिकार है |

लेकिन यह त्याग, बैराग का ढोंग कर रहे साधू-संन्यासियों का ढोंग बंद होना चाहिए | इन्हें निडरता से स्वीकारना चाहिए कि वे ईश्वर की खोज पर नहीं, बल्कि ऐश्वर्य की खोज में निकले हैं | आज इंजिनियर और डॉक्टर की डिग्री लेकर भी लोग साधू-संन्यासी बन रहे हैं, तो उसका भी एक प्रमुख कारण है |

धूर्तों, मक्कारों के अधीन नहीं रहना चाहता कोई

हम सभी जानते हैं कि आईएएस हों या आईपीएस, सभी धूर्तों मक्कारों के अधीनस्थ हैं | जनता अपराधियों को सत्ता सौंपती है और फिर पुलिस व सीबीआई से यह अपेक्षा रखती है कि वे इनसे उनकी सुरक्षा करें | यह कैसे संभव है ?

आपने सरकार ही चुनी बेईमानों, धूर्तों, मक्कारों, घोटालेबाजों की, आपने सारी ताकत ही उन्हें सौंप दी, तो फिर ये बेचारे भला क्या कर सकते हैं ?

बहुचर्चित शारदा चिटफंड काण्ड को ही लीजिये | मुख्य आरोपी मुकुल राय भाजपा में शामिल हो गया, अब उसकी तरफ न तो पुलिस देख सकती है और ना ही सीबीआई….ऐसे ही कितने अपराधी हैं जो आज सत्ता पक्ष से अभयदान प्राप्त करके बैठे हुए हैं….लेकिन जो सत्ता पक्ष के साथ नहीं, उसके विरुध्द पुलिस और सीबीआई मारी-मारी फिर रही है |

क्या इसे आप न्याय कहेंगे ?

ऐसी परिस्थिति में कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति नहीं चाहेगा कि वह धूर्त नेताओं का पालतू कुत्ता बनकर जीये |

दूसरा कारण है पढ़े लिखों का साधू-संन्यासी बनने का और वह यह कि नौकरियों का आभाव | नौकरियाँ मिल नहीं रहीं, तो बेरोजगार भटकने से बेहतर हैं साधू-संन्यासी बन जाया जाये | फिर आजकल साधू-संन्यासी होना भी एक प्रोफेशन बन चुका है कोई अध्यात्मिक उत्थान का मार्ग नहीं |

कोई साधू-संन्यासी नहीं मिलेगा आपको आध्यात्मिक रूप से उन्नत हुआ, सभी लम्पट ही मिलेंगे | जो वास्तविक साधू-संन्यासी होंगे, उन्हें कोई पूछने भी नहीं जाने वाला | क्योंकि उसकी कडवी बातें हजम करना कोई आसान काम नहीं है | आप उसे चन्द रुपयों की रिश्वत देकर स्वर्ग का टिकट नहीं अरक्षित करवा सकते और न ही लड़की सेट करवा सकते हैं और ना ही सरकारी नौकरी पा सकते हैं | वह अपनी शक्तियों का प्रयोग इन फालतू कामों में नहीं करेगा |

वास्तविक साधू संन्यासी आपसे केवल यही कहेगा कि स्वयं की शक्तियों को जानो, स्वयं को पहचानों | उसकी रूचि यदि आपमें हुई तो केवल आपके भीतर छुपी शक्तियों से ही आपका परिचय करवाएगा….लेकिन वह भी सौदेबाजी से नहीं, आपकी सेवा से प्रसन्न होकर |

सेवा और व्यापार में अंतर होता है

बचपन से हर चीज में सौदेबाजी करते और देखते हम सेवा का भाव भी भूल चुके हैं | अब स्थिति यह हो गयी कि बिना स्वार्थ के सेवा कैसे की जाती है, यही भूल चुके हैं लोग | अब कोई पानी भी पिलाता है तो यह अपेक्षा रखता है कि बदले में कुछ न कुछ अवश्य मिले, धन्यवाद् ही कह दे कोई |

कई हज़ार वर्ष पहले विश्वप्रसिद्ध चौकीदार चायवाला ने कहा था, “मेरे खून में ही व्यापार है….!”

यदि हम ध्यान से देखें तो ऐसा एक भी व्यक्ति इस संसार में नहीं है, जिसके खून में व्यापार न हो | हर कोई व्यपारी ही है | हर कोई जो कुछ भी कर रहा है, बदले में कुछ न कुछ पाने के लिए कर रहा | तो सेवा करने वाले भी कुछ न कुछ पाने के लिए ही सेवा करते हैं |

हाँ मैं अवश्य ही अपवाद हूँ…क्योंकि मैं कोई सेवा नहीं करता और किसी की सेवा नहीं करता | क्योंकि मुझे किसी से कुछ नहीं पाना….मैं व्यापारी नहीं हूँ जो कुछ पाने के लिए किसी की सेवा करूँ | मैं सेवक और सेवा को बहुत महत्व देता हूँ और इसे व्यापार नहीं बनाना चाहता | कोई मेरी सेवा करता है तो यह उसकी इच्छा, बदले में मुझसे कोई अपेक्षा न रखे | इसी प्रकार मैं किसी की सेवा या सहायता करूँगा तो कोई अपेक्षा नहीं रखूँगा |

लेकिन जब आप आप सेवा करने पहुँचते हैं दुनिया भर की कामनाएँ लिए, तब आपकी सेवा व्यर्थ हो जाती है | क्योंकि आप सेवा नहीं व्यापार कर रहे होते हैं और व्यापार का नियम है और वह यह कि हर कार्य या वस्तु कि कीमत पूर्व निर्धारित रहती है | खैर…जाने दीजिये….हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ हर कोई व्यापारी है | तो फिर ऐसे समाज में मेरी यह बातें समझ के परे हो जायेंगी आप सभी के लिए | इसीलिए इस पर अपना दिमाग खर्च न करें….बिना स्वार्थ के सेवा करना आज असंभव हो | यह बिलकुल वैसी ही बात हो जाएगी जैसे ईश्वर या भुत-प्रेत को देखना या दिखाना |

सदैव स्मरण रखें:

सुख की कामना करना, सुख पाने का प्रयास करना, सुखी रहना, धनी होना, ऐश्वर्यवान होना कोई पाप या अपराध नहीं है | फिर सुख की कामना चाहे गृहस्थ करे या त्यागी, बैरागी साधू संत | यह उतना ही पुण्य है, उतना ही सात्विक है, उतना ही धार्मिक है, जितना कि स्वर्ग, जन्नत, हूरों और अप्सराओं की कामना करना और वह सब पाने के लिए दुनिया भर के पूजा पाठ, रोजा, नमाज, व्रत उपवास, कर्मकाण्ड करना |

यह तो और बात है कि सुख की परिभाषाएं सभी की अपनी अपनी है | भूखे को सुख मिलेगा भोजन से, प्यासे को सुख मिलेगा जल से, सेवक को सुख मिलेगा सेवा से, दानी को सुख मिलेगा दान से | लेकिन सुख पाने के लिए किसी पर अत्याचार करना, किसी को कष्ट पहुँचाना, किसी का घर परिवार उजाड़ देना…..निःसंदेह पाप है, अपराध है |

~विशुद्ध चैतन्य

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विवेक कुमार
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विवेक कुमार

बहुत अच्छा लेख।