क्या देकर जाना चाहते हैं आप, अपनी आने वाली पीढ़ी को ?

आज हर तरफ हम अराजकता, हिंसा, शोषण और लूट-पाट देख रहे हैं और दुखी होकर कहते हैं कि कलयुग है भाई !

कलयुग अर्थात मशीनों का युग | ऐसा युग जिसमें मानवता का साम्राज्य नहीं, मशीनों का साम्राज्य रहेगा | ऐसी मशीनें जो स्वचालित होंगीं लेकिन उनमें विवेक नहीं होगा | वे प्रोग्राम्ड होंगे और कुछ व्यापारियों के हाथों की कठपुतली होंगे | वे न दुःख का अनुभव करेंगे और न ही सुख का, केवल आज्ञा का पालन करेंगे | उन्हें जो दिखाया जाएगा वही देखेंगे और जो सुनाया जाएगा वही सुनेंगे |

और यह कलयुग ही है | अब हमें अपने चारों ओर चेहरे दिखाई देते हैं लेकिन यदि ध्यान से देखें तो वे मशीन हैं | पैसे कमाने की मशीन ! पैदा होते हैं पैसे कमाने के लिए और मरते दम तक पैसे कमाते हैं | मरने के बाद उनके रियुज़ेबल पार्ट्स को बेचकर फिर लोग पैसे कमाते हैं | कहने को तो सभी जीवों की रचना ईश्वर ने की है, लेकिन अब इनपर अधिकार कुछ व्यापारियों ने कर लिया | अब ये प्राणी केवल गुलाम हैं जिनको केवल इतना ही पता है कि जब तक जीवित हैं, गुलामी करनी है | जो नेताओं और पूंजीपतियों के पिट्ठू कहेंगे, वही सही है क्योंकि उनके पास ताकत है | और जिनके पास ताकत होती है वे ही सही होते हैं बाकी सभी गलत |

क्रिकेट खेलने वाले अमीर होते हैं, खिलाने वाले अमीर होते हैं लेकिन लाभ देश को कुछ नहीं होता | फिर भी लोग इसके दीवाने हैं क्योंकि अपने पास विवेक नहीं है, और दूसरों के विवेक से चिंतन करते हैं |

मीडिया कहती है फलां क्रीम लगाने से गोरे हो जाओगे तो लगा रहे, फिर चाहे गोरे हों या न हों | क्योंकि अपना विवेक नही प्रयोग करते |

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किसी किसान ने आत्महत्या कर ली वह महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि नेताओं और व्यापारियों के लिए वह महत्वपूर्ण नहीं है |

जरा सोचिये…. चिंतन कीजिये अपनी दिनचर्या पर और फिर अपने उस विवेक का प्रयोग करने का प्रयास कीजिये, जिसे बचपन में ही आपसे छीन लिया गया था शिक्षा के नाम पर | एक बार बचपन में लौटिये और याद कीजिये कि आपने कभी गलत का विरोध किया लेकिन समाज ने आपकी आवाज दबा दी | आपने विरोध किया था शोषण व अन्याय के विरुद्ध लेकिन समाज ने कहा कि कलयुग है… सब जायज है | तब आप कमजोर थी, बच्चे थे… लेकिन क्या आज भी आप कमजोर हैं, बच्चे ही हैं जो स्वयं निर्णय लेने में अक्षम हैं ? क्या आप यही मानकर चल रहे हैं कि दुनिया में आप केवल पैसा कमाने और कंक्रीट के जंगल में अपने लिए एक दड़बा खरीदने के लिए आये हैं ? क्या आप आज भी मानते हैं कि भेड़ों की झुण्ड चूँकि बहुत बड़ी है, इसलिए वे सही हैं और हम चूँकि संख्या में बहुत ही कम हैं इसलिए हम गलत हैं ?

तो एक बार सुकरात पर नजर डालिए.. जब सारा विश्व मानता था कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है, तब उसने मानने से इनकार कर दिया और जो कुछ उनके साथ हुआ वह आपको पता ही है | लेकिन बाद में पूरी दुनिया को मानना पड़ा कि सुकरात सही था | ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे आपको जिसमें भीड़ से अलग किसी ने राय रखी और बाद में वह सही सिद्ध हुई | एक बार अपने भीतर झाँक कर देखिये और आप पायेंगे कि आज जो उपद्रव मचा हुआ है, वह आपकी अपनी ही कायरता के कारण है, कोई और दोषी नहीं है | यदि आप कायर हैं, तो चूहा भी आपको भयभीत कर सकता है फिर यहाँ तो भेड़ों की भीड़ की ताकत पर लोग आपको भयभीत कर रहे हैं | आप यह मानकर चल रहे हैं कि भीड़ के साथ चलेंगे तो सुखी रहेंगे, लेकिन क्या आपके बाद आने वाली पीढ़ी सुखी रहेगी ? क्या देकर जाना चाहते हैं आप अपनी आने वाली पीढ़ी ?

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मैंने अपना सौभाग्य कहूँ या दुर्भाग्य कि मैं मशीन नहीं बन पाया | बचपन से लेकर आज तक मैं समझौता नहीं कर पाया और परिणाम स्वरुप समाज में मेरे लिए जगह नहीं बन पायी क्योंकि भेड़ों के समाज में मेरा दम घुटने लगा था | मुझे लगा कि मैं गलत युग में आ गया, लेकिन फिर समझ में आया कि मेरी ही तरह कुछ और लोग भी होंगे जो गलती से इस युग में आ गये मानव बनने के लिए | जबकि यह तो मशीनों का युग है, यहाँ मशीन बनकर ही जीना होगा वरना मानवों के लिए तो यह युग है ही नहीं | तो मुझे ऐसे लोगों तक सन्देश पहुँचाना है कि मानव अल्पसंख्यक ही सही, लुप्तप्राय ही सही, मरना तो है ही तो क्यों न इन मशीनी मानवों को वास्तविक मानव बनाने के लिए थोड़ा प्रयास कर लिया जाए | जानता हूँ कि मशीन हैं ये सभी, हमारी बातें नहीं समझेंगे लेकिन प्रयास करने में कोई हानि नहीं है | आत्महत्या करने से तो अच्छा ही है कि सार्थक प्रयास करते हुए मारे जाएँ | ~विशुद्ध चैतन्य

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