बहुमत जिसे मिला हो, वह सही ही होगा इस बात की कोई गारन्टी नहीं है

माना जाता है कि बहुमत जिसके पास हो, वही विजेता है | लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि बहुमत सत्यता का मानक कभी नहीं बन सकता और न ही कभी ऐसा हो सकता है कि सभी एकमत हो सकें | कुछ रिश्वतखोरी, घोटाले, भ्रष्टाचार के पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में, कुछ अधर्म के पक्ष में होंगे तो कुछ विपक्ष में….और यही देखा गया है कि अधर्म, असत्य व अपराध के पक्ष में ही अधिक लोग रहे हैं हमेशा |

मेरी समझ में कुछ वर्षों पहले तक यह नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों होता है | जबकि अधिकांश लोग खुद को धार्मिक कहते हैं, अधिकांश लोग खुद को ईश्वर पर आस्था रखने वाले कहते हैं, अधिकांश खुद को सभ्य मानते हैं, धर्म के नाम पर उपद्रव करने से लेकर निर्दोषों, मासूमों की हत्या करने तक से नहीं चूकते, फिर भी अधर्म के पक्ष में अधिकांश लोग खड़े दीखते हैं |

रामायण काल हो या महाभारत काल जो अधर्मी था, अधिकाँश लोग उसके साथ थे | सर्वाधिक प्रभावी, शक्तिशाली, आर्थिक रूप से समृद्ध व्यक्तित्व रावण के भी साथ थे और दुर्योधन के भी साथ | सेना यानि शुल्क लेकर संहार करने वालों का समूह भी जनसँख्या के आधार पर रावण और कौरवों की ही बड़ी थी | श्रीकष्ण की भी नारायणी सेना भी कौरवों के साथ हो गयी थी | शायद इसका कारण यह था कि पांडव आर्थिक रूप से इतने समृद्ध नहीं थे कि वे नारायणी सेना का खर्च वहन कर सकें | तो जो आर्थिक रूप से समृद्ध होते हैं फिर वे अधर्मी ही क्यों न हों, लोग उसका साथ देना पसंद करते हैं | क्योंकि उनसे आर्थिक सुरक्षा मिलने की गारंटी तो होती है |

आज भी यही हो रहा है | आज भी जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो उसे बहुमत मिलने की सम्भावना अधिक होती है | भीड़ भी ऐसे लोगों की सभाओं में अधिक उमड़ती है क्योंकि वे उस भीड़ का खर्च उठाने में समर्थ होते हैं | अभी कहीं पढ़ रहा था कि भाजपा की सभा में दूसरे राज्यों से भीड़ जुटाई गयी प्रति व्यक्ति कुछ शुल्क तय करके | लेकिन जब सभा समाप्त होने पर उन्हें लाने वाला नेता पैसे देने से मुकर गया तो भीड़ ने उस नेता की पिटाई कर दी और उपद्रव किया |

चुनाव के समय भी देखता हूँ कि एक बोतल और पाँच सौ रूपये के नोट के चक्कर में गाँव का वोट उस व्यक्ति को चला जाता है, जिससे ग्रामीण सर्वाधिक दुखी हैं | अच्छे मुखिया का इनाम भी वह पा जाता है, जिसने गाँव के लिए कुछ ना किया हो सिवाय गावों की जमीनों पर पूंजीपतियों को कब्ज़ा दिलवाने और अधिकारीयों को रिश्वत खिलाने के |

इसलिए मेरी धारणा बन गयी कि बहुमत जिसे मिला हो, वह सही ही होगा इस बात की कोई गारन्टी नहीं है | क्योंकि सेना या भीड़ जनसँख्या में अधिक होने का अर्थ केवल इतना ही है कि उनको पालने वाला व्यक्ति आर्थिक रूप से समृद्ध है, न कि कोई विवेकवान, न्यायप्रिय व्यक्तित्व | ऐसा इसलिए क्योंकि विवेक व न्याय वहां नहीं हो सकता जहाँ निर्णय आर्थिक आधार पर होता है | जहाँ धन या व्यक्तिगत स्वार्थों को राष्ट्र व समाज से ऊपर रखा जाता हो, वहाँ विवेक नहीं हो सकता | विवेक यानि विभीषण, विवेक यानि कृष्ण और विवेक बिकाऊ नहीं होता, इसलिए वे शुल्क, वेतन या लूट के लालच में कभी भी भीड़ के साथ नहीं खड़े होते | और जो विवेकवान होते हैं वे कभी भी अधर्म व अधर्मियों के साथ खड़े नहीं होते |

हो सकता है मेरी धारणा गलत हो, आप अपने विचार रख सकते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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