आज इन्हीं पढ़े लिखे निंदक मानसिकता के विद्वानों के कारण ब्रम्हा-विष्णु-महेश गौण हो गये और नुक्कड़ वाले बाबा महान हो गये |

धर्म की जंजीरों में जकड़ा ध्यानी

एक मित्र ने कहा कि आज संघ से पचास लाख से अधिक लोग जुड़े हुए हैं और संघ उनको कोई तनखा भी नहीं देता…… क्या वे सब मुर्ख हैं ? क्या वे सब राष्ट्रभक्त नहीं है ?

मेरा मानना है कि कोई संघ के साथ जुड़े या सिम्मी के साथ या अलकायदा के साथ या आइसिस के साथ….हमें जुड़ने वाले की मानसिकता को समझना चाहिए | ये आवश्यक नहीं कि वे संघ के साथ जुड़े हुए हैं तो राष्ट्रभक्त ही होंगे या राष्ट्रद्रोही ही होंगे | वे कुछ भी हो सकते हैं लेकिन जुड़ने का आधार है भय | भयभीत लोग ही अलकायदा से जुड़ेंगे या आइसिस से जुड़ेंगे…. बात एक ही है, कोई बहुत अंतर नहीं है | उन्हीं में अच्छे लोग भी होंगे और बुरे लोग भी होंगे.. पढ़े लिखे सुब्रमनियम स्वामी जैसे विद्वान् भी जब राष्ट्र से अधिक महत्व नफरत व द्वेष को देते हैं तो फिर किसी और की बात ही क्या की जाए ? जब ऊँचे पदों और मठों में आसीन लोग ही नफरत और अलगाववाद की राजनीती में उलझे हुए हैं तो आम जनों को क्या दोष दें….?

लेकिन मैं हर उस व्यक्ति को मूर्ख मानता हूँ जो धर्मग्रंथों का जानकार हो, पढ़ा-लिखा हो, जिसके पास डिग्रियाँ हों, और सबसे बड़ी बात की लोग उसे विद्वान् भी समझते हो, लेकिन वह व्यक्तिगत स्वार्थवश, राजनैतिक स्वार्थवश धर्म सम्प्रदाय व जाति के आधार पर लोगों आपस में लड़ा रहा हो, एक को दूसरे के प्रति भड़का रहा हो, दंगे के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर रहा हो | और ऐसे ही विद्वानों का समर्थन करने वाले लोगों को मैं राष्ट्रद्रोही भी मानता हूँ क्योंकि ये लोग अपने नेता की अंधभक्ति में राष्ट्र की शांति, समृद्धि व सुरक्षा को प्रभावित कर रहे होते हैं |

दूसरों की निंदा में पढ़े-लिखे विद्वान् लोग इतने व्यस्त रहे आदिकाल से ही कि इनको समय ही नहीं मिला स्वयं के दोषों को देखने का | इनको समय ही नहीं मिला किसी कमजोर असहाय की सहायता करने का… परिणाम यह हुआ कि विशाल सनातनी मान्यताओं वाला देश संकीर्ण मानसिकताओं वाला देश बन गया | हिंदुत्व के ठेकेदारों के गुंडागर्दी व शोषण के कारण गौतम बुद्ध को नए सिरे से विचार करना पड़ा और बौद्ध सम्प्रदाय की नींव पड़ गयी | वास्तव में गौतम बुद्ध कोई नया संप्रदाय बनाना ही नहीं चाहते थे, वे तो केवल सभी से धर्म को फिर से समझने के लिए कह रहे थे | वे लोगों को फिर से आपस में सहयोगी हो जाने के लिए कह रहे थे…

लेकिन हिंदुत्व के ठेकेदार भला यह कैसे स्वीकार कर सकते थे ? सहयोगी होना उनके अहंकार को चोट करता था, वे किसी पर एहसान कर सकते हैं, भंडारा करवा सकते हैं, मंदिर बनवा सकते हैं….. लेकिन किसी की सहायता करना उनकी शान के विरुद्ध था | इसलिए गौतम बुद्ध को प्रताड़ित किया गया, अपमानित किया गया और दुनियाभर के अत्याचार किये उनके अनुयाइयों पर | लेकिन लोगों को समझ में आने लगा था कि यदि धर्म को सही प्रकार से समझ पाया कोई तो वह गौतम बुद्ध ही थे, ये लोग तो शासन-शोषण को ही धर्म मानते हैं इसलिए अब इनसे मुक्त होना आवश्यक है | आम जन ही नहीं, शक्तिशाली राजा महाराजों ने भी उन्हें स्वीकारना शुरू कर लिया था | इस प्रकार एक नया सम्प्रदाय बन गया बौध धर्म के नाम से…. और इस प्रकार परम्परा ही शुरू हो गयी हिंदुत्व के बिखरने की | आज साईं बाबा से लेकर न जाने कितने बाबाओं तक में लोग बंट चुके हैं हिन्दू होते हुए भी और न जाने आगे और कितने आयेंगे…… आज इन्हीं पढ़े लिखे निंदक मानसिकता के विद्वानों के कारण ब्रम्हा-विष्णु-महेश गौण हो गये और नुक्कड़ वाले बाबा महान हो गये | आज लोग नारायण-नारायण कहने से अधिक साईंराम या जय जय दयानंद कहना पसंद करते हैं | क्योंकि वे अपनी इस नई सम्प्रदाय में सुखी हैं | वे सुखी हैं क्योंकि उनका बाबा या फ़कीर उन्हें नफरत करना नहीं सिखाता, वे सुखी हैं क्योंकि वे धर्मो के ठेकेदारों की राजनीति को अब समझ चुके हैं | अब यह महत्व नहीं रखता कि उनके इस नये नये सम्प्रदाय में पाँच सौ परिवार हैं या पाँच लाख…. लेकिन यह बिखराव राष्ट्र को कमजोर कर रहा है | लोग अपने अपने में सीमित हो गये हैं | किसी को अपने परिवार से आगे की दुनिया नहीं दिखाई दे रही | सभी अपने घरों मंदिरों को सजाने मिएँ लगे हुए हैं और भूल गये कि वे एक राष्ट्र के नागरिक हैं | उनका राष्ट्र के प्रति भी कर्तव्य है, केवल नौकरी करने, बच्चे पालने, अंग्रेजी सिखाकर विदेश भेज देने के लिए उनका जन्म नहीं हुआ है | गौतम बुद्ध हों, या ओशो हों या साईं हो… सभी मानवता ही सिखाते रहे और सभी यही समझाते रहे कि सहयोगी हो जाओ, द्वैत मिटा दो……लेकिन शायद ही कोई यह सब समझने के लिए थोड़ा भी समय निकाल पा रहा है | वे तो धर्मों के ठेकेदारों के आये दिन दिए जा रहे नफरत भरे बयानों के कारण या तो नास्तिकता को अपना रहे हैं या फिर इन सब से दूर रहकर अपने परिवार तक ही सीमित रहना चाह रहे हैं | क्योंकि ये ठेकेदार केवल नफरत के बीज बोकर आपस में लड़ाकर हमारी चिताओं पर रोटियाँ सेकेंगे और फिर इनके पास अपना कुछ है भी नहीं खोने को | इनका तो कच्छा भी अंग्रेजों का दिया हुआ है | आज तक वही कच्छा पहने घूम रहे हैं जो अंग्रेज भागते समय छोड़ गये थे, अब तो अंग्रेजों को भी शायद इसे पहनते शर्म आती होगी |

पचास लाख की जनसँख्या वाला संघ यदि स्कूल भी खोलता है तो हिंदुत्व के नाम पर, सहायता भी करता है तो धर्म परिवर्तन की शर्त पर, भंडारा भी करवाता है तो हिंदुत्व के नाम पर…. तो काहे का राष्ट्रभक्त और काहे का सनातनी ? यह तो ईसाई भी कर रहे हैं और शायद मुस्लिम भी कर रहे हैं | मुझे तो सिख इस मामले अधिक राष्ट्रवादी दिखते है क्योंकि वे धर्म, सम्प्रदाय या जाति के आधार पर किसी की सहायता नहीं करते और न ही कोई शर्त रखते हैं धर्म परिवर्तन की |

सनातनी जाति और धर्म पूछकर सहायता नहीं करता, बल्कि उसका व्यवहार व सेवाभाव ही उसे महान बना देता है | दूसरों की मान्यताओं, परम्पराओं की निंदा करने, ऊपर हिंसा करने, या उन्हें अपमानित करने की आवश्यकता हमें इसलिए पड़ती हैं क्योंकि हम स्वयं किसी योग्य नहीं होते | क्योंकि हम स्वार्थ व धंधे में हो रहे घाटे के कारण अपना मानसिक संतुलन खो चुके होते हैं | क्योंकि कुछ विदेशियों के हाथों के हम कठपुतली बन चुके होते हैं…. इसलिए अपना विवेक का प्रयोग भी नहीं कर पा रहे | फिर चाहे अपने ही राष्ट्र को विदेशियों को सौंपना पड़े… जैसे कि आइसिस के साथ हो रहा है | और फिर संघ की तो कभी अंग्रेजो से कोई नाराजगी रही भी नहीं थी, वह तो आज भी उन्हीं के ड्रेस पहने फिर से अंग्रेजों के स्वागत के सपने लिए बैठे हैं | उन्हें विश्वास है कि एक न एक दिन भारत को फिर अंग्रेजों को सौंपने में कामयाब हो जायेंगे | ~विशुद्ध चैतन्य

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