यदि कल को कोई कौम मानव माँस खाने की आदत डाल ले तो क्या हमें उनकी भावनाओं का भी सम्मान करना पड़ेगा ?

यह एक प्रश्न आज बहुत शेयर हो रहा है और शेयर करने वाले ज़ाहिर है कि शाकाहारी ही होंगे और खुद को बहुत उच्चतर स्थिति में अनुभव कर रहे होंगे कि यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर कोई नहीं दे रहा….. फिर गर्व इस बात का कि माँसाहारी नहीं हैं इसलिए पुण्यात्मा होने का घमंड भी हो रहा होगा और मांसाहारियों को नरक की आग में जलते हुए कल्पना करके ही परमानन्द का अनुभव भी कर रहे होंगे |

हालांकि यह विषय ऐसा नहीं है कि कोई उत्तर दिया जाए…लेकिन यह विषय ऐसा अवश्य है कि मानसिक रूप से धार्मिक कुंठाओं से कुंठित कट्टरपंथियों को प्रकृति व सहआस्तित्व के विषय में कुछ समझाया जाए |

प्रश्नकर्ता ने शायद यह खबर नहीं पढ़ी है….”ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ खाद्य इंस्पेक्टरों द्वारा ओक्लाहोमा शहर के मीट फैक्ट्री में इंसान और घोड़े के मांस पाए गए हैं. उन ट्रकों में भी मानव मांस पकड़ा गया है जो मैक डोनाल्ड के विभिन्न रेस्तरां में पेटिस सप्लाई करने जा रहे थे. कई रिपोर्टो का कहना है कि खाद्य अधिकारियों ने पूरे अमेरिका के मैक डोनाल्ड रेस्तरां का मुआयना किया और लगभग 90 प्रतिशत रेस्तरां में इंसानी मांस पाया. जबकि घोड़े का मांस 65 प्रतिशत रेस्तरां में पाया गया है. 

शायद यह रिपोर्ट भी नहीं पढ़ी….कमजोर दिल वाले इस लिंक को न खोलें   Human Meats Are Being Sold All Around Inside China and Taiwan 


यह तो बात हुई आदमखोरों की | हम आदमखोरों पर लगाम लगाना चाहते हैं क्योंकि हम स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं और यह मानते है कि अपनी ही जाति या प्रजाति का माँस खाना मानव सभ्यता के विरुद्ध है | मणिपुर नागालैंड आदि में मानव को छोड़कर सभी का माँस खाया जाता है | विश्व में भारत को छोड़कर शायद ही कोई देश हो जो माँसाहार को घृणित मानता है | भारत में भी केवल कुछ पंडित-पुरोहित नस्ल को छोड़ दिया जाए तो शायद कोई मांसाहारियों से घृणा नहीं करता क्योंकि माँसाहारी होना या न होना प्राकृतिक अवस्था है | कई पंडितों को देखा है मैंने माँसाहार करते हुए और कई माँसाहारी परिवार में शुद्ध शाकाहारियों को देखा है मैंने |

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अब हम माँसाहार नहीं करते, इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें यह अधिकार मिल गया कि मांसाहारियों की निंदा करना शुरू कर दें | हम माँसाहार नहीं करते, इसका अर्थ यह नहीं है कि कुछ भी अनाप शनाप बके चले जाएँ मांसाहारियों के लिए | और फिर किसी के शाकाहारी हो होने या न होने से मानवता के लिए कौन सा बड़ा योगदान हो जाता है ?

शर्म तब क्यों नहीं आती जब मांसाहारियों के देश में अपने बच्चों को भेजते हैं पढने के लिए ? शर्म तब क्यों नहीं आती जब मांसाहारियों को अपने देश में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित करते हैं ? शर्म तब क्यों नहीं आती जब फोन से लेकर कंप्यूटर तक मांसाहारियों के हाथ का बना आयात करते हैं ? शर्म तब क्यों नहीं आती जब आपका बेटा या बेटी कहता है कि वह मांसाहारियों के देश में नौकरी करने जा रहा है ? शर्म तब क्यों नहीं आती जब मांसाहारियों को भारत में व्यापार के लिए आमंत्रित करते हैं….. आपकी कार से लेकर पेन तक सब मांसाहारियों के देश से ही आयात हो रहे हैं…. कभी यह यह क्यों नहीं सोचा कि शाकाहारी पिछड़ क्यों गये जबकि कभी हमारे पास तो पुष्पक विमान और ब्रम्हास्त्र जैसी उच्च तकनीक थी ?

आज ईसाई धर्म शांति से पुरे विश्व में फैलता चला जा रहा है और आधे भारत को अपनी चपेट में ले चुका है | इस्लाम भी सौ बुराइयों के बावजूद फैलता चला जा रहा है | बौध भी तेजी से फैलता चला गया..जबकि वह तो अहिंसा का पक्षधर था | केवल इसलिए क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को डराकर या निंदा से बदलने का प्रयास नहीं करते | वे माँसाहार को भी सहजता से स्वीकार करते हैं और जो माँसाहार नहीं करना चाहते उसे बाध्य नहीं करते माँसाहार के लिए |

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भारतीय समाज में भी इसी प्रकार से कभी बहुत ही उन्नत था, लेकिन बाद में संकीर्ण होता चला गया | भारतीय समाज उन्नत था उसका प्रमाण था विभिन्न आराध्य, कर्म काण्ड व प्रसाद व्यवस्था | आज भी हिन्दू धर्म के अंतर्गत कुछ जगहों में प्रसाद के रूप में मांस या मच्छी ही दी जाती है |

लेकिन ये हर आये दिन नए ने रूप से भारत के भीतर नफरत के बीज बोकर आपस में अविश्वास और नफरत फैलाने वाले लोगों में जितनी हिंसा भरी हुई है, शायद उसका दस प्रतिशत भी नहीं होगा होगा मांसाहारियों में | (आइसिस-अलकायदा को इस विषय में न घसीटें क्योंकि मैं मानवों की बात कर रहा हूँ, नर-पिशाचों की नहीं) |

आज देश की सारी उपजाऊ भूमि पर ग्रहण लग गया, इन्हीं शाकाहारियों के कारण | आज देश से हरियाली, पेड़-पौधे लुप्त हो रहे हैं और कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं, इन्हीं शाकाहारियों के कारण | क्योंकि ये शाकाहारी न तो पेड़-पौधे लगाते हैं, न ही खेती करते हैं, न ही किसानों का सहयोग करते हैं, न ही वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए वन को साफ़ सुथरा रखने में सहयोग करते हैं | बच्चे पैदा करते हैं नौकर बनाकर विदेश भेजने के लिए | बच्चे पैदा करते हैं नोट छापने के लिए…. लेकिन बच्चे किसान बनाने के लिए पैदा नहीं करते | बच्चों को सेना में भेजने के लिए नहीं पैदा करते…. फिर बात करते हैं बड़ी बड़ी… धर्म अधर्म, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक…. श्रृद्धा व विश्वास का दोहन करके मंदिरों के गोदामों में धन जमा करेंगे, लेकिन कोई भूख से मर जाये, कोई बीमारी से मर जाए.. फूटी कौड़ी नहीं खर्च करेंगे | इनसे अधिक क्रूर कोई और हो सकता है ? ये तो जीते जी मानवों को चूस जाते हैं धर्म और श्रृद्धा के नाम पर और बात करते हैं भावनाओं की |

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जरा खुद से एक बार पूछिये कि मांसाहारियों के बनाए समानों का प्रयोग करने पर पाप नहीं लगेगा ? आप तय कर लीजिये कि उस देश का समान प्रयोग नहीं करेंगे जिस देश में एक भी मांसाहारी होगा | या फिर निंदा निंदा खेलना बंद कर दीजिये और सह-अस्तित्व को अपनाइए | जब प्रकृति को आपत्ति नहीं है, जब ईश्वर को आपत्ति नहीं है तो आप कौन होते हैं उनकी निंदा करने वाले ? ~विशुद्ध चैतन्य

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