कायरों की अपनी कोई पहचान नहीं होती

कायरों की भीड़ जब हिंसक हो जाती है, तब दीमापुर काण्ड होता है !

कायरों की भीड़ जब हिंसक हो जाती है, तब गोधरा काण्ड होता है !

कायरों की भीड़ जब हिंसक हो जाती है, तब १९८४ काण्ड होता है !

क्योंकि कायरों के पास विवेक नहीं होता, क्योंकि कायरों के पास सोचने समझने की शक्ति नहीं होती, क्योंकि कायरों के पास आत्मविश्वास नहीं होता, क्योंकि कायरों की अपनी कोई पहचान नहीं होती, क्योंकि कायर मानसिक रूप से गुलाम हो चुका होता है……. और दुर्भाग्य इनका यह होता है कि ये कायर को ही अपना नेता, अन्नदाता और भगवान् मानकर जीते है |

आइसिस हो या अलकायदा उनका नेता कोई वीर, विवेकी, होशपूर्ण व्यक्ति नहीं होता, वह भी वास्तव में एक कायर ही होता है | जितने भी धर्म के नाम पर ज़हर उगलने वाले, व दंगा-फसाद करने वाले संगठन हैं, वे भी वास्तव में कायरों की भीड़ ही है जिनका नेता कायर होता है | और दुर्भाग्य से कायरों की सेनायें हमेशा बड़ी व ताकतवर दिखती है क्योंकि कायरों की जनसँख्या प्राकृतिक रूप से अधिक होती है | उदाहरण के लिए हिरणों, चूहों का झुण्ड शेरों, चीतों के झुण्ड से हमेशा बड़ा होती है | यह प्रकृति का नियम है क्योंकि प्रकृति जानती है कि यदि कायरों की संख्या कम हुई तो वे लुप्त हो जायेंगे | क्योंकि कायर मृत्यु से भयभीत होते हैं इसलिए वे किसी न किसी झुण्ड या संगठन में रहना पसंद करते हैं चाहे वह संगठन घृणा व द्वेष फैला कर राष्ट्र को कमजोर ही क्यों न कर रहा हो |

आप कभी नहीं देखेंगे कि ये बड़े बड़े संगठनों के नेता राष्ट्र, समाज, या किसानों के हितार्थ कोई महत्वपूर्ण वक्तव्य देते हैं या कोई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं | ये कभी प्रश्न नहीं उठाएंगे कि क्यों बड़े बड़े औद्योगीक घरानों के कर्जे माफ़ कर दिए जाते हैं, बैंक उनकी कर्जो की फ़ाइल बंद कर देता है, जबकि किसी आम व्यक्ति या किसान के छोटे से छोटे कर्ज के लिए भी उसे सरे राह शर्मिंदा करने से नहीं चूकते | ये कभी नहीं पूछेंगे कि क्यों विदेशी निवेशकों और पूंजीपतियों को हर प्रकार के सहयोग सरकार देने को तैयार हो जाती है, लेकिन किसी किसान या लघु उद्योग लगाने वाले की सहयोग को आगे नहीं आती….. योजनायें बनती हैं लेकिन केवल कागजों तक ही सीमित रह जाती है | ये कभी नहीं जायेंगे यह पूछने कि क्यों घोटालेबाजों को सत्ता सुख मिलता है और ईमानदारों, कर्त्तव्यनिष्ठों को दर-दर भटकना पड़ता है | ये किसी कमजोर व असहाय पर टिड्डीदल की तरह टूट पड़ते हैं लेकिन राष्ट्रद्रोही नेताओं व व्यापारियों के विरोध में इनकी आवाज भी नहीं निकलेगी | आतंकवादियों को रिहा करवाते समय, भोपालगैस काण्ड के समय, बलात्कार के आरोपी मंत्री के लिए… ये कोर्ट के निर्णय की दुहाई देंगे, वहीँ दीमापुर काण्ड, गोधरा, १९८४ काण्ड के समय खुद जज बन जायेंगे | किसी गिरजाघर में तोड़फोड़ करते समय, किसी पादरी और उनके मासूम बच्चों को कार में बंद कर आग लगाते समय….. ये स्वयं जज बन जायेंगे, क्योंकि तब कानून व न्याय पर इनका विश्वास नहीं होता… लेकिन किसी भ्रष्ट व अपराधी प्रकृति के नेता को वोट देते व दिलाते समय कोर्ट व न्याय पर पूरा विश्वास होता है इनका | हर अपराधी व भ्रष्ट नेता को न्यायायिक प्रणाली पर पूर्ण विश्वास होता है, क्योंकि वे जानते हैं कि वकील से लेकर जज तक सब कुछ बिकता है न्यायिक बाजार में और उनके पास खरीदने की ताकत होती है |

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ये साहसी व नैतिक हैं, इसका अर्थ केवल इतना है कि कायरों के पास धन की ताकत भी होती है और सत्ता की ताकत भी | फिर भी ये इतने कमजोर होते हैं कि न राष्ट्रहित में कोई कार्य कर पाते हैं और न ही समाजहित में…. बहुत हुआ तो कहीं लंगर बँटवा दिया, या कहीं कपड़े बँटवा दिया….. लेकिन जब हिंसक हो जाएँ ये लोग तो कोई न कोई मूर्खतापूर्ण काण्ड कर ही देते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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