भक्ति तो है, लेकिन संकीर्णता लिए हुए

भक्त व भक्ति कि महत्ता भारत में इतनी अधिक है कि भक्ति का महत्व और भक्ति दोनों ही समाप्त हो गया | अब भक्त का अर्थ हो गया चापलूस, और भक्ति हो गयी चापलूसी |

किसी की भक्ति किसी मूर्ती में होती है और वह उसे ही भोग लगाने, सजाने संवारने में सुख का अनुभव करता है | समाज उसे बहुत ही महान मानता है और उसकी स्तुति करने लगता है | लेकिन वहीँ कोई बच्चा यदि गुड्डे-गुड़ियों के प्रति वही भक्ति दिखाता है तो उसे बचपना कहते हैं और मान कर चलते हैं कि जब वह समझदार हो जायेगा तब स्वयं इन खेलों से मुक्त हो जायेगा | लेकिन बच्चे कभी बड़े नहीं होते; बचपन में बार्बी डॉल से खेलते थे, बड़े होकर देवी-देवताओं, नेता-अभिनेताओं की मूर्तियों से |
यहाँ भी भक्ति तो है, लेकिन बहुत ही सीमित दायरे में | भक्ति तो है, लेकिन संकीर्णता लिए हुए | लेकिन यह पूर्ण भक्ति नहीं है क्योंकि यह अहंकार लिए हुए है | मेरा भगवान, मेरा नेता…. आदि |

मेरा मानना है कि गुड्डे-गुड़ियों से शुरू हुई भक्ति व प्रेम देवी-देवताओं, नेता-अभिनेताओं से होते हुए और आगे बढ़ना चाहिए | गुड्डे-गुड़िया प्राथमिक शिक्षा के लिए ठीक हैं, नेता-अभिनेता की भक्ति माध्यमिक शिक्षा के लिए ठीक है, देवी-देवता की भक्ति उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के लिए ठीक है लेकिन, भक्ति यदि मानवता से हो, राष्ट्र से हो, तो शिक्षा का सदुपयोग हुआ मानना चाहिए | अन्यथा भक्ति का महत्व ही समाप्त हो जाता है और व्यक्ति भेड़-बकरियों से अधिक उन्नत नहीं हो पाता भक्ति व मानसिकता के आधार पर |

पहले अग्नि, वायु, नदी पहाड़, वृक्ष आदि की पूजा अर्चना की जाती थी, लेकिन अब बाबा, नेता, अभिनेता, बाइक पूजनीय हो गये | कल स्मार्टफोन, लेपटॉप, डेस्कटॉप पूजनीय हो जायेंगे और कोई न कोई महान भक्त इनका भी निकल आएगा | कल उनका भी उसी प्रकार सम्मान होगा जैसे मीरा, सूरदास आदि का होता है और तुलना की जाएगी उनके साथ इन आधुनिक भक्तों की | कल कोई मोदी-केजरीभक्त पूजनीय हो जाएगा…. लेकिन हम पायेंगे कि हम ऊपर नहीं उठे, नीचे ही गिरते चले जा रहे हैं |

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भक्ति का सीधा सा अर्थ है किसी के प्रति प्रेम पूर्ण समर्पण का भाव | जिसके सामने स्वयं का अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है और उसे सुखी देख कर स्वयं का दुःख मिट जाता है | इसलिए भक्ति को पहचानिए और यह तभी संभव होगा जब आप स्वयं को पहचानने योग्य हो जाएँ | भक्ति जैसी महान उर्जा को महान उद्देश्यों के लिए प्रयोग कीजिये किसी नेता या पार्टी की भक्ति से न समाज का हित होगा, न राष्ट्र का हित होगा, न मानवता का और न ही सृष्टि का | ~विशुद्ध चैतन्य

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