तो कल स्त्री-दिवस, महिला-दिवस, Women’s Day था !

कल महिलाओं की सुरक्षा के विषय में चर्चाएँ हुई होंगी, कल महिलाओं को मंदिरों में बैठाकर पूजा गया होगा, कल महिलाओं का सम्मान किया गया होगा, कल महिलाओं और पुरुषों की बराबरी को इंची-टेप लेकर नापा गया होगा, कल कोई बलात्कार नहीं हुआ होगा, कल कोई महिला पति, पिता, भाई के हाथों पिटी नहीं होगी, कल सड़क छाप मजनुओं ने सीटी नहीं बजाई होगी, कल…..बाकी तो पूरा साल पड़ा है वही सब करने को |

हम जो कुछ करते हैं कल कर चुके होते हैं या कल करेंगे, आज कुछ नहीं कर सकते क्योंकि आज तो हम बहुत व्यस्त हैं |

हमारे देश में लक्ष्मीबाई, दुर्गावती… जैसी वीरांगनाएं इसलिए नहीं आयीं क्योंकि हम देवी उपासक हैं, बल्कि इसलिए आयीं क्योंकि हम नारीशक्ति से परिचित हैं | विदेशों में स्त्रियों को भोग्या माना जाता रहा और आज भी वही स्थिति है, इसलिए उन्होंने स्त्रियों को समझाया कि कपड़े पहनना गुलामी है और कपड़े उतारना आजादी | जो भी स्त्री-शरीर को ढँक कर रखने की बात करे, वह स्त्रियों को गुलाम समझता है और जो स्त्रियों के कपड़े उतरवा दे वह सही मायने में स्त्रियों का संरक्षक है ऐसी धारणा का प्रचार किया गया | टेनिस देख लीजिये स्त्रियों को कितनी आजादी है उससे पता चल जाएगा | वहीँ टेनिस में यदि स्त्री सलवार सूट पहन कर चली जाए तो उसे खेलने ही नहीं दिया जाएगा शायद | क्योंकि वह गुलाम मानसिकता की लड़की मानी जायेगी और टेनिस आजाद ख्यालों की लड़कियों के लिए ही है | वहाँ दर्शक खिलाड़ियों के अंडरवियर देखने में अधिक रूचि रखते हैं शायद और उसी के आधार पर तय करते हैं कि श्रेष्ठ खिलाड़ी कौन है……. अरे…अरे…. ठहरिये….!!!

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जानता हूँ कि आप मुझे भी स्त्रियों का शत्रु कहने जा रहे हैं | आप मुझे भी स्त्रियों की आजादी का विरोधी घोषित करने जा रहे हैं | आप मुझे मुझे भी घटिया सोच का व्यक्ति कहने जा रहे हैं….. क्योंकि विज्ञापन जगत के विद्वान ही स्त्रियों का सही मायने में सम्मान करते हैं, फिल्म जगत के विद्वान ही स्त्रियों का सही मायने में सम्मान करते हैं… हम अनपढ़ लोग भला स्त्रियों का सम्मान क्या जानेंगे ?

गौतम बुद्ध के शिष्य बोधिधर्मन जब चीन गये तब उन्होंने देखा कि शासक व उनके सैनिक ग्रामीणों पर अत्याचार कर रहे हैं, स्त्रियों को उठा कर ले जाते हैं और ग्रामीण असहाय व कमजोर थे | उन्होंने वहाँ मानसिक व शारीरिक शक्ति को महत्व दिया और ध्यान व ईश्वर उपासना के लिए शारीरिक सौष्ठव व युद्ध कौशल को अनिवार्य रूप से एक दूसरे के पूरक के रूप में जोड़ दिया | बाद में शओलिन मंदिर विश्व में अपनी एक अलग ही पहचान बनकर उभरा | वहाँ की फिल्म मार्शल आर्ट्स पर आधारित होती हैं और अधिकांश फ़िल्में युद्ध-कला की शिक्षा के लिए ही होती हैं | वहाँ स्त्री और पुरुष में भेद-भाव नहीं होता केवल शक्ति व शक्तिहीन के रूप में ही तुलना होती है | यह विडियो देखिये और कुछ दांव-पेंच सीखिए | नारी-दिवस मनाने से नारी का भला नहीं होने वाला | यह वही देश है जहाँ स्त्रियों को समझा व जाना गया, यही वह देश है जहाँ चाणक्य जैसे विद्वान माना कि “स्त्रियों में पुरूषाें से आहार दो गुणा, लज्जा चार गुणा, साहस छ: गुना और काम आठ गुना अधिक होता है।”(1/17) वहीँ उन्होेंने पत्‍नी को ‘भार्या मित्र ग्रहेशू’ (घर में पत्‍नी मित्र है) माना है।

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ये नए नए कानूनों से स्त्रियों को कमजोर बनाकर स्वयं को उनका संरक्षक व शुभचिंतक जताने से अच्छा है उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से आत्मनिर्भर बनाइये | अपने शत्रुओं से स्वयं निपटने की कला सिखाइए ताकि वह अपनी व अपने परिवार की रक्षा स्वयं कर सके | स्त्री-सम्मान के नाम पर पुरुषों का अपमान मत करिए और न ही पुरुषों के स्वाभाविक गुणों को अपराध या कुकृत्य की श्रेणी में रखिये | पुरुषों का स्वाभाविक गुण है स्त्रियों के प्रति आकर्षित होना, पुरुषों का स्वाभाविक गुण है स्त्रियों को आकर्षित करने के लिए अपनी समझ व योग्यतानुसार उपाय करना | पुरुषों का स्वाभाविक गुण है स्त्रियों के अंगों को निहारना…… यह सब प्राकृतिक है | ठीक उसी  प्रकार जिस प्रकार आप धन, पद, प्रतिष्ठा के प्रति आकर्षित होते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे एक व्यापारी ग्राहक के प्रति आकर्षित होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे एक नेता सत्ता के प्रति आकर्षित होता है….. वह भी सभी प्रकार के उपाय करता है प्राप्ति के लिए | लेकिन जब ये लोग छल-बल व धमकी हत्या आदि का सहारा लेंने लगते हैं तो स्थिति विकृत हो जाती है और गुण दुर्गुण में बदल जाता है |

लेकिन एक व्यापारी लुट जाता है किसी ठग के द्वारा तो दोष केवल ठग को ही दिया जाता है, न कि व्यापारी को | निंदा ठग की ही की जाती है  न कि व्यापारी व पूरे समाज की | इसी प्रकार यदि किसी स्त्री का बलात्कार होता है तो पुरे पुरुष समाज को कलंकित व कटघरे में खड़ा करेक आप स्त्री-पुरुष के बीच दूरी व अविश्वास ही बढ़ा रहे हैं | आपके कानून पुरुष विरोधी अधिक होते जा रहे हैं, जबकि कानून न्याय संगत होना चाहिए | आपका कानून हर समय रक्षा के लिए उसके साथ नहीं रह सकता, और न ही पुलिस उसकी रक्षा कर सकती है | ये सभी दुर्घटना के बाद ही सहायता कर सकते है और अधिकांश केस में तो पैसा ही बोलता है | ~विशुद्ध चैतन्य

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