ढूंढिए वे धर्म जिनके लिए लोग मारकाट कर रहे हैं |

एक छोटे बच्चे के लिए उसकी माँ ही उसके लिए सबकुछ होती है सारी दुनिया ही उसकी माँ होती है | फिर जब घर से बाहर निकलता है, तब उसे समझ में आता है कि पिता भी महत्वपूर्ण हैं | फिर कुछ दोस्त भी जुड़ जाते हैं उसकी दुनिया में, फिर मोहल्ला, फिर गाँव फिर देश… इस प्रकार यदि जितना अधिक वह जानता जाता है, उसका दायरा बढ़ता जाता है |

लेकिन कुछ लोग घर-परिवार, मोहल्ले और अपने सम्प्रदाय तक ही सीमित रह जाते हैं आजीवन | वे उस दायरे से बाहर निकल ही नहीं पाते और यह मानकर चलते हैं कि बस यही सारी सृष्टि है और यही हमारी दुनिया है | सहअस्तित्व और वसुधैव कुटुम्बकम भी उनके अपने सम्प्रदाय मोहल्ले देश तक ही सीमित रह जाता है | अब ऐसे लोगों को मैं कूप-मंडूक न कहूँ तो क्या कहूँ आप ही बताइये |

वे लोग जो दड़बा संस्कृति को धर्म मानकर जीते हैं, जो परोपकार भी करते हैं तो व्यवसायिक मानसिकता से करते हैं | वे ही लोग हैं जो धर्म के नाम पर व्यवसाय करते हैं | वे ही लोग हैं जो दूसरों के आस्तित्व को मिटा देने के सपने देखते हैं या षड्यंत्र करते हैं |

चलिए आइये हिन्दू-मुस्लिम के दड़बे से बाहर निकलिए और सनातन को समझिये | कल जो समझाया था सनातन के विषय में आज थोड़ा अलग करके समझाता हूँ क्योंकि शायद वह बहुत ही कम लोगों के समझ में आया | मैं तो जानता ही था कि दड़बे से बाहर की दुनिया कभी देखी नहीं तो समझ में आना ही नहीं था |

तो अब इस चित्र को ध्यान से देखिये और इसमें अपनी पृथ्वी खोजिये | यह हमारी आकाशगंगा है और इस आकाश गंगा में सूर्य से कई गुना बड़े तारे हैं और कई सौरमंडल भी हैं | उन सौरमंडलों में ग्रह भी हैं और हो सकता है किसी में हमारी ही तरह मानव भी हों |

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अंतरिक्ष हो गया सनातन धर्म, आकाश गंगा हो गयी पृथ्वी, और हमारा सौर मंडल हो गया भारत….| अब इनमें ढूंढिए ओवैसी, आदित्यनाथ, साक्षीमहाराज, मोहन भागवत, तोगड़िया… अबुबकर, सईद हाफिज… और उन सभी लोगों को जो परधर्म-निंदा परम सुखं के सिद्धांत पर घृणा और द्वेष की दीवारें खड़ी करते हैं | इनमें ढूंढिए वे धर्म जिनके लिए लोग मारकाट कर रहे हैं | इसमें ढूंढिए हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, यहूदी, यजीदी…..और बाकी जितने भी संप्रदाय, मत-मान्यताओं के दड़बे हैं |

मैं जानता हूँ कि समझ में अब भी नहीं आया होगा… लेकिन अब मुझे इसी प्रकार धर्म को समझाना होगा | क्योंकि जब तक दड़बे से बाहर की दुनिया नहीं दिखेगी, तब तो दड़बे को ही धर्म मानकर चलोगे | ~विशुद्ध चैतन्य

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