अब तक जो समझा जीवन को उसका सार…

आज सुबह चार बजे आंख खुली एक स्वप्न के साथ जिसमें मैंने देखा कि मेरे आस पास कई लाशें बिखरीं हुईं हैं और मैं जब तक कुछ समझ पाता एक व्यक्ति मेरे सामने आता है, उसके हाथ में रिवोल्वर है और वह मुझपर तान देता है | फिर कहता है, “बहुत शान्ति, भाईचारे की बात करता है न, आज बताता हूँ कि शान्ति होती कैसी है…इतनी शांति दूंगा कि फिर शांति, भाईचारे की बात नहीं करेगा किसी से…” | मैं उसे पहचानने का प्रयास करता हूँ लेकिन चेहरा दिखाई नहीं देता | उसने क्रीम कलर का ओवर कोट पहना हुआ था | मैं तब तक समझ चुका था कि इसी ने हत्याएं की हैं और अब मुझे भी मारने वाला है | मैं पाता हूँ कि मुझे बिलकुल भी भय नहीं लग रहा उससे और ऐसा लग रहा है जैसे कि हम कोई खेल खेल रहे हैं… जैसे कि बचपन में खेलते थे चोर-पुलिस वाला | मैं उससे कहता हूँ कि ठीक है चलाओ गोली…सोच क्या रहे हो ? और वह गोली चला देता है | गोली मुझे आती हुई दिखती है और मेरे सीने में धंस जाती है | मैं मुस्कुराकर उसे देखता हूँ अब उसके हाव भाव से लगता है कि वह भयभीत है और वह दूसरी गोली चलाता है… फिर उसे भागता हुआ देखता हूँ….बाहर लोगों की भीड़ की हलचल सुनाई पड़ने लगती है… बहुत से लोगों को आते हुए देखता हूँ और हत्यारा उस भीड़ को चीरता हुआ खो जाता है…. मुझे ऐसा लग रहा होता है जैसे मेरे शरीर का वजन बिलकुल कम हो गया और मैं अपने आपको सभी तनावों से मुक्त पाता हूँ…. तभी मेरी आँख खुल जाती है | शायद यह मेरी नियति की भविष्यवाणी थी |

चलिए यदि यह भविष्यवाणी मान लूं तो यही सही…. क्योंकि मैं खुश हूँ कि भय तो मुझे सपने में भी नहीं लगा मौत से | लेकिन मैं सोच रहा था उस विषय पर जो उसने कहा | शान्ति-भाईचारा की बातें आज बेमानी हो गयी हैं | राष्ट्रद्रोह माना जाने लगा है क्योंकि धर्म के ठेकेदारों ने अब धर्म की आढ़ लेकर राष्ट्र को फिर से नफरत की आग में झोंकना शुरू कर दिया | अब यह भी समझ में आने लगा कि क्यों अरुणाचल मिशन कभी भी किसी भी धार्मिक संगठनों या धर्म सभाओं के साथ नहीं जुड़ा | आज समझ में आने लगा कि क्यों मुझे संघी-बजरंगियों से दूर रहने की सलाह दी जाती रही | आज मुझे समझ में आने लगा कि इतने सारे धार्मिक संगठनों का मूल उद्देश्य मानवता कभी रहा ही नहीं, ये सभी तो राजनैतिक पार्टियाँ हैं जिन्होंने धार्मिकता का छद्म रूप धरा हुआ है | जबकि वास्तव में धर्म से इनका कोई लेना देना कभी रहा ही नहीं | आज समझ में आने लगा कि भारत का बँटवारा आम जनता ने नहीं, इन्हीं धर्म के ठेकेदारों ने करवाया था | आज समझ में आने लगा… बहुत कुछ जो पहले नहीं समझ में आया था |
सारा वेद-पुराण धरे के धरे रह गये, ऋषि-मुनियों की सारी शिक्षायें धरी की धरी रह गयीं, सारे मानवता के पाठ धरे एक धरे रह गये…क्योंकि वास्तविक जीवन व आचरण में कभी अपनाया ही नहीं | इन सारे ज्ञानों के प्रयोग की क्षमता हम खो चुके हैं | क्योंकि वास्तव में जो कहा गया पुराणों में, जो कहा गया वेदों में, जो कहा गया गीता में… वह इन्हीं लोगों को समझाने के लिए कहा गया था | लेकिन न तो इनकी समझ में तब आया और न ही अब, लेकिन इन्होने धार्मिकता का चोला ओढ़कर धार्मिक होने के अभिनय में इतनी पारंगतता प्राप्त कर ली है, कि आज लोगों को ये लोग धार्मिक और सत्य मार्गी दिखते हैं, जबकि शांति और भाईचारे की बातें करने वाले लोग पाखंडी और ढोंगी दिखाई देते हैं | अब मन नहीं करता ये सारे वेद-पुराणों को देखने का भी…. क्योंकि आज इनका कोई औचित्य नहीं रह गया.. आज तो कट्टे-कारतूस का युग है | हत्या करना, डराना, धमकाना, गुंडे-मवालियों को पालना, राष्ट्रभक्ति और सेवा के नाम पर राष्ट्र व नागरिकों को लूटना, किसानों और आदिवासियों के आस्तित्व ही मिटा देने के प्रयोजन करना….यही सब धर्म है अब और जो द्वेष व हिंसा में लिप्त है, वही संत है आज, वही महान है आज |
अब तक जो समझा जीवन को उसका सार:
मनुष्य अच्छा या बुरा पूर्व जन्मों के संस्कारों से ही होता है | वह जो कुछ भी सीखता या करता है वह पूर्वजन्मों के संस्कारों के आधार पर ही होता है, वर्तमान जन्म में कितनी भी अच्छी शिक्षा दी जाए, उसका कोई विशेष परिणाम इस जन्म में नहीं मिलता | वह जब तक कर्मानुसार स्वयं अनुभव से नहीं सीखेगा, वह नहीं जान पायेगा | फिर चाहे उसे वेद-पुराण कंठस्थ ही क्यों न हों | यदि उसके पूर्वजन्मों के अनुभव व संस्कार अच्छे नहीं रहे, तो वह इस जन्म में भी आतंकवादियों की ओर ही आकर्षित होगा, या अपराधी ही बनेगा | वह वेदाचार्य भी हो जाए, वह संत-महंत भी हो जाये, तब भी वह उन शास्त्रों से केवल हिंसा व द्वेष पूर्ति करने वाले और अपने कुत्सित उद्देश्यों को पूर्ण करने वाले तर्क ही चुनेगा, ताकि वह स्वयं को सही सिद्ध कर पाए | इसलिए वेद-पुराण या गीता रामायण किसी को अच्छा या बुरा नहीं बनाते, लेकिन जिनके संस्कार अच्छे हैं उनके नाम पर इन ग्रंथों व शास्त्रों पर विश्वास बना हुआ है लोगों का | अन्यथा ये धर्मग्रन्थ तो केवल नफरत की दीवारें खड़ी करने के ही काम आ रहीं हैं | ये धर्म और सम्प्रदाय एक सुरक्षा कवच दे देते हैं धर्म के नाम पर हिंसा और उपद्रव करने का, धर्म के नाम पर व्यवसाय करने का अधर्मियों को | जो पुण्य आत्माएँ हैं, उन्हें इन सब ग्रंथों को पढने की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उनके पूर्वजन्मों के संस्कार ही उन्हें अच्छा बना देती है | वे यदि इन्हें पढ़ें भी तो उन्हें इन पुस्तकों में अच्छी बातें ही दिखाई देंगी, वे बुरा देख ही नहीं पायेंगे | जबकि बुरे लोग इसे पढेंगे तो उन्हें अच्छी बातें दिखेंगी ही नहीं | ~विशुद्ध चैतन्य
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