धर्म और मूर्ति पूजा दो अलग अलग चीजें हैं


आपने सुना होगा धर्मों के ठेकेदारों से यह अमृत वचन…

“धर्म तर्क का नही श्रद्धा का विषय है ।
मानो तो मूर्ति भगवान है न
मानो तो मूर्ति महज एक पाषाण है ।”

…कभी इस अमृतवचन को समझने का प्रयास किया है किसीने ?
धर्म और मूर्ति-पूजा (कर्मकांड) दो अलग अलग चीजें हैं | धर्म शाश्वत है सनातन है और मूर्ति पूजा धर्म को समझने के लिए प्रारंभिक अवस्था है | भजन-कीर्तन, पूजा अर्चना आदि प्रारंभिक चरण हैं, द्वितीय चरण शुरू होता है जब आपका ध्यान एकाग्र होने लगे और भीतर की सुप्त उर्जा जागृत होने लगे | तीसरा चरण शुरू होता है जब आप के भीतर से द्वेत मिटने लगे और सभी के लिए दया व सेवा भाव जागने लगे | आप स्वयं को माध्यम के रूप में अनुभव करने लगते हैं दिव्य शक्तियों और असहायों के बीच | आपके भीतर निःस्वार्थ सेवाभाव जागृत होने लगा है और आप मानव निर्मित भेद-भावों से परे हो जाते हैं |

तीसरा चरण पार होने के बाद फिर आप उस अवस्था में पहुँचते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण थे, गौतम बुद्ध थे, महावीर, रहीम, कबीर, रूमी….. आदि रहे | आप बिलकुल साधारण मानव की तरह भी जी सकते हैं लेकिन अब आप जागृत होते हैं चैतन्य होते हैं और सम्पूर्ण सृष्टि को सम्पूर्णता से स्वीकार पाने की योग्यता विकसित हो जाती है |

आवश्यक नहीं कि आपने कोई शास्त्र रटे हो, आवश्यक नहीं कि आपने कोई साधना की हो, आवश्यक नहीं कि आपने कोई यज्ञ-हवन किया हो…. क्योंकि पूर्व जन्मों के संस्कारों को यदि बचपन में सही पोषण मिला हो तो आप बचपन से ही इस अवस्था को और उन्नत उठा सकते हैं | जैसे कि प्रहलाद, आदिशंकराचार्य, आदि…

बचपन में अधिकांश बच्चे तीसरे चरण की अवस्था में ही होते हैं और लगभग सात-आठ वर्ष की उम्र तक इसी अवस्था में रहते है लेकिन पारिवारिक व सामाजिक वातावरण के प्रभाव से वह उन्नत या अवनत होता जाता है | बचपन में वे भेद-भाव से परे होते हैं और सनातन धर्मानुसार ही उनका अचार-विचार व व्यवहार होता है | वे सहयोगी भाव लिए होते हैं और यथासंभव दूसरों का दुःख दूर करने का प्रयत्न करते हैं |

इसलिए कर्मकांड कोई धर्म नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे प्राथमिक शिक्षा में आपको कई चीजें सिखाई जाती हैं, कई तरह की किताबें और पेंसिलें रखनी पड़ती हैं….. लेकिन जैसे जैसे आप उच्च शिक्षा के लिए तैयार होते जाते हैं, आपके बसते का बोझ कम होने लगता है और आपको अधिक स्वतंत्रता मिलने लगती है | लेकिन वे बसते वे खेल-कूद…जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं होता, वे प्रारम्भिक चरण ही होते हैं |

जबतक आप सम्प्रदायों, जाति, वर्ण, भाषा, देश के भेद-भाव और परस्पर निंदा का भाव लिए हुए है, समझ जाइए कि आप अभी धर्म की अनुभूति से बहुत ही दूर हैं | अभी तो आप प्रारंभिक चरण में ही पड़े हुए हैं, अर्थात आप एक नौ-दस साल के बच्चे की धर्म सम्बन्धी समझ से भी बहुत ही पीछे रह गये हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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