सभी तो खुद को ही तो बदल रहे हैं……

कई संत महंत हिमालय में बैठकर खुद को बदल रहे हैं.. आशा है एक दिन सभी हिमालय में बैठे होंगे खुद को बदलने के लिए |

वैसे नेता भी दूसरों की चिंता नहीं करते खुद को ही बदल रहे होते हैं, धर्म-गुरु भी दूसरों की चिंता नहीं करते खुद को बदल रहे होते हैं, प्रशासनिक अधिकारी भी दूसरों की चिंता नहीं करते खुद को बदल रहे होते हैं… सारे व्यापारी उद्योगपति खुदको ही बदल रहे होते हैं….. आम जनता भी खुद को ही बदल रहे होते हैं पडोसी की भी चिंता नहीं करते…. सभी तो खुद को ही तो बदल रहे हैं…… !!!
बस हम जैसे कुछ सरफिरे इस दुनिया में समय समय पर आते रहते हैं जो खुद की चिंता नहीं करते और दूसरों को बदलने निकल पड़ते हैं यह जानते हुए भी कि खुद को बदले बिना दुनिया नहीं बदल सकती…. फिर एक दिन मिटा दिए जाते हैं और फिर दोबारा आ जाते हैं बेशर्म बनकर दुनिया को बदलने के लिए…. फिर मिटा दिए जाते हैं और फिर आ जाते हैं……

यह तो तब तक चलता रहेगा जब तक सृष्टि है बस रूप बदलता रहेगा हमारा | और सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह कि हम जैसे लोगों को न तो धर्मग्रथों का ज्ञान होता है न संस्कृत का न अरबी-फारसी का और न ही पूजापाठ-कर्मकांडों का, लेकिन खुद को बहुत ही बड़ा विद्वान माने बैठे होते हैं | और घमंडी तो इतने होते हैं हम कि यही नहीं पता होता कि घमंड है किस बात का ! नंबर एक के अनपढ़ और गंवार होते हैं और स्वाभिमानी इतने होते हैं कि भूखे मरना पसंद होता है लेकिन भीख मांगना पसंद नहीं अपने लिए, वही इतने ही बेगैरत भी होते हैं कि किसी की सहायता के लिए घटिया से घटिया लोगों के सामने भी हाथ फैला देंगे | आजादी पसंद होते हैं इसलिए किसी पंथ या संप्रदाय के अधीन नहीं रह सकते और न ही किसी के आदेश पर कोई कार्य कर सकते हैं | कोई हम पर हुकुम चलाये वह कभी स्वीकार नहीं…… लेकिन सपना पाले बैठे हैं दुनिया को बदलने का | सपना पाले बैठे हैं कि एक दिन सभी को समझा पायेंगे कि जिस धर्म के नाम पर सब लड़ रहे हैं वास्तव में वह धर्म है ही नहीं | धर्म तो शाश्वत व सनातन है और उससे अलग तो कोई एक पल एक क्षण भी नहीं जी सकता |

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हम जानते हैं कि दुनिया पढ़ी-लिखी हो गयी है और सभी के अपने अपने धर्म-गुरु और ठेकेदार हैं, इसलिए कोई हमारी बातें न तो सुनेगा कभी और न ही मानेगा कभी….. लेकिन फिर भी हम आते हैं निर्लज्जों की तरह इस दुनिया में नए नए रूप लेकर | ~विशुद्ध चैतन्य

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