निन्दक नियरे राखिये…. लेकिन क्यों ?

कई हज़ार साल पुरानी बात है | मैं एक गाँव से गुजर रहा था तो देखा कि एक घोड़ा पेड़ पर मुँह छुपाये फूट फूट कर रो रहा है | मुझे उसपर बहुत दया आई और उसके पास जाकर उससे पूछा, “क्यों भाई रो क्यों रहे हो ? क्या हुआ जो इतना दुखी हो ?

वह बोला, “अरे रहने दो… आप जाओ यहाँ से…. मेरी दुःख भरी कहानी सुनकर तुम्हारे भी आँसू आ जायेंगे |”

मैंने कहा, “देखो दुःख बाँटने से दुःख कम होता है इसलिए मुझे बताओ तो तुम्हारा मन हल्का हो जाएगा |”

थोड़ी देर बाद वह शांत हुआ और फिर उसने अपनी दुःख भरी कहानी बताई कुछ इस तरह…
“बचपन से मैं एक बहुत ही धार्मिक विद्वान्  के घर का सदस्य रहा, उन्होंने ही मुझे पाल पोस कर बड़ा किया | फिर एक दिन जब वे आखरी साँसे ले रहे थे तो मुझे अपने पास बुलाकर उन्होंने मुझे कुछ बातें समझाई | सभी बातें तो मुझे याद नहीं रहीं लेकिन एक बात मैं नहीं भुला कि जीवन में कभी किसी को अपने से दूर मत करो चाहे वह कितना ही बुरा क्यों न हो, चाहे वह कितना ही नुक्सान क्यों न करे…. एक दिन वह तुम्हें समझ जाएगा और फिर वह कभी तुम्हारा कोई नुक्सान नहीं करेगा | फिर बोले निन्दक नियरे राखिये……. लेकिन पूरी बात खत्म करने से पहले ही उन्होंने प्राण त्याग दिए |” इतना कहकर फिर वह जोर जोर से रोने लगा |

“अरे अरे फिर क्यों रोने लगे भाई ? मैं समझ सकता हूँ कि जिन्होंने तुम्हें पाला पोसा वे ही अब दुनिया में नहीं रहे… इसका बहुत ही दुःख पहुंचा है तुम्हें… चिंता मत करो…..” मैंने उसे ढांढस देने का प्रयास किया |

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“अरे उनको मरे तो कई साल हो गये !” उसने घूर कर मुझे देखा,  “उसका दुःख थोड़े ही है मुझे ! मुझे तो दुःख है उन लोगों का जिनको में इतने बरस तक यह सोचकर झेलता रहा कि वे एक दिन मुझे समझ जायेंगे…. निन्दक नियरे राखिये वाली शिक्षा के कारण उनकी गालियाँ सहन करता रहा | उनके जितने भी रिश्तेदार आये सभी मुझे गालियाँ देते और मारते पीटते थे लेकिन सभी को सहन करता रहा | लेकिन कुछ दिन पहले ही एक घोड़ी को मुझसे प्रेम हो गया और मुझे भी उससे प्रेम हो गया | तो कल शाम मैं उसे बुद्धागार्डन घुमाने ले गया चुपचाप | बस इतनी सी बात पर उन लोगों ने घर से बाहर निकाल दिया |” यह कहकर वह और जोर जोर से रोने लगा |

“यह तो बहुत ही बुरा हुआ, चलो एक काम करते हैं हम दोनों मिलकर तुम्हारी प्रेमिका का घर ढूँढते हैं और फिर तीनों मिलकर आराम से कहीं बैठकर सोचते हैं कि आगे क्या करना है |” मैंने जब यह बात कही तो वह उछल पड़ा और उसके चेहरे पर बारह इंच कि मुस्कान उभर आयी | घोड़े ने मुझे अपनी पीठ पर बैठाया और अपनी मस्तानी चाल से चल पड़ा प्रेमिका के घर की ओर

इस बीच मेरे दिमाग में वह शिक्षा गूंज गयी, ‘निन्दक नियरे राखिये….’ लेकिन क्यों ? निंदकों से भला कैसे हो सकता है ? इस घोड़े का तो भला नहीं हुआ निंदकों को सहन करने से उलटे इतने बरस बर्बाद ही हुए उसके |

जरा अपने बचपन में जाइए.. आप अनाथ हैं, कोई नहीं है आपके साथ सिवाय निन्दक के | आप जो कुछ भी करते हैं उसी में खोट निकालते हैं कभी किसी भी काम की प्रशंसा नहीं करते | धीरे धीरे आपके मन में यह बात बैठ जाती है कि आप दुनिया के सबसे नालायक व्यक्ति हैं | आपके भीतर एक कवि होता है, एक चित्रकार होता है, एक संगीतकार होता…. लेकिन वह निन्दक सभी को मार देता है अपनी जली कटी से |

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वहीं एक दिन आपके जीवन में कोई ऐसा आ जाता है जो आपके भीतर छिपे खुबसुरत व्यक्ति से आपका परिचय करवाता है…

जरा सोचिये वह क्षण वह दिन और वह विशेष व्यक्ति आपके जीवन में कितना महत्वपूर्ण हो जाता है ? उस दिन आपको लगता है कि आप दुनिया के सबसे खुशकिस्मत व्यक्ति हैं | क्या आपने कभी ऐसा क्षण अपने जीवन में अनुभव किया ?

निन्दक और शुभचिंतक में अंतर होता है | निंदक केवल निंदा करता है क्योंकि उसे निंदा ही करना है जबकि शुभचिंतक, समर्थक, मित्र आपके आलोचना या निंदा तभी करते हैं जब आवश्यक हो जाता है | लेकिन अधिकाँश समय वे आपका उत्साहवर्धन ही करते हैं | निंदा या आलोचना नकारात्मक उर्जा है इसलिए इसे समझना आवश्यक है | निन्दक की मनःस्थिति, उसका अनुभव व बौद्धिक स्तर का अनुमान भी अवश्य लगा लेना चाहिए | स्वयं पर पूरा विश्वास होना चाहिए, तभी आप नकारात्मक उर्जा से स्वयं को बचा पायेंगे | कुछ लोगों आदत होती है व्यंग्य करने की तो आपको व्यंग्य की समझ भी होनी चाहिए नहीं तो आप व्यंग्य का उद्देश्य नहीं समझ पायेंगे |

नकारात्मक लोग आपके विचारों को भी नीचे स्तर तक ले आते हैं, आप उनको स्पष्टीकरण देते रहें सौ, मगर उनको संतुष्ट नहीं कर पाएंगे क्योंकि वे मानसिक रूप से न तो ऊपर उठे होते हैं और न ही ऊपर उठना चाहते हैं | लेकिन वे सामने किसी को ऊपर उठता हुआ देख भी नहीं सकते और हर संभव प्रयास करते हैं रायता फैलाने का | स्वयं को स्पष्ट रूप से सामने रखिये और सहन करने की एक सीमा बना लीजिये ताकि लोगों को पता रहे कि इस सीमा को पार करने के बाद अगला मौका नहीं मिलेगा निंदा करने का | ~विशुद्ध चैतन्य

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