भक्त और अनुयायी होना कोई सामान्य घटना नहीं है !

सामान्य व्यवहार में भक्त और अनुयायी शब्द का एक ही अर्थ और भाव निकालते है हम | भक्त को अनुयायी भी कह देते हैं और अनुयायी को भक्त भी कह देते हैं | जबकि दोनों का अर्थ और भाव बिलकुल अलग अलग है |

आज ‘भक्त’ जैसा गरिमामय शब्द भी अपनी गरिमा खो चुका है राजनेताओं के चाटुकारों के कारण | आजकल नेताओं के चाटुकारों को भी भक्त की संज्ञा दी जाने लगी | जबकि चाटुकार और चापलूस स्वयं एक स्थापित संज्ञाएँ हैं और भक्त और अनुयायी शब्द से बिलकुल अलग अर्थ रखते हैं |

तो आइये समझते हैं इन शब्दों का महत्व और साथ ही जानते हैं इनकी व्यावहारिकता |

क्या भक्त और अनुयायी वास्तव में होते हैं ?

मेरा उत्तर होगा; “शायद नहीं” ! क्योंकि मुझे कभी कोई भक्त नहीं दिखा, न ही दिखा कोई अनुयायी | मैं स्वयं किसी का भक्त नहीं बन पाया और नहीं बन पाया किसी का अनुयायी | हाँ समर्थक अवश्य रहा कभी किसी के विचारों का तो कभी किसी के व्यक्तित्व और सिद्धांतो का | लेकिन भक्त नहीं बन पाया क्योंकि भक्त होने के लिए अपना आस्तित्व ही मिटा देना होता है | अनुयायी होने के लिए भी स्वयं का आस्तित्व ही मिटा देना होता है |

जबकि ऐसा करना करना किसी के लिए भी संभव नहीं है यह बहुत ही विलक्ष्ण गुण है और दुर्लभ लोगों में ही देखने मिलता है | इसीलिए कभी-कभार ही मीरा, सूरदास, तुकाराम, प्रहलाद जैसे व्यक्तित्व उभर कर सामने आते हैं |

यदि भक्त होना अनुयायी होना इतना ही सहज होता जितना चाटुकारी या चापलूसी करना, तो भारत जैसे भक्तों और अनुयायियों से भरे देश की इतनी दुर्गति न हो रही होती | धूर्त, मक्कार और जुमलेबाज यहाँ पूजनीय व सम्मानीय न होते | भारत में आज हर कोई किसी न किसी का भक्त है किसी न किसी का अनुयायी है, फिर भी भ्रष्टाचारी राज कर रहे हैं….तो क्यों ?

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क्यों कठिन है भक्त और अनुयायी होना ?

भक्त होने के लिए अपना अहंकार, अपना विचार, अपना व्यक्तित्व सबकुछ समर्पित कर देना होता है उसे, जिसके प्रति भक्ति हो | भक्त अपने अराध्य का विस्तार मात्र हो जाता है जैसे किसी व्यक्ति का कोई अंग | जैसे शरीर का हाथ या पैर | उनके बिना व्यक्ति का व्यक्तित्व ही अधूरा हो जाता है |

किसी व्यक्ति का हाथ न हो, किसी का पैर न हो तो क्या वह हमें अधुरा सा नहीं दीखता ? ठीक बिलकुल वैसे ही भक्त और अनुयायी होते हैं अपने आराध्य के लिए | भक्त और अनुयायियों का व्यव्हार अपने आराध्य से अलग नहीं होता | आप किसी व्यक्ति से मिलने जायेंगे तो उस व्यक्ति का हाथ या पैर अपने आप नहीं चलने लगेगा आप पर जब तक वह व्यक्ति न चाहे | ठीक इसी प्रकार भक्त और अनुयायी भी होते हैं | वे केवल अपने आराध्य के इशारों पर ही रहते हैं, उनका सुख दुःख सब उन अराध्य के सुख दुःख पर ही निर्भर होता है |

भक्त अपने आराध्य से किसी स्वार्थ या लोभ में नहीं जुड़ता, केवल इसलिए जुड़ता है क्योंकि उसे उसकी सेवा करने में सुख मिलता है, उसका सहयोगी होने में सुख मिलता है, उसके लिए मर-मिटने में सुख मिलता है | और आज जब हर कोई व्यक्तिगत सुखों को महत्व देता है, हर कोई व्यक्तिगत हितों को महत्व दे रहा है, ऐसे में भक्त और अनुयायी केवल काल्पनिक चरित्र बनकर रह गये हैं |

मैंने तो आश्रम में भी कभी भक्त और अनुयायी नहीं देखे, केवल अपने अपने स्वार्थ व हितों से जुड़े स्वार्थियों की भीड़ ही देखी |

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क्या राजनेता और पार्टियों के समर्थकों को भक्त और अनुयायी की संज्ञा देना उचित है ?

राजनैतिक भक्त

मेरी दृष्टि में यह तनिक भी उचित नहीं है | क्योंकि ऐसा करने से इन शब्दों की गरिमा ही घटती है उनका कुछ नहीं बिगड़ता | यह बिलकुल वैसी ही बात हो जाती है, जैसे दिव्यांग को विकलांग और विकलांग को दिव्यांग की संज्ञा देना |

राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों के भक्त और अनुयायी नहीं होते, केवल समर्थक होते हैं, चापलूस होते हैं, चाटुकार होते हैं |जब तक इनका हित सध रहा है ये साथ होते हैं और जहाँ हानि दिखने लगे, ये पाला बदल लेते हैं |

ऐसे कितने राजनेता आज गुमनामी में जी रहे होंगे जिनके पास कभी भक्तों और अनुयायियों की भीड़ जमी रहती थी | आज उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं होगा |

इसलिए राजनैतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को भक्त और अनुयायी की संज्ञा देना कहीं से भी उचित नहीं है | लेकिन अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं तो ऐसा भी अवश्य हो सकता है कि किसी नेता का कोई भक्त या अनुयायी अवश्य हो जो उसके बुरे से बुरे समय में भी उसके साथ खड़ा बिलकुल ऐसे ही खड़ा मिलता हो, जैसे कि उसका कोई अंग हो |

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क्या आप सच्चे अनुयायी हैं अपने आराध्यों, आदर्शों के ?

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दारा सिंह
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दारा सिंह

बहुत अच्छा