भिखारी सारी दुनिया

“भिक्षान्न देहि…! एक पुकार सुबह-सुबह आपके द्वार पर सुनाई पड़े, तो लगता है दिन की शुरुआत ही खराब हो गयी | चिल्लाकर आप कहते हो, “अरे बाबा कहाँ सुबह सुबह चले आये, कहीं और जाकर माँगो !”

दूकान पर बैठे हों तो कहते हैं, “अभी बोहनी ही नहीं हुई, बाद में आना !”

साधू-संन्यासियों और भिखारियों में कोई अंतर नहीं रहा आज समाज की नजर में | क्योंकि आज साधू-संतों के भेस में भिखारी और व्यापारी ही अधिक भटक रहे हैं | जबकि वास्तविक साधू-संत और भिखारी अभावों में ही जी रहे हैं | नकली भिखारी करोड़ों के बंगले कोठी बनाकर रह रहे हैं और असली भिखारी नरक भोग रहे हैं | नकली साधू-संत दुनिया भर के ऐश्वर्य भोग रहे हैं और असली साधू संतों के पास अपने इलाज करवाने के लिए भी धन नहीं है |

मैं भिखारी नहीं हूँ और न ही व्यापारी साधू-संत

मुझे बहुत आश्चर्य होता है जब सरकार, ईश्वर, अल्लाह के सामने हाथ फैलाए बैठे समाज का कोई व्यक्ति मुझे भिखारी कहता है | मुझ बहुत आश्चर्य होता है जब कोई आरक्षण कोटे से बना अमीर मुझे भिखारी कहता है | मुझे बहुत आश्चर्य होता है जब कोई सरकारी पेंशन, पत्नी की तनखा, बीवी-बच्चों की कमाई पर पल रहा साधू-संन्यासी मुझे भिखारी कहता है |

अरे मैं तो यदि किसी से कुछ माँगता भी हूँ, तो तभी माँगता हूँ, जब कोई मुझे आश्वस्त करता है कि जब भी कोई आवश्यकता हो मुझे अवश्य बताना | अब यदि वह खुद को दाता समझ ले और मुझे भिखारी तो उसमें मेरी क्या गलती ?

मेरे जीवन में ऐसे कई लोग आये जिन्होंने आर्थिक सहयोग किया और कुछ समय बाद यह समझ बैठे कि उनके बिना मेरा गुजारा नहीं | जबकि मेरा गुजरा हमेशा चलता रहा, और आज भी चलता रहता है | मेरे पास पैसा हुआ तो भी ठीक और न हुआ तो भी ठीक | मुझे सुविधाएँ मिलें तो भी ठीक, न मिले तो भी ठीक | ऐसा कुछ भी नहीं है इस जीवन में मेरे पास जिसे खोने का मुझे कोई दुःख हो और न ही कोई ऐसा व्यक्ति मेरे जीवन में है, जिसके चले जाने से मुझे कोई दुःख या असुविधा हो |

यही है वास्तविक संन्यास भाव लेकिन यह निश्चित नहीं है | समाज को मैं यह अधिकार नहीं देता कि वह मुझे निर्देशित करे कि मुझे कैसा संन्यासी होना चाहिए | मैं अपनी ही तरह का संन्यासी हूँ और अपनी ही तरह का रहना चाहता हूँ | मैं कोई सौदेबाजी नहीं करता और न ही किसी को खुश रखने में मेरी कोई रूचि है | आप मुझसे जुड़ते हैं तो ठीक, दूरी बना लेते हैं तो ठीक | मुझसे सामाजिक होने की अपेक्षा मत रखिये क्योंकि मैं संन्यासी हूँ | मैं आपका पालतू नहीं बन सकता कभी भी चंद रुपयों, भोजन या नकली मान सम्मान के लालच में | मैं भिखारी भी नहीं हूँ क्योंकि मैं सहयोग माँगता हूँ, भीख या उधार नहीं | सहयोगी होना आपका स्वभाव नहीं, इसीलिए आपको मैं भिखारी नजर आता हूँ | आप व्यापारी हैं इसीलिए आप साधू संत भी व्यापारी या चमत्कारी खोजते हैं |

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साधू-संत होना भी आज व्यवसाय बन चुका है

प्रश्न उठता है मेरे मन में कि असल से अधिक प्रसिद्धि नकल को क्यों मिलती है ? उत्तर बाहर कोई नहीं दे पाता क्योंकि हर कोई नकली जिंदगी ही जी रहा है | भीतर से ही उत्तर मिलता है क्योंकि समाज स्वयं नकली जीवन शैली अपना चुका है, इसीलिए असल से दूर भागने लगा |

एक भिखारी अपनी विवशता के कारण भीख मांगता है | लेकिन धूर्त लोग उन्हें दूर खदेड़ देते हैं और खुद उनकी जगह भिखारी बनकर बैठ जाते हैं | ऐसे धूर्तों की कारण आज भीख माँगना एक लोकप्रिय व्यवसाय का रूप ले चुका है और अरबों का व्यापार बन चुका है |

इसी प्रकार साधू-संत होना भी आज व्यवसाय बन चुका है और चूँकि स्वयं समाज व्यवसायी हो चुका है, इसीलिए व्यापारी व ठग प्रवृति के साधू-संन्यासियों का वर्चस्व छा गया |

आज ऐसे साधू-संन्यासी दुर्लभ हो गये, जो समाज को सही राह दिखा पायें, जो समाज को जागरूक बना पायें | क्योंकि समाज मीठे बोल बोलने वाले साधू संन्यासियों के पीछे भागता है | क्योकि समाज विशुद्ध राजनैतिक और व्यापारिक प्रवृति के साधू संन्यासियों के पीछे भागता है | समाज इनसे सीधे सीधे व्यापार करता है | अर्थात यदि समाज इन्हें भौतिक सुख सुविधाएं, धन, सम्पात्ति मान सम्मान देता है, तो बदले वही सब इनसे प्राप्त करने की अपेक्षा रखता है | सरकार इन्हें सुविधाएँ देती है, तो बदले में यह अपेक्षा रखती है कि ये लोग सरकार की स्तुति वंदन करें, उनके कुकृत्यों पर अपनी आँखें बंद रखें |

व्यापारी व राजनैतिक प्रवृति के साधू संन्यासी ये काम बड़ी सहजता व निर्लज्जता से कर लेते हैं | इसीलिए समाज व सरकार इन्हें सर आँखों पर बैठाकर रखती है | कभी कभार अपनी राजनीती चमकाने के लिए दो चार धूर्त-मक्कार साधू संतों को जेल भी भिजवा देती है | लेकिन धंधा इनका वैसे ही चलता रहता है |

क्योकि समाज व्यपारियों का है, समाज राजनैतिक चाटुकारों का है, समाज ही समाज व मानवता का शत्रु बन बैठा है | इसीलिए नकल को नमस्कार और असल को तिरस्कार मिलने लगा |

नकल करना आसान व सहज है आज क्योंकि…

क्योंकि आज हर सिद्धांत का एक फार्मेट है हर व्यक्तित्व का एक फार्मेट है | आज भिखारी कैसा होना चाहिए, उसका एक फार्मेट है | जो उस फार्मेट को अपना लेता है, वह भिखारी कहलाने लगता है | आज साधू-संत होने का एक फार्मेट है और जो उस फार्मेट को अपना ले वह साधू-संत कहलाने लगता है | भले ये वास्तविक भिखारी या साधू संत न हो, लेकिन इन्हें अच्छी तरह से पता है कि समाज की नजर में ये असली भिखारी या साधू संतों से अधिक विश्वनीय हैं | क्योकि ये सब मिलकर असली को भी नकली प्रमाणित कर देंगे और नकली को असली |

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मैंने यही सब देखकर बिलकुल ही अलग पद्धति अपनाया और वह है अनिश्चितता का | कोई भी मेरे विषय में कुछ भी निश्चित नहीं बता सकता न ही कोई ज्योतिषी मेरी कोई निश्चित भविष्यवाणी कर सकता है | मैं कब किस प्रकार का व्यवहार करूँगा वह भी निश्चित नहीं है | और यही कारण है कि समाज तो क्या, जो मेरे साथ रहते हैं, वे भी मुझे नहीं समझ पाते |

एक भिखारी होना कोई प्रोफेशन नहीं है और ना ही साधू-संत होना कोई प्रोफेशन है | यह व्यक्तित्व व परिस्थितियों पर निर्भर करता है |

कुछ दिनों पहले किसी खबर में पढ़ा था कि एक धनि परिवार की महिला सड़कों पर भीख माँगती मिली | कभी शहर के सबसे सभ्रांत व धनि परिवारों में गिने जाने वाला परिवार, अचानक ऐसी दुर्घटना का शिकार हुआ, कि वे फूटपाथ पर आ गये और अपनी पहचान छुपा भीख माँगने के सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था | मैं इन्हें वास्तविक भिखारी कहूँगा क्योंकि भीख माँगना इनका प्रोफेशन नहीं था और न ही आज भी ये प्रोफेशनल भिखारी हैं |

इसी प्रकार साधू-संन्यासी भी होते हैं | कुछ प्रवृति से साधू-संन्यासी होते हैं, तो कुछ प्रोफेशन से साधू-संन्यासी होते हैं | आजकल प्रोफेशनल साधू-संन्यासियों का ज़माना है वास्तविक साधू-संन्यासियों को कोई पूछता नहीं |

व्यापारी है समाज और भिखारी है सारी दुनिया |

यदि हम ध्यान से देखें समाज को तो पायेंगे कि समाज व्यापारियों का ही है | हम सभी यहाँ व्यापार ही कर रहे हैं | हम किसी की सहायता भी करते हैं तो बदले में कुछ पाने की अपेक्षा रखते हैं क्योंकि यही बचपन से सिखाया गया है या सीखा है समाज से हमने | हम जाने अनजाने कुछ भी करने के बदले कुछ न कुछ अपेक्षा रखते हैं | हमारे समाज, हमारे धार्मिक गुरु हमें यह सिखा पाने में पुर्णतः असफल रहे कि हम सहयोगी होने के लिए इस दुनिया में आये हैं | और चूँकि हम स्वयं कभी किसी के सहयोगी नहीं हो पाए, बिना किसी स्वार्थ के, इसीलिए हम ऐसा समाज नहीं बना पाए जो परस्पर सहयोगी हो |

हम व्यापारी से कब भिखारी में रूपांतरित हो गये और भिखारी से कब व्यापारी में रूपांतरित हो गये, यह भी नहीं पता चल पाया | कभी सरकार के सामने हाथ फैलाए खड़े मिलता है हमारा समाज तो कभी ईश्वर अल्लाह के सामने | यदि समाज परस्पर सहयोगी होता, तो न ईश्वर के सामने हाथ फ़ैलाने की आवश्यकता पड़ती, न ही सरकार के सामने |

कभी पशु-पक्षियों को नहीं देखा ईश्वर अल्लाह के सामने हाथ फैलाए हुआ और नहीं देखा कभी उन्हें सरकार के सामने हाथ फैलाये हुए | हाँ जो पशु-पक्षी वनों से निकल कर शहर व गाँवों में आ गये, या जिनका वन छीन लिया मानवों ने और उन्हें बेघर करके शहरों गांवों में भटकने पर विवश कर दिया, उन्होंने मानवों से भीख माँगना अवश्य सीख लिया | क्योंकि वे भीख माँगने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकते |

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इस प्रकार सारी दुनिया ही भिखारी हो गयी | कुछ विवशता भिखारी हुए, कुछ स्वभाववश भिखारी हुए और कुछ दुनिया को समझाने के लिए भिखारी हुए | दुनिया को समझाने के लिए भिखारी जो हो जाते हैं, वे साधू-संन्यासी होते हैं |

बुद्ध का भीख माँगने और भिखारियों के भीख माँगने में अंतर है

बुद्ध जब भीख माँगने निकलते थे, तो वे केवल समाज को यह समझाने के लिए निकलते थे कि सहयोगी बनो | भीख देते समय बदले में कुछ पाने की अपेक्षा मत रखो | लेकिन समाज भिखारियों से भी सौदा करता है, बदले में दुवाएं माँग लेता है |

जिस प्रकार माँगने वाले साधू-संन्यासियों से दूर भागती है दुनिया, ठीक उसी प्रकार दूर भागता हूँ मैं भी माँगने वाले उच्च, मध्यम व निम्नवर्गीय परिवारों से । मैं ऐसे लोगों से दूरी बना लेता हूँ, जो मुझसे किसी भी प्रकार की कोई अपेक्षा रखते हैं कुछ देने के बदले | क्योंकि मैं किसी को कुछ भी नहीं दे सकता, क्योंकि मेरे पास कुछ है ही नहीं देने के लिए, क्योंकि मैं कुछ लेकर ही नहीं आया था आते समय इस दुनिया में और जब जाऊँगा तो खाली हाथ ही जाऊंगा | यहाँ तक कि यह शरीर भी छोड़कर जाऊंगा क्योंकि मुझे यह शरीर भी केवल इस दुनिया में प्रयोग करने के लिए ही मिला था | बिलकुल वैसे ही जैसे किसी कम्पनी के प्रिमिसिस में जब हम जाते हैं, तब एक गेस्ट एक्सेस कार्ड मिलता है | जब तक आप प्रिमिसिस के भीतर हैं, तब तक वह कार्ड आपके पास होना चाहिए और जैसे ही प्रिमिसिस छोड़ते हैं, वह कार्ड भी आपको छोड़ना होता है |

वास्तव में हम सभी भिखारी हैं और किसी न किसी से कुछ न कुछ माँगते ही रहते हैं । लेकिन हर कोई दूसरे को भिखारी समझ रहा है और स्वयं को दाता । और बुद्ध जैसे लोग यह समझाने का प्रयास करते हैं कि यह अहंकार निकाल दो मन से कि तुम किसी को कुछ देते हो | बुद्ध यह समझाने का प्रयास करते हैं कि इतना ही धन अपने पास रखो, जितने से तुम्हारा काम चल जाये, उससे अधिक धन उन्हें बाँट दो, जिन्हें आवश्यकता है | लेकिन समाज ऐसा नहीं कर पाया इसीलिए वह बुद्ध नहीं हो पाया और बौद्ध हो गया | बुद्ध उनके लिए मित्र नहीं हो पाए, बल्कि पूजनीय देवता बन गए |


इस दुनिया में हर कोई भिखारी है, दरिद्र है, दुखी है, फिर चाहे वह स्विस बैंक एकाउंट होल्डर ही क्यों न हो, फिर चाहे उसके गोदामों में पड़े धन सड़ने ही क्यों न लगे हों ।

इसीलिये स्वयं व ईश्वर के सिवाय किसी से अपेक्षा न रखें । स्वयं के भीतर छुपी शक्तियों व योग्यताओं को खोजें, यही खोज आपको सुखी व समृद्ध बना सकती है ।

~विशुद्ध चैतन्य

Sannyasi at Leelamandir Ashram

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