न्याय की वास्तविक परिभाषा

मेरी व्यक्तिगत धारणा है कि समाज जिसे न्याय समझता है वह न्याय नहीं है | धर्म और न्याय दोनों के ही वास्तविक परिभाषाओं को तिरोहित करके समाज ने नई ही परिभाषाएं गढ़ ली हैं इनकी | उदाहरण के लिए सम्प्रदायों, परम्पराओं, मान्यताओं को धर्म कहा जाने लगा और धर्म को भूल गये | रिश्वतखोरी, चाटुकारिता, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, जुमलेबाजी को राजनीती कहा जाने लगा और राजनीति भूल गये | इसी प्रकार न्याय की वास्तविकता भूल गये लोग और व्यवसाय को न्याय की संज्ञा दी जाने लगी |

जिस प्रकार कई सम्प्रदायें हैं जिन्हें धर्म कहा जाता है, उसी प्रकार कई व्यावसायिक केंद्र हैं जिन्हें न्यायपालिका या न्यायालयों के नाम से जाना जाता है | यहाँ अपनी अपनी हैसियत के अनुसार कोई भी न्याय खरीद-बेच सकता है |

न्यायिक व्यवस्था

न्यायिक व्यवस्था मुख्यतः तीन प्रक्रार की होतीं हैं:

  1. सामाजिक न्यायिक व्यवस्था: सामाजिक मत-मान्यताओं, परम्पराओं, धार्मिक रीतिरिवाजों पर आधारित न्याय व्यवस्था | जैसे कि धार्मिक ग्रंथों पर आधारित न्यायिक व्यवस्था, जातियों पर आधारित न्यायिक व्यवस्था, गाँवों, कबीलों, परिवारों, कार्यालयों, शिक्षण संस्थानों, गुरुकुलों, छात्रावासों की न्यायिक व्यवस्था |
  2. राजनैतिक न्यायिक व्यवस्था: इस व्यवस्था के अंतर्गत सत्तापक्ष न्यायिक व्यवस्था लागू करवाते हैं | जिसके हाथ में सत्ता होती है, वह अपने नियम व सिद्धांत तय करता है और उसी के अनुसार तय करता है न्याय की परिभाषा |
  3. राष्ट्रीय न्यायिक व्यवस्था: इस व्यवस्था के अंतर्गत एक केंद्रीय न्यायिक व्यवस्था बनायीं जाती है और व सम्पूर्ण राष्ट्र पर लागु होते हैं | उसे कोई भी राजनैतिक पार्टी या सत्ता-पक्ष अपने व्यक्तिगत स्वार्थवश नहीं बदल सकता | यह व्यवस्था राष्ट्रीय संविधान पर आधारित होती है और इसमें संशोधन या बदलाव करना आसान नहीं होती |
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उपरोक्त तीनों ही न्यायिक व्यवस्था वास्तव में न्याय पर आधारित नहीं, बल्कि सामाजिक मान्यताओं, सिद्धांतों पर आधारित हैं | जैसे कि कोई गतिवधि किसी देश में अपराध मानी जाती है, तो वही किसी दूसरे देश में प्रोफेशन माना जाता है | किसी गतिविधि के लिए किसी देश में मृत्युदंड तक हो सकता है, तो किसी देश में कोई सजा ही नहीं है उसके लिए | उपरोक्त तीनों ही न्यायिक व्यवस्थाओं को मैं क्षेत्रीय व साम्प्रदायिक न्यायिक व्यवस्था मानता हूँ वास्तविक न्यायिक व्यवस्था नहीं |

न्यायिक नहीं हैं आधुनिक न्याय की परिभाषायें

न्यायिक नहीं मानता आधुनिक न्यायिक व्यवस्थाओं को, क्योंकि ये व्यावसायिक व्यवस्थाएं हैं | इन व्यवस्थाओं में सबसे बड़ा दोष यह है कि ये सत्ता, पद, प्रतिष्ठा के साथ धन पर आधारित है | जिसके पास महँगे वकील और जजों को खरीदने की शक्ति है, वही विजेता होता है या फिर वह इतना प्रभावी होता है कि आजीवन केस को खींच सकता है | इस बीच वह जो चाहे कर सकता है, और जो गरीब होगा, वह बेचारा कोर्ट के चक्कर लगा लगाकर मर जाता है |

इन व्यवस्थाओं में भेदभाव सबसे अधिक देखने मिलता है | यदि अपराधी अपनी जाति या सम्प्रदाय का हुआ तो बड़े से बड़े अपराधों में भी वह निर्दोष घोषित हो सकता है, या फिर तारिख पर तारीख का खेल चलता है और अपराधी सत्ता सुख भोगता रहता है | बहुत ही कम ऐसा देखने में आया है कि किसी घोटालेबाज, हत्यारे, बलात्कारी नेता को सजा हुई हो | और कभी सजा हुई भी तो केवल रस्मअदायगी के लिए न कि उसे दण्डित करने के लिए |

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इन व्यवस्थाओं में न्याय का आधार न्याय नहीं होता, केवल आर्थिक, राजनैतिक शक्ति आधार होती है | इन न्यायिक व्यवस्थाओं में मानवता को महत्व नहीं दिया जाता, इन न्यायिक व्यवस्थाओं में किसी व्यक्ति के जीवन व समय को महत्व नहीं दिया जाता, बस धन और स्वार्थ को महत्व दिया जाता है |

न्याय वास्तव में किताबी नहीं व्यवहारिक होना चाहिए

उदाहरण के लिए यदि कोई पिता अपने बेटे के इलाज के लिए आर्थिक संसाधन नहीं जुटा पाता और उसकी जान बचाने के लिए वह चोरी करे, तो अपराधी नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि दोषी वह अस्पताल माना जाना चाहिए, जिसने उसे विवश किया चोरी के लिए | क्योंकि सभी अस्पतालों में गरीबों को निःशुल्क चिकित्सा की सुविधा देने का नियम है | सभी अस्पतालों को सस्ती भूमि इसलिए उपलब्ध करवाई जाती है, ताकि वे निर्धनों का निःशुल्क चिकित्सा कर सके |

एक सामान्य नागरिक को जिस अपराध के लिए जो सजा दी जाती है, उससे कई गुना अधिक सजा उन्हीं अपराधों के लिए उन्हें दे जानी चाहिए जो उच्च प्रशासनिक या राजकीय पदों पर आसीन हैं | क्योंकि उन्हें सभी राजकीय सुख-सुविधाएं व सुरक्षाएं इसीलिए ही दी जातीं हैं, ताकि समाज के लिए आदर्श प्रस्तुत कर सकें | किन्तु यदि वे स्वयं ही अपराधिक गतिविधियों में सम्मिलित रहेंगे, या अपराधियों पर आश्रित रहेंगे, तो स्वाभाविक ही है कि वे न्याय नहीं कर पायेंगे |

ऐसी स्थिति में न्यायिक व्यवस्था अपराधियों के अधीन हो जाएगी और यह बिलकुल वैसी ही स्थिति होगी, जैसे किसी बिल्ली को दूध की रखवाली का सौंप दिया जाये, किसी लकड़बग्घे को मेमनों की रखवाली का काम सौंप दिया जाये |

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तो न्याय जब साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता, जातीयता पर आधारित न हो, जब न्याय व्यावसायिक न हो, जब न्याय पद-प्रतिष्ठा, आर्थिक सम्पन्नता पर आधारित न हो, जब दंडाधिकारी, न्यायमूर्ति, न्यायिक संस्थानों के कर्मचारी बिकाऊ न हों, तब कहीं जाकर वास्तविक न्यायिक व्यवस्था लागु की जा सकती है | लेकिन ऐसा हो पाना असंभव चाहे न हो, लेकिन सरल नहीं हैं | क्योंकि इस धरा में हर चीज बिकाऊ है, फिर चाहे वह शरीर हो, चाहे स्वाभिमान हो, चाहे आत्मसम्मान हो, चाहे विवेक हो, चाहे मानवीयता हो….सबकुछ बिकाऊ है |

और इसीलिए मेरी यह धारणा बन चुकी कि जिसे हम न्याय समझ रहे हैं, वह वास्तव में न्याय है ही नहीं |

~विशुद्ध चैतन्य

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न्याय प्रायः रीति रिवाजों और समाज की मान्यता पर दिया जाता है और कई तथाकथित सभ्य समाजो में प्राकृतिक न्याय की संकल्पना भी नही है पंचायतो कबीलों के न्याय को क्या कहेंगे और विभिन्न देशों में अपराधों की व्याख्या और दण्डो को क्या कहा जाय