मानव का जन्म ऐश्वर्य भोगने के लिए हुआ है

कहते है डॉक्टर भगवान का रूप होता है. क्योंकि धरती पर वो लोगों को जिंदगी देता है. यह अलग बात है कि प्रत्यक्ष रूप से हमारे आसपास रहने वाले ये भगवान यमराज से तो हमारे प्राणों को वापस नहीं दिला सकते. पर बहुत लंबे समय तक जीवन ज़रूर प्रदान करते हैं. कभी-कभी तो वह इंसान को यमराज के क्रूर पंजों की पकड़ से वापस छीन लाते हैं.

ठीक वैसे ही पंडित पुरोहित होते हैं जो मानसिक शांति व अध्यात्मिक उत्थान के लिए लोगों की सहायता करते हैं | पंडित जैसा कहते हैं लोग वैसा ही करते हैं कोई तर्क या प्रश्न नहीं करते | जो खर्चा बताते हैं वह करते हैं जो कर्मकांड बताते हैं वह करते हैं इस विश्वास के साथ कि वे जो कह रहे हैं, सही ही कह रहे होंगे | दोनों को ही ईश्वर के बाद सर्वाधिक सम्मानित माना जाता है |

  • डॉक्टरों के लापरवाही के बेशुमार घटनाएं मौजूद हैं. पिछले 08 जून 2013, इंदिरापुरम यानी गाजियाबाद के एक अस्पताल की कहानी दिल दहला देने वाली है. डॉक्टरों ने एक मासूम को टाइफाइड बताकर उशका इलाज शुरू कर दिया, जिससे बच्चे की हालत बिगड़ गई. जब दुबारा उसकी जांच की गई तो यह बात सामने आई कि बच्चे को टाइफाइड नहीं बल्कि डेंगू हुआ था. गलत दवाओं के असर बच्चे के कई अंगों पर विपरीत प्रभाव पड़ा जिससे उसकी मौत हो गई.
  • जयपुर में भी एक डॉक्टर ने एक मरीज़ की किडनी से स्टोन निकालने के लिए ऑपरेशन करने की बात कही. इंश्योरेंस कंपनी ने ऑपरेशन का पैकेज भी दे दिया. लेकिन डॉक्टर ने बिना ऑपरेशन के पैसे ले लिए. असलियत तब सामने आई, जब मरीज़ के शरीर से पट्टियां उतारी गईं और कहीं भी कट का कोई निशान नहीं दिखा. ये घटना 13 अप्रैल 2013 की है.

सच तो यह है कि कुछ अपवाद को छोड़कर ये भगवान पैसे के पीछे इस कदर भाग रहे है कि वह कब भगवान से शैतान बन गए, पता ही नहीं चलता. हक़ीक़त तो यह है कि आज के इस दौर में भगवान रूपी इन सम्मानित लोगों का दिमाग़ और हाथ सिर्फ पैसे के लिए चलता है. और जब लोग केवल पैसों के लिए कार्य करते हैं, तो मानवीय या अध्यात्मिक मूल्यों से दूर होते चले जाते हैं | पंडितों का मंत्रोचारण, यज्ञ, हवन सब भौतिक धरातल तक ही सीमित रह जाता है और मूल उद्देश्य खो जाता है |

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यही कारण है कि आज धर्म हो या चिकित्सा का क्षेत्र, दोनों ही जनकल्याण की भावना से दूर होते चले गये और स्वार्थ और आडम्बर का मंच बन गये | न्याय व्यवस्था भी अब व्यवसाय मात्र बनकर रह गया | एक दो उदहारण इन सभी क्षेत्रों से कभी कभार सामने मानवीयता के सामने आ जाते हैं तो इनका धंधा फिर जोर पकड़ लेता है, लेकिन वास्तव में ये लोग तो मानवीयता से दूर ही हो चुके हैं | आप अपने अड़ोस-पड़ोस में देखें कितने व्यावसायिक पंडित-पुरोहित, डॉक्टर और न्यायिक क्षेत्र के व्यक्ति आपको ऐसे मिलेंगे, जिनके परिवार में कोई न कोई ऐसी विपदा पड़ी हुई है, जिनके कारण वे सभी मानसिक, आर्थिक या शारीरिक रूप से परेशान हैं | कितने लोग आपको ऐसे मिल जायेंगे जो कट्टर धार्मिक हैं, लेकिन परिवार में सुख-शांति नहीं है |

मैं जानता हूँ कि इन सब समस्याओं का मूल कारण क्या है और उसे दूर कैसे किया जा सकता है क्योंकि मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ | मैं अध्यात्मिक जगत और भौतिक जगत दोनों को समग्रता से स्वीकार करता हूँ और मानता हूँ कि मानव का जन्म ऐश्वर्य भोगने के लिए हुआ है, दुःख और पीड़ा भोगने के लिए नहीं | इसलिए ही लोग इन तथाकथित भगवानों पर इतना धन खर्च करते हैं, लेकिन ये लोग तो व्यापारी हैं जो केवल व्यापार में लिप्त हैं |

जो यह मानते हैं कि धार्मिकता का दिखावा करने से सुख शांति या मोक्ष की प्राप्ति होती है, वे स्वयं के साथ साथ दुनिया को भी धोखा दे रहे हैं | ये धन या मोटर कार और बड़े भवन सुख समृद्धि नहीं हैं, सुख समृद्धि है ईश्वर प्रदत्त सभी ऐश्वर्य को भोगते हुए दूसरों के लिए सहयोगी होने की क्षमता को बनाये रखना | लेकिन जब हम सहयोगी होने का सामर्थ्य खो देते हैं और सहयोग की भी कीमत लगाने लगते हैं, तो समृद्धि स्वतः घटने लगती है | ~विशुद्ध चैतन्य

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