क्या आप सच्चे अनुयायी हैं अपने आराध्यों, आदर्शों के ?

बड़े गर्व से कहते सुनता हूँ लोगों से, “हम तो फलाने के भक्त हैं…..हम तो फलाने के अनुयायी हैं….!”

श्रृद्धा सुमन

लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आप वास्तव में भक्त या अनुयायी हैं भी या नहीं ??

चलिए मान लेते हैं कि आप किसी नेता या पार्टी के भक्त हैं, तो क्या आप उस नेता का अनुसरण करते हैं ? क्या आप उस पार्टी के सिद्धांतों का अनुसरण करते हैं ?

यदि आप का अराध्य झूठ बोलता है, गिरगिट की तरह रंग बदलता है, घोटाले करता है, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ता है….तो यह सब आप भी करेंगे क्योंकि आप उनके भक्त हैं तो अनुसरण तो करना ही पड़ेगा | लेकिन जिनके आराध्य सदाचारी रहे, बिना किसी आरक्षण के पढ़ाई पूरी की, नौकरी पायी और अपनी एक पहचान बनायी….क्या आप भी वैसा ही करेंगे ?

नहीं न ???

जी हाँ क्योंकि हिंसा करना, लूटपाट करना, घोटाले करना, झूठ बोलना, दंगा-फसाद करना या करवाना….सब सहज हैं, सरल है और यह सब करके आपको ख़ुशी भी मिलती है | लेकिन जब आपसे कहा जाये कि अपने आदर्शों के पथ पर चलो, तब पसीने छूटने लगते हैं, तब सौ बहाने गढ़ने लगते हैं |

अनुयायी क्या वास्तव में अनुयायी होते हैं ?

अम्बेडकर के अनुयायियों को देखता हूँ, तब समझ में आता है कि अनुयायी होना कितना कठिन है | अम्बेडकर तो बिना आरक्षण के ही सारी बाधाओं को पार कर गये, जबकि उनकी अनुयायी आरक्षण के लिए सरफुटव्वल कर रहे हैं | अम्बेडकर अपने पैरों पर खड़े हो गये अपनी मेहनत और इच्छा शक्ति के बल पर | जबकि उनके अनुयायी दूसरों के भरोसे बैठे हैं, दूसरों के मोहरे बने पड़े हैं | अम्बेडकर ने जिस आडंबर दिखावों का विरोध किया, वही अपना लिया अम्बेडकरवादियों ने और ढोंग कर रहे हैं अम्बेडकरवादी होने का |

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तो देखा जाए तो कोई अनुयायी नहीं बन पाता न ही भक्त हो पाता है किसी का, बस ढोंग करते हुए जीता है या भ्रम में जीता है कि वह अनुयायी या भक्त है किसी का |

बौद्ध होना सहज है, सरल है जबकि बुद्ध होना अत्यंत कठिन

बौद्ध होने के लिए या किसी भी पंथ का अनुयायी होने के लिए स्वयं को रूपांतरित करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती | बस उस पंथ के कुछ श्लोक, मन्त्र या आयतें रट लेनी होती हैं, उनकी नकल करनी होती है और बत्तखों की तरह जुलुस निकालनी होती है | बस हो गये सच्चे पंथी, सच्चे अनुयाई | बाकी भीतर से आपमें कोई परिवर्तन न हुआ हो, कोई चिंता की बात नहीं है |

जबकि बुद्ध होना अर्थात चैतन्य होना, जागृत होना बाह्य नहीं, भीतरी रूपांतरण हैं | और व्यक्ति जब भीतर से रूपांतरित होता है, तब वह वही नहीं रह जाता, तो पहले था | यह आवश्यक नहीं कि वह अहिंसक ही बनेगा, वह हिंसक भी बन सकता है, वह उग्र भी बन सकता है | यह आवश्यक नहीं कि वह जिस पंथ का अनुयायी है या जिस आदर्श का भक्त है वैसा ही बने, वह अपने आदर्श या पंथ से बिलकुल भिन्न भी हो सकता है | क्योंकि जागृति उसकी हुई है और वह जागने के बाद अपने मौलिक स्वभाव में आयेगा, न कि किसी की नकल हो जायेगा | यह और बात है कि उसका व्यवहार या स्वभाव अपने अराध्य से मेल खा जाये |

लेकिन अपने अराध्य की जीवन शैली पढ़कर उनकी नकल करने की कोशिश करने वाले कभी भी जागृत नहीं हो पाते | वे कभी भी बुद्ध नहीं बन पाते, केवल बौद्ध बनकर रह जाते हैं |

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बुध्द होने के लिए पत्नी बच्चों का त्याग ही काफी नहीं है, बुद्ध होने के लिए लाभ हानि का विचार भी त्यागना पड़ेगा | कल क्या होगा, कल रोटी मिलेगी या नहीं, पानी मिलेगा या नहीं, मान-सम्मान मिलेगा या नहीं….ये सब चिंताएं भी बिसरा देनी होगी | न तो किसी को प्रसन्न करने का कोई प्रयास, न किसी को नाराज करने की कोई चेष्टा | केवल सत्य के पक्ष में रहना और सत्य भी वह जो सार्वभौमिक हो | अपने परिवार, अपनी पार्टी के हितों को साधने वाले सत्य के पक्ष में तो हर कोई रहता है यह तो बिलकुल ही सामान्य व्यवहार है | कठिन है तो सर्वभौमिक सत्य के पक्ष में रहना और यह सदैव स्मरण रखें:

“सत्य सभी का अपना अपना होता है बिलकुल वैसे ही, जैसे अनुभव सभी का अपना अपना होता है | किन्तु सार्वभौमिक सत्य की जब बात करता हूँ तो यह सत्य बिलकुल वैसा ही है, जैसा सनातन धर्म यानि सार्वभौमिक धर्म | सार्वभौमिक सत्य या धर्म किसी व्यक्ति, स्थान, देश, अराध्य, पुस्तक पर आधारित नहीं होता, वह सर्वस्व होता है, सभी के लिए होता है और देश, काल से अप्रभावित होता है |”

गौतम बुध्द होना असंभव है जबकि बुद्ध यानि जागृत, चैतन्य होना असंभव नहीं कठिन अवश्य है |चिंतन मनन करिए कि आप चैतन्य होना चाहते हैं, जागृत होना चाहते हैं, स्वयं का साक्षात्कार करना चाहते हैं या फिर किसी दूसरे की नकल यानि कार्बन कॉपी बनकर जीना चाहते हैं ?

~विशुद्ध चैतन्य

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