संन्यास और संन्यासी

संन्यास की अवधारणा पश्चिम में विकसित नहीं हो पायी, क्योंकि संन्यास को समझने के लिए जिस उच्च मानसिक स्थिति की आवश्यकता होती है, जिस मुक्तता व स्वतंत्रता के भाव की आवश्यकता होती है, वह विकसित नहीं हो पायी थी पश्चिम में तब तक | लेकिन भारत में ऋषियों ने कई हज़ार वर्ष पूर्व ही इस भाव को समझ लिया था, जान लिया था और जीने लगे थे |

कालान्तर में संन्यास की परिभाषा बदल दी गयी और इसे भी परम्पराओं, कर्मकांडों के फार्मेट यानि ढाँचे में बाँध दिया गया | जैसे बौद्ध पंथ या अन्य कोई पंथ, सभी पंथ ही थे जिससे आगे गति करनी थी, जिससे आगे बढ़ना था | लेकिन आज वे सब दडबों में रूपांतरित हो चुके हैं, कुओं और तालाबों में रूपांतरित हो चुके हैं |

संन्यास कोई दड़बा, तालाब या कुआँ नहीं था, बल्कि एक मुक्ति का भाव था | ऐसा भाव जो रुढ़िवादी, दोगलेपन और ढोंग से भरी मानसिकता से मुक्त करता था व्यक्ति को | उसे यह अवसर प्रदान करता था कि वह स्वयं को जाने, समझे, पहचाने और अपने व्यक्तित्व को निखारे ताकि वह समाज को नयी राह दिखा सके, समाज को आध्यात्मिक, आर्थिक, मानसिक उन्नति की ओर ले जा सके |

लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और संन्यास भी कर्मकाण्ड और परम्पराओं को ढोने मात्र का माध्यम बनकर रह गया | मुझे ऐसा कोई संन्यासी नजर नहीं आता आज जिसे मैं उन्नत समझ सकूं, जिसे वास्तव में संन्यासी समझ सकूं | क्योंकि सभी संन्यासी बिलकुल वैसे ही है, जैसे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, कट्टरपंथियों की भीड़ | इनके पास न तो अपनी बुद्धि होती है, न ही सोचने समझने, चिंतन-मनन करने की क्षमता | ये केवल अपने अपने पंथों की परम्पराएं ही ढो रहे हैं आगे नहीं बढ़ पा रहे |

संन्यास, संन्यासी और ढोंग

अभी हाल ही में एक विडियो सामने आयी जिसमें एक संन्यासिन महात्मा गांधी के पुतले पर गोली चलाती है और फिर आग लगवा देती है | देखकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि मैं जानता हूँ कि ये कोई संन्यासी नहीं थी, केवल संन्यासी होने का ढोंग कर रही है | ये भगवा धारी उत्पाती या आतंकी ही हैं जो संन्यास का आवरण डाले केवल वही कर रही, जो साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग कर रहे हैं | इसका या इसके सहयोगियों का संन्यास से कोई लेना देना नही है, बस संन्यास के आवरण में अपनी घटिया मानसिकता और व्यक्तित्व को छुपाने का प्रयास मात्र है |

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आज हमारे आश्रम के सामने से महिलाओं ने कलश यात्रा निकाली | उनके आगे एक ट्रक में बड़े बड़े स्पीकर पर गाना बज रहा था हिन्दूसेना का | कुछ भगवा गमछा धारी नारे लगा रहे थे हिन्दू राज की स्थापना के हिन्दू सेना की विजय की | ये सेनाएं अपराधियों के तलुए चाटती हैं, भूमाफियाओं के नाम से ही इनकी पेंट गीली हो जाती है | लेकिन सपने देख रहे हैं हिन्दू राज की स्थापना की मानो आज भारत में इस्लामिक या इसाई राज चल रहा हो |

हिन्दू राष्ट्र की ही स्थापना करनी है इन्हें तो सबसे पहले तो इन्हें उन्हीं सब वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए जो इनके हिंदुत्व के ठेकेदारों ने बनाए | ये जींस, ये जैकिट, ये मोबाइल, ये व्हाट्सएप, ये फेसबुक, ट्विटर, कम्प्यूटर आदि में से कुछ भी इनके ठेकेदारों ने नहीं बनाये, तो ये प्रयोग कैसे कर रहे हैं इनका ? न तो ये लाऊडस्पीकर और माइक ही हिंदुत्व के ठेकेदारों की देन है….और इन सबका प्रयोग करके ये हिन्दूराष्ट्र की स्थापना की बात कर रहे हैं |

तो ये सब भगवाधारी, साधू-संन्यासी ढोंगी हैं, विशुद्ध पाखंडी हैं | इनको तो संन्यास के बेसिक का भी कोई ज्ञान नहीं |

ढोंगी हैं आधुनिक सतयुगीन साधू संन्यासी

आज जिन्हें आप साधू-संन्यासी समझ रहे हैं, उनमें से कोई भी साधू संन्यासी नहीं हैं क्योंकि इन्होने संन्यास को भी अपनी बपौती समझ ली | ये तय करते हैं कि संन्यासी कैसा होना चाहिए भले इनके अपने संन्यासी दुनिया भर के कुकर्म करते फिरें, समाज में साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाते फिरें | ये इनकी जय जय करेंगे, और जो मुक्त भाव के संन्यासी हैं, जो स्वतंत्र संन्यासी हैं, किसी दड़बे में कैद नहीं, किसी परम्परा को ढो नहीं रहे, केवल समाज को जागृत करने का अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं, उन्हें ये ढोंगी पाखण्डी कहते फिरते हैं | क्योंकि इन्हें भ्रम है कि संन्यास भी कोई दड़बा है, कोई कुआँ है हिंदुत्व, इस्लाम, इस्लाम या अन्य दडबों की तरह | और जैसे बाकि दडबों के ठेकेदार और मालिक होते है, वैसे ही संन्यास और संन्यासियों के ठेकेदार और मालिक बन गये ये लोग केवल भगवा गमछा डालकर, लुच्चों लफंगों की सेनाएं बनाकर और साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले नकली साधू-संन्यासियों को पालकर |

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भाँग, धतूरे के नशे में धुत्त साधू-संन्यासी भी वास्तविक साधू-संन्यासी नहीं हैं | क्योंकि जहाँ भी वास्तविकता होती है, वहाँ भीड़ नहीं लगती | जबकि आज इन नशेड़ी संन्यासियों की भीड़ बढ़ती चली जा रही है | कई बार देखता हूँ विदेशियों को भी इन नशेड़ियों की टोली में शामिल होते हुए जिसका बहुत प्रचार किया जाता है | यह कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि नशे के शौक़ीन भारत में ही हों यह आवश्यक नहीं, विदेशों में भी बहुत हैं |

कोई विदेशी इस्लाम कबूल ले, या हिंदुत्व कबूल ले, या अधोर पंथ कबूल ले या कोई और पंथ कबूल ले, कोई बड़ी बात नहीं है | बस एक दड़बे से निकलकर दूसरे में शामिल होने वाली बात है, बाकी हैं सभी दड़बे ही कोई उन्नति या उत्थान का मार्ग या पंथ नहीं | कोई जागृति नहीं आती इन दडबों में शामिल होने पर | मैं स्वयं संन्यासी हूँ और यह अच्छी तरह समझता हूँ कि साधू-समाज में शामिल होना या किसी अग्रवाल समाज, वाल्मीकि समाज, आर्यसमाज में शामिल होना एक ही बात है | बस सबके अपने-अपने कुछ नियम हैं और सभी नियम व्यक्ति को ऊपर उठने से रोकने के लिए बनाये गये हैं | सभी नियम इस बात पर ध्यान देकर बनाये जाते हैं कि कोई व्यक्ति स्वयं से परिचित न हो जाये, कोई स्वयं के भीतर ही ईश्वर की खोज न कर ले, कोई स्वयं को जान या समझ न जाए |

जबकि संन्यास का मूल सिद्धांत यही है कि व्यक्ति स्वयं पर प्रयोग करे, स्वयं को जाने समझे | क्योंकि जब तक व्यक्ति स्वयं से परिचित नहीं हो जाता, तब तक वह कुछ नवीन चिंतन-मनन नहीं कर सकता | संन्यास में वर्जनाएँ कुछ नहीं है क्योंकि जहाँ वर्जनाएं हैं वहां ठहराओ है, गति नहीं हैं | जबकि समाज में वर्जनाएं अनिवार्य हैं, क्योंकि वर्जनाओं के अंकुश से ही समाज को संचालित किया जा सकता है |

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संन्यास वर्जनाओं से मुक्ति है, संन्यास प्रयोग, ज्ञान, आध्यात्म व उत्थान की मानसिक् स्थिति है | वह भाव है, जिसमें व्यक्ति किसी का अहित नहीं सोचता, किसी का विनाश नहीं सोचता, और पूर्ण आनंद के भाव को जीते हुए, सभी सुख भोगते हुए आगे की ओर गति करता है | समाज के लिए कुछ नए आदर्श प्रस्तुत करता है | न कि धन-दौलत, भाँग-धतूरे, सत्ता-ऐश्वर्य के नशे में धुत्त भीड़ में खो जाता है आधुनिक अधोरियों, साधू-संन्यासियों की तरह | वास्तविक संन्यासी जो कुछ भी करेगा वह समाज के हितों को ध्यान में रखकर ही करता है |लेकिन समाज को यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की अपनी निजी, व्यक्तिगत जीवन है, ठीक उसी प्रकार संन्यासियों की भी अपनी निजता है | वे कोई चिड़ियाघर के जानवर नहीं हैं कि आप उनके निजी जीवन में दखल करें और फिर उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ायें |

लेकिन जो साधू-संन्यासी किसी सम्प्रदाय या पंथ के अधीनस्थ नहीं होते, किसी नेता या राजनैतिक पार्टी के चाटुकार नहीं होते, वैसे साधू-संन्यासियों को समाज नहीं स्वीकारता क्योंकि वह समाज के दडबों में कैद नहीं होता | वह समाज के ढोंग पाखंडों में नहीं बंधता, वह समाज की तरह दोगलेपन में नहीं जी सकता | वह समाज के धार्मिक व सभ्य लोगों की तरह भ्रष्ट नेताओं, माफियाओं की चाटुकारिता करते हुए अधर्म के विरुद्ध होने का ढोंग नहीं करता |

~विशुद्ध चैतन्य

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