हम भेंट वही चीज करते हैं, जो हमें प्रिय हो

सुविचार: “मूढ़-अज्ञानी मनुष्य निन्दा सुनकर दुःखी और स्तुति सुनकर सुखी हुआ करते हैं, सात्विक पुरुष निन्दा सुनकर सावधान और स्तुति सुनकर लज्जित होते हैं, पर जीवनमुक्त का अन्तःकरण तो इन दोनों भावों से शून्य रहता है; क्योंकि उसकी दृष्टि में एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा के अतिरिक्त अपनी भी भिन्न सत्ता नही रहती, तब निन्दा-स्तुति में उसकी भेद-बुद्धि कैसे हो सकती है? वह तो सबको एक परमात्मा का ही स्वरूप समझता है।”

कुविचार: जो व्यक्ति निंदा सुनकर दुखी न होता हो, जो व्यक्ति स्तुति सुनकर प्रसन्न न होता हो, वह राजनेता, ढोंगी संत-महंत या बहरा ही हो सकता है |

जो व्यक्ति निंदा सुनकर सावधान व स्तुति सुनकर लज्जित होते हैं, वे स्वयं से अपरिचित व हीनभावना से ग्रस्त होते हैं |

क्या हम यह मान लें कि आज तक जितनी भी स्तुतियों की रचना हुई वह परमात्मा को लज्जित या अप्रसन्न करने के लिए की गयीं ? जो सच्चिदानंद परमात्मा से स्वयं को भिन्न नहीं मानता और सभी को परमात्मा का स्वरुप मानता है, वह वही काम कैसे कर सकता है, जिससे स्वयं प्रसन्न न होता हो या लज्जित होता हो ?

हम भेंट वही चीज करते हैं, जो हमें प्रिय हो | जो निंदा और स्तुति से प्रभावित नहीं होता वह न किसी से प्रभावित होगा और न ही किसी को प्रभावित कर पायेगा, यहाँ तक कि ईश्वर को भी नहीं | ~विशुद्ध चैतन्य

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