अब मुझे लगता है कि मै आध्यात्म (स्वयं) मे जाऊँ….

मै अब आध्यात्म मे उतरना चाहता हुँ विद्यार्थी जीवन से ही.. मुझे क्या करनी चाहिए .. अब मुझे लगता है कि मै आध्यात्म (स्वयं) मे जाऊँ , झाँकु, पुछूँ , जानुँ और महसुस करुँ… मुझे तरीका बताएँ? कैसे करुँ ध्यान? उपाय बताईए मुझे.. मुझे इधर उधर जाने का वक्त तो नही मिल रहा.. कभी सोचता हुँ कुप्पाघाट (भागलपुर) जाकर गुरुदेव से दीक्षा ले लुँ? शायद चार स्टेप है इसमेँ मानस जप , मानस ध्यान , सुरत शब्द योग इत्यादि.. माँ दीक्षित है पर मुझे जँच नही रहा..कभी सोचता हुँ कि बुद्ध, महावीर और परमहंस गुरुजी का आध्यात्म अलग तो नही क्युँकि कोई न आत्मा को मानता न इश्वर , कोई आत्मा को मानता लेकिन ईश्वर को नहीँ , कोई दोनो को मानता है … मै तो कंफुयजन मे हुँ गुरुजी… आप एक पोस्ट पे शिव को जानने की बात की थी.. क्या मै भी जान सकता हुँ..अगर हाँ तो किसके आध्यात्म से आपके या बुद्ध या महर्षिमेही के आध्यात्म से..जहाँ बुद्ध और महावीर शिव के बारे मेँ कभी बताए नही लोगोँ को?… बहुत संकट है गुरुजी.. या फिर कहिए मै देवघर आऊँ दीक्षा लेने.. जब धनबाद से गोड्ढा(घर) जाउँगा जसीडीह के रास्ते… मार्गदर्शन करे कृप्या..अगर आप यहाँ उत्तर दे सकते है तो दीजिए समय मिलते ही… और मुझे भी आध्यात्म की राह मे उतारेँ…. | -एक मित्र का प्रश्न


आध्यात्म यानि स्वयं का अध्ययन | महावीर, परमहंस गौतम बुद्ध किसी दूसरे के अनुभवों या ज्ञान से आलोकित नहीं थे, वे स्वयं के प्रकाश से आलोकित थे | दूसरों की नकल करके कोई भी ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता इसलिए स्वयं की खोज करें स्वयम को समझें | स्वयं को समझने के लिए किसी से दीक्षा लेने की भी आवश्यकता नहीं है और न ही किसी आश्रम में जाने की आवश्यकता है | केवल एक मन्त्र मन में गूंजते रहना चाहिए और वह है, “मैं कौन हूँ, क्यों हूँ और क्यों आया हूँ ?”

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आध्य्तम की पहली शर्त है, भेदभाव से मुक्त होना | दूसरी शर्त है किसी को अपने से निम्न न समझना और तीसरी शर्त है स्वयं को किसी से निम्न नहीं समझना |

सदैव ध्यान में रखने वाली बातें आध्यात्म मार्गियों के लिए:

किसी को कष्ट न देना और न ही किसी को यह अधिकार देना कि वह हमें कष्ट दे |

अनाचार अत्याचार देखकर स्वयं के प्राणों की चिंता न करके भी विरोध करने वाले आध्यात्मिक होते हैं | क्योंकि अध्यात्मिक व्यक्ति जानता है कि खोएगा कुछ नहीं, और पाने को कुछ नहीं है | ईश्वर योग्यतानुसार सभी को सभी चीजें स्वतः देता है |

जीवन का उद्देश्य सृष्टि को श्रेष्ठ बनाने के लिए सहयोगी होना है | -विशुद्ध चैतन्य

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