बहुत अंतर है स्वच्छता और पवित्रता में

सामान्यतः यही माना जाता है कि स्वच्छता और पवित्रता परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं, जबकि ऐसा नहीं हैं | दोनों में बहुत अंतर है |

स्वच्छता वास्तव में बाह्य मैल, कूड़ा-करकट व विचारों से मुक्ति को कहा जाता है | जैसे स्थान की स्वच्छता, शरीर की स्वच्छता, कपड़ों की स्वच्छता | स्वच्छता विचारों के लिए भी प्रयोग किया जाता है, क्योंकि विचारों में भी उपयोगी अनुपयोगी विचार होते हैं | जो अनुपयोगी विचार होते हैं उन्हें फेंक देना चाहिए वे सिवाय कूड़ाकरकट के और कुछ नहीं होते…इसीलिए विचारों की स्वच्छता की बात की जाती है |

लेकिन पवित्रता का सम्बन्ध भौतिकता से परे है और इसका सम्बन्ध व्यक्ति के भीतरी भावनाओं से है | आत्मा से है, उस मानसिक अवस्था से है, जिससे मन प्रसन्नचित रहता है और राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या से जैसे भावों से मुक्त रहता है | पवित्रता का सम्बन्ध आध्यात्मिक केन्द्रों से है, पवित्रता का सम्बन्ध तीर्थ स्थलों, ध्यान केन्द्रों आदि से है |

प्रार्थना और पवित्रता

प्रार्थना करने के लिए हमें पवित्र होना पड़ता है। पवित्रता का अर्थ नहाने-धोने से बिल्कुल नहीं है। पवित्रता आत्म-तत्व की होती है। मन की होती है, हृदय की होती है। जब हमारा आत्म-तत्व स्वयं ही ईश्वर का लघु-स्वरूप है, तो उसे हमें पवित्र रखना ही होगा। प्रार्थना तभी फलित होगी, जब हमारा मन राग-द्वेष से मुक्त हो जाए।

प्रार्थना का एक अर्थ होता है, परम की कामना। परम की कामना के लिए क्षुद्र और तुच्छ कामनाओं का परित्याग करना चाहिए। परम की चाह ही ‘प्रार्थना’ है। लेकिन हम परम की नहीं, अल्प की मांग करते हैं। सांसारिक मान, पद व प्रतिष्ठा की चाह प्रार्थना नहीं, ‘वासना’ है। धन, यश व पुत्र- इन तीनों की मूल कामना का नाम ‘ऐषणा’ है। इसे ही ऋषियों ने पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा कहा है। जब तक इन क्षणिक सुख देने वाली तृष्णाओं का अंत नहीं हो जाता है, तब तक परम-प्रार्थना का आरंभ नहीं हो सकता है।

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हमारे अंतस की पवित्रता ही हमें प्रार्थना के योग्य बनाती है। इसके लिए हम स्वार्थ के लिए ईश्वर से कुछ मांगना छोड़कर दाता बनें। देने वाले को ही देवता कहा जाता है। गरीबों, वंचितों और जरूरतमंदों को उनकी शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से मदद करके हम दाता की श्रेणी में आ जाते हैं। दान भी कभी किसी अपेक्षा के साथ नहीं करना चाहिए। दाता बनकर हम अपने अंतस को पवित्र बना सकते हैं। प्रभु से प्रार्थना करने के लिए हाथ नहीं, बल्किहृदय फैलाने की आवश्यकता है। प्रार्थना तभी पूर्ण होगी। प्रार्थना में जब संासारिक वासना का अभाव होगा, वही सच्ची प्रार्थना होगी।

उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट हो गया होगा कि स्वच्छता और पवित्रता परस्पर पर्यायवाची नहीं हैं | दोनों के भाव बिलकुल अलग अलग हैं |

~विशुद्ध चैतन्य

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