अंतरात्मा और गोडसे की आत्मा

सिवाय किताबी धार्मिकों व धर्मगुरुओं के सभी दार्शनिक व अध्यात्मिक गुरु यही कहते हैं, कि “स्वयं को जानो”, “स्वयं को समझो”, “स्वयं के विवेकानुसार निर्णय लो” | लेकिन कम ही लोग दुनिया में ऐसे होते हैं जो स्वयं की सुनते हैं | जानने समझने की तो फुर्सत ही नहीं होती किसी के पास |

एक दिन ऐसे ही मैं किसी को प्रवचन दे रहा था (जैसी की आदत है) कि स्वयं के विवेकानुसार ही निर्णय लो, स्वयं की अंतरात्मा जो कहती है उसे ही सुनो…..

छूटते ही वह बोला, “मेरी अंतरात्मा कहती है कि तेरा सर फोड़ दूं..क्योंकि तू #हिंदुत्व को बदनाम कर रहा है, गेरुआ को बदनाम कर रहा है, मुस्लिमों से बड़े प्रेम से मिलता है, तेरे फ्रेंडलिस्ट में सारे #मुस्लिम भरे पड़े हैं, हिन्दू तो दो चार ही हैं और वे भी हम जैसे जो तुझपर नजर रखने के लिए यहाँ बैठे हैं…..”

अब भला मैं क्या कहता उससे ?

फिर भी मैंने उसे समझाया कि यह तेरी अंतरात्मा नहीं कह रही, बल्कि #गोडसे की आत्मा कह रही है, #योगी आदित्यनाथ और #साक्षी-प्राची की आत्मा कह रहे हैं….तेरी तो अपनी आत्मा कब की मर चुकी है |

उसने प्रश्न किया, “भागवत गीता में लिखा है कि आत्मा अमर है, तो मर कैसे सकती है ?”

“नहीं आत्मा मर नहीं सकती लेकिन उसे मारा जा सकता है, जैसे तूने मार दिया | यानि तू उसकी न सुनकर गोडसे की आत्मा की सुनेगा तो तेरी आत्मा तो जीवित होते हुए भी मरी हुई ही मानी जायेगी की नहीं ?” मैंने गौतम बुद्ध की तरह शांत चित्त से उत्तर दिया |

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“अच्छा जो तू यह सेकुलरिज्म पढ़ा रहा है हम लोगों को, वह अपने मुसलमान दोस्तों को क्यों नहीं पढ़ाता ? बड़ा आया विवेक और अंतरात्मा की बात करने वाला…!!!” वह बिदक कर बोला

तो उपरोक्त वार्ता जो आपको सुनाई वह इसलिए कि कई ऐसे धार्मिक लोग हैं, जिन्हें यह भ्रम है कि वे अंतरात्मा की सुनते हैं | वास्तव में वे नफरत के सौदागरों की आत्मा के प्रभाव में रहते हैं | और कभी भूले भटके मेरे जैसे सरफिरों के प्रभाव में आ भी जाते हैं, तो फिर कोई कट्टर धार्मिक आकर उसे समझाता है कि ये सेक्युलर और मानवता की बातें करने वाले ढोंगी बाबाओं की बातों में मत आओ | इन्हीं लोगों की वजह से आज हम हिन्दू खतरे में पड़े हुए हैं… और फिर वह व्यक्ति वापस गोडसे गेंग में शामिल हो जाता है |

अतः अंतरात्मा की आवाज सुनने कि योग्यता जब तक विकसित न हो जाए, आप न तो हिन्दू हैं, न ही सनातनी और न ही धार्मिक | क्योंकि भीतर से जब आप दुनिया को देखते हैं, तो न कोई हिन्दू दिखाई देता है, न कोई मुस्लिम दिखाई देता है, न कोई शूद्र और न कोई ब्राह्मण | बस कोई अत्याचारी दिखाई देता है, तो कोई भला मानुस | मानव केवल मानव ही दीखता है, और पशु केवल पशु |

भीतर से यानि अपनी ही आँखों से जब आप देखते हैं किसी को तो वह आपको हानि पहुँचाने वाला शत्रु दिख सकता है या मित्र, लेकिन हिन्दू या मुस्लिम नहीं | इसलिए मैं जब किसी से मिलता हूँ तो हिन्दू या मुस्लिम मानकर नहीं, इंसान मानकर मिलता हूँ | वह अच्छा या बुरा हो सकता है और कभी-कभी घातक भी | तब उसके व्यवहार के अनुरूप जो उचित कदम हो, वह उठाता हूँ इंसान या हैवान मानकर न कि हिन्दू या मुसलमान मानकर | ~विशुद्ध चैतन्य

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